गल्प

उत्खनन से इतिहास को दफ़नाता भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

सिनौली में उत्खनन 2000 के दशक में शुरू हुआ. फिर दोबारा 2018 में एएसआई ने यहां उत्खनन शुरू किया. सिनौली तब से आरएसएस के इतिहास के विचारों को मानने वालों और उसे न मानने वालों के बीच एक जटिल विचारधारात्मक लड़ाई का केंद्र बन गया है. (दिनोदिया फ़ोटो)
सिनौली में उत्खनन 2000 के दशक में शुरू हुआ. फिर दोबारा 2018 में एएसआई ने यहां उत्खनन शुरू किया. सिनौली तब से आरएसएस के इतिहास के विचारों को मानने वालों और उसे न मानने वालों के बीच एक जटिल विचारधारात्मक लड़ाई का केंद्र बन गया है. (दिनोदिया फ़ोटो)
01 April, 2025

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दिल्ली कार्यालय में 21 जुलाई, 2023 का दिन हड़कंप भरा था. वाराणसी की एक जिला अदालत ने एएसआई के महानिदेशक को ज्ञानवापी मस्जिद स्थल पर एक 'वैज्ञानिक जांच/सर्वेक्षण/उत्खनन' करने और दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया था. ‘यह फ़ैसला रातोंरात हुआ, बहुत जल्दबाज़ी में,' उस दिन कार्यालय में मौजूद एक एएसआई अधिकारी ने मुझे नाम न छापने की शर्त पर बताया. एएसआई ने तुरंत काम शुरू कर दिया, लेकिन अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपीलों के चलते सर्वेक्षण कुछ दिनों के लिए रोक दिया गया. इस बीच, एएसआई के कर्मचारियों में कानाफूसी होने लगी कि जब सर्वेक्षण दोबारा शुरू होगा, तो उसका नेतृत्व कौन करेगा.

उस वक़्त मानवशास्त्री के. के. बासा एएसआई के कार्यवाहक महानिदेशक थे. बासा ने अतिरिक्त महानिदेश और अन्य निदेशकों सहित एएसआई के कई सीनियर अधिकारियों से परामर्श किया. इस क्रम में जिन नामों पर विचार किया गया उनमें से एक नाम आलोक त्रिपाठी का था. लेकिन, एक एएसआई अधिकारी ने मुझे बताया कि एक अन्य सीनियर अधिकारी त्रिपाठी के चयन पर सहमत नहीं थे. एक दूसरे एएसआई अधिकारी ने मुझे बताया कि त्रिपाठी को उत्खनन का कोई अनुभव नहीं था इसलिए उन्हें इस काम के लिए योग्य नहीं माना जा रहा था.

त्रिपाठी को 2021 में एएसआई का अतिरिक्त महानिदेशक नियुक्त किया गया था. इससे पहले वह सिलचर स्थित असम विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर थे. उन्होंने एएसआई द्वारा लक्षद्वीप जैसे स्थानों पर पानी के भीतर की गईं पुरातत्व परियोजनाओं का नेतृत्व किया था. पहले एएसआई अधिकारी के मुताबिक, बासा भी त्रिपाठी की नियुक्त के लिए राज़ी नहीं थे. बासा को लगा कि ऐसे विवादास्पद प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने के लिए निदेशक स्तर के अधिकारी को चुनना बेहतर होगा. एएसआई के भीतर त्रिपाठी को संस्कृति मंत्रालय के क़रीब माना जाता है. दूसरे अधिकारी ने बताया, ’कुछ लोग कहते हैं कि एडीजी पद के लिए भर्ती की शर्तें उन्हें ध्यान में रख कर ढीली की गई थीं.’

हालांकि, त्रिपाठी को ज्ञानवापी प्रोजेक्ट की ज़िम्मेदारी दे दी गई. उनकी नियुक्ति मुख्यधारा की मीडिया में ख़ूब चर्चित हुई, ख़ासकर हिंदी अख़बारों में. ख़बरें लगभग एक जैसी थीं. सभी ने त्रिपाठी को एक कुशल पुरातत्वविद बताया.