‘मैं ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहती थी’

हिंदुत्व के दौर में इतिहास लेखन की चुनौतियों पर रोमिला थापर से बातचीत

सौजन्य: नवीन किशोर
सौजन्य: नवीन किशोर

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इतिहासकार रोमिला थापर का संस्मरण, जस्ट बीइंग, सीगल बुक्स से प्रकाशित हुआ है. इस किताब में उन्होंने अपने बचपन, लंदन में पढ़ाई, जेएनयू में अध्यापन, यात्राओं और एक जन बुद्धिजीवी के रूप में अपने अनुभवों को समेटा है. इस इंटरव्यू में कारवां के कार्यकारी संपादक हरतोष सिंह बल ने उनसे उनकी किताब, इतिहास के प्रति उनके नज़रिए और समकालीन भारत में इतिहास-लेखन की चुनौतियों और अवसरों पर बातचीत की है.

पिछले कुछ सालों में आप सार्वजनिक बहसों में लगातार सक्रिय रही हैं. यह आपकी अब तक की सबसे निजी किताब है. इसे लिखने की प्रेरणा कैसे मिली?

दरअसल, इसे लिखने में काफ़ी समय लगा. मुझे हमेशा लगता था कि मैं संस्मरण लिखने के क़ाबिल नहीं हूं क्योंकि अकादमिक लेखन की इतनी आदत हो चुकी थी कि हर चीज़ वैसी ही लगने लगती थी. जब भी लिखती, तो ख़ुद से कहती, ‘इसे पढ़ कर लोग बोर हो जाएंगे.’

प्रकाशकों और दोस्तों को भी मुझे बहुत मनाना पड़ा. मैं चाहती थी कि किताब मेरे गुज़र जाने के बाद प्रकाशित हो क्योंकि मैं अपने बारे में आने वाली प्रतिक्रियाओं का सामना नहीं करना चाहती थी. लेकिन कोविड लॉकडाउन के दौरान लिखने का समय मिला और धीरे-धीरे किताब तैयार होती गई. यह उम्मीद से कहीं ज़्यादा बड़ी बन गई. लोगों ने कहा कि इसे दो खंडों में बांट दीजिए, लेकिन मैंने मना कर दिया क्योंकि दूसरा खंड बहुत कम लोग ही पढ़ते हैं.

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