सिंधु सभ्यता में खाया जाता था मवेशियों का मांस : शोध

11 दिसंबर 2020
आभार : अक्षिता सूर्यनारायण
आभार : अक्षिता सूर्यनारायण

जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस (जेएएस )के जनवरी 2021 के अंक में “उत्तर पश्चिम भारत में सिंधु सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों में लिपिड अवशेष” शीर्षक से एक शोधपत्र प्रकाशित होगा. जेएएस की वेबसाइट पर उपलब्ध अध्ययन में वर्तमान हरियाणा और उत्तर प्रदेश से मिले मिट्टी के बर्तनों में मांस व्यंजन, जैसे सूअर, मवेशी, भैंस का मांस और डेयरी, पाया गया है. कारवां की एडिटोरियल फेलो अमृता सिंह को दिए ईमेल साक्षात्कार में फ्रांस में पोस्ट-डॉक्टरल शोधकर्ता अक्षिता सूर्यनारायण, जिन्होंने अध्ययन का नेतृत्व किया, ने इन निष्कर्षों की व्याख्या की है.

 अमृता सिंह : क्या आप अध्ययन के निष्कर्षों और इसकी प्रक्रिया के बारे में बता सकती हैं?

अक्षिता सूर्यनारायण : अध्ययन उन अवशोषित लिपिड की जांच करता है जो प्राचीन मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों में अंतर्निहित है. मिट्टी के बर्तन में चमक नहीं होती और वे बहुत छिद्रपूर्ण होते हैं और खाद्य पदार्थों को पकाने या प्रसंस्करण की प्रक्रिया से वसा, मोम और अन्य जैव रासायनिक घटक बर्तन की परत पर अवशोषित हो जाते हैं. वसा और तेल कम खराब होते हैं और मिट्टी के बर्तनों के भीतर हजारों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं (हालांकि वे बदल जाते हैं और टूट जाते हैं).

अध्ययन में प्रयुक्त तकनीक को लिपिड अवशेष विश्लेषण कहा जाता है. मिट्टी के बर्तनों का एक छोटा सा टुकड़ा साफ किया जाता है और फिर उसे पीस दिया जाता है और मिट्टी के बर्तनों से लिपिड निकालने के लिए सॉल्वैंट्स का उपयोग किया जाता है. अर्क का विश्लेषण गैस क्रोमैटोग्राफी (एक विश्लेषणात्मक तकनीक) और गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री (एक विश्लेषणात्मक विधि) के माध्यम से किया जाता है, जिसके जरिए विभिन्न यौगिकों को अलग किया जाता है और उनकी पहचान की जाती है. इसके बाद अर्क के भीतर वसा के कुछ भी समस्थानिक विश्लेषण का उपयोग करके विश्लेषण किया जाता है, जो विभिन्न प्रकार के जानवरों के मांस, जैसे कि जुगाली करने वाले और जुगाली न करने वाले, और डेयरी उत्पाद के बीच अंतर करने में मदद करता है .

यह उत्तर पश्चिमी भारत में सिंधु सभ्यता के ग्रामीण और शहरी स्थलों से मिट्टी के बर्तनों के लिपिड अवशेषों पर पहला व्यवस्थित अध्ययन है. लिपिड अवशेष विश्लेषण दूध उत्पादों, मांस और उत्पादों के संभावित मिश्रण या मिट्टी के बर्तनों में साग-सब्जी के उपभोग के रासायनिक सबूत देता है. डेयरी उत्पादों के लिए आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जिनमें छिद्रित बर्तन भी शामिल हैं, जो पहले डेयरी उपयोग से जुड़े थे. जुगाली करने वाले मांस उत्पादों के प्रसंस्करण के लिए सबूत हैं लेकिन ये मवेशी भैंस, भेड़ या बकरी या हिरण हो सकते हैं. अधिकांश बर्तनों में सूअरों जैसे जुगाली न करने वाले जानवरों के मांस के प्रसंस्करण का संकेत मिलता है लेकिन परिणाम अभी भी अस्पष्ट हैं और कई व्याख्याएं संभव हैं जिसमें यह भी शामिल है कि यह उत्पादों का मिश्रण या पादप उत्पाद हैं. बस्तियों में बर्तनों के उपयोग में समानताएं हैं, जो सामान्य क्षेत्रीय पाक प्रथाओं का सुझाव दे सकती हैं. शहरीकरण में आई गिरावट के बाद भी ग्रामीण बस्तियों में निरंतर बर्तनों के इस्तेमाल करने के प्रमाण हैं और इस क्षेत्र में बढ़ती अम्लता की शुरुआत के दौरान, यह दर्शाता है कि सांस्कृतिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों के बावजूद रोजमर्रे की जिंदगी जारी रही. 

अमृता सिंह कारवां की एडिटोरियल फेलो हैं.

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