ऑपरेशन पोलो

हैदराबाद में 1948 के पुलिस एक्शन का दफ़्न इतिहास

एल बाउलेंजर (पेरिस) द्वारा प्रकाशित पुस्तक, इंडे एंग्लैज़, साइट्स एट पेसेजेज़ से ली गई 19वीं सदी के उत्तरार्ध की हैदराबाद की एक फ़ोटो. द प्रिंट कलेक्टर/गैटी इमेजिस
एल बाउलेंजर (पेरिस) द्वारा प्रकाशित पुस्तक, इंडे एंग्लैज़, साइट्स एट पेसेजेज़ से ली गई 19वीं सदी के उत्तरार्ध की हैदराबाद की एक फ़ोटो. द प्रिंट कलेक्टर/गैटी इमेजिस

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'मुझे हमेशा से लगता रहा है कि मेरे समय के कहानीकार उस दौर की अंधेरी सच्चाइयों को इतिहासकारों या पत्रकारों से कहीं अधिक गहराई से पकड़ पा रहे थे. अगर आप सच में समझना चाहते हैं कि मेरी पीढ़ी के एक आम हैदराबादी मुसलमान की ज़िंदगी में उस समय क्या घट रहा था, तो आपको इतिहास की किताबों से ज़्यादा कथा साहित्य की तरफ़ रुख करना चाहिए. मेरी पीढ़ी ने उसी साहित्य से जाना कि उस समय क्या हो रहा था. वही हमारे लिए ‘तारीख़ू कथा’ थी, यानी इतिहास की कहानी. सच पूछिए तो असली इतिहास अक्सर वहीं दर्ज मिलता है.' 1948 में हैदराबाद के पुलिस एक्शन (सैन्य अभियान का प्रचलित नाम) की चश्मदीद 92 वर्षीय वरा लक्ष्मी सर्वदेवभट्टला ने 2014 में लेखक और कथा साहित्य के रिसर्चर अफ़सर मोहम्मद से एक मुलाक़ात में उपरोक्त बात कही थी. उस समय अफ़सर अपनी पुस्तक रिमेकिंग हिस्ट्री : 1948 पुलिस एक्शन एंड द मुस्लिम्स ऑफ़ हैदराबाद के लिए शोध कर रहे थे.

अफ़सर ने पाया कि यह राय केवल वरा लक्ष्मी की नहीं थी. जिन लोगों से उन्होंने बातचीत की, उनमें से कइयों की यही धारणा थी. कुछ लोगों को उस दौर की घटनाओं की बारीकियां साफ़-साफ़ याद थीं, लेकिन बहुतों के लिए उस समय की जानकरी का मुख्य स्रोत उस वक़्त का साहित्य ही था.

अफ़सर की यह किताब ऑपरेशन पोलो या पुलिस एक्शन से जुड़ी उन कहानियों की पड़ताल करती है जो इतिहास की मुख्य धारा में लगभग दबा दी गई हैं. सितंबर 1948 में हैदराबाद रियासत के भारत में विलय के दौरान पांच दिनों तक चले इस सैन्य अभियान ने राज्य को हिंसा की आग में झोंक दिया था, जो व्यापन रूप से मुस्लिम विरोधी कार्रवाई थी.

अफ़सर का ज़ोर इस बात को समझने पर था कि उस इतिहास की झलक चश्दीदों की यादों और साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से कैसे सामने आती है. इस किताब को लिखने की प्रेरणा उन्हें इस बात से भी मिली कि इस घटना की सार्वजनिक स्मृति पर अक्सर राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का प्रभुत्व दिखाई देता है. उदाहरण के तौर पर वह याद करते हैं कि 1998 में एल. के. आडवाणी ने कहा था कि 17 सितंबर यानी 1948 का वह दिन जब पुलिस एक्शन समाप्त हुआ, को 'तेलंगाना मुक्ति दिवस' के रूप में मनाया जाना चाहिए.

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