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गुजरात के नर्मदा ज़िले के केवड़िया (एकता नगर) में स्थित स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है. इसका निर्माण भारत के प्रथम गृहमंत्री और स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक सरदार वल्लभभाई पटेल की स्मृति में किया गया है. प्रतिमा का नाम ही इस बात का संकेत देता है कि पटेल को मुख्यतः स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 500 से अधिक रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराकर आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य की नींव को सुदृढ़ करने के लिए याद किया जाता है.
इस प्रतिमा की परिकल्पना नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2010 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने दसवें वर्ष के दौरान की थी. 31 अक्टूबर, 2013 को, पटेल की जयंती के दिन, इसके शिलान्यास के साथ यह परियोजना औपचारिक रूप से आरंभ हुई. संयोगवश, यही वह समय था जब मोदी आगामी लोकसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में अपने राष्ट्रीय अभियान की तैयारी कर रहे थे. पांच वर्ष बाद, 31 अक्टूबर, 2018 को, जब वह अपने दूसरे कार्यकाल के लिए जनसमर्थन जुटाने में लगे थे, तब इस प्रतिमा का भव्य उद्घाटन किया गया. हालांकि, उद्घाटन समारोह से एक दिन पहले लगभग 300 सामाजिक कार्यकर्ताओं को, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी किसानों की थी, एहतियातन हिरासत में ले लिया गया था, ताकि प्रतिमा के विरोध में प्रस्तावित विशाल प्रदर्शन को रोका जा सके. इन लोगों का आरोप था कि प्रतिमा के निर्माण के लिए उनकी भूमि का अधिग्रहण किया गया और उनके अधिकारों की अनदेखी की गई.
चूंकि हिंदुत्ववादी राजनीति के वैचारिक पुरोधाओं की स्वतंत्रता संग्राम के राष्ट्रीय नेतृत्व में कोई विशेष उपस्थिति नहीं रही, इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने समय-समय पर कांग्रेस परंपरा के कुछ प्रमुख नेताओं, विशेषकर सरदार पटेल और सुभाषचंद्र बोस, को अपने राजनीतिक आख्यान में प्रमुख स्थान देने का प्रयास किया है. ये दोनों नेता विभिन्न अवसरों पर जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी की नीतियों एवं विचारों से असहमति व्यक्त कर चुके थे. हाल के वर्षों में कुछ गैर-पेशेवर इतिहासकारों और लेखकों द्वारा लिखी गई अनेक जीवनियां, जिनमें से कुछ स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के उद्घाटन वर्ष में प्रकाशित हुईं, पटेल के प्रति कथित ऐतिहासिक अन्याय और उपेक्षा को अपना केंद्रीय विषय बनाती हैं.
गांधी और नेहरू की तुलना में पटेल के लिखित दस्तावेज़ अपेक्षाकृत कम उपलब्ध हैं, इसलिए इन कृतियों का आधार उनके वास्तविक लेखन से अधिक इस कल्पना पर टिका है कि यदि उन्हें हमेशा 'दूसरी पंक्ति' में न रखा गया होता, तो वह भारत के लिए क्या कर सकते थे. इन लेखकों का उद्देश्य मानो इतिहास में पटेल का 'पक्ष' प्रस्तुत करना और उन्हें उनका उचित सम्मान दिलाना है. इन जीवनीकारों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि गांधी ने 1929, 1937 और 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पटेल के स्थान पर जवाहरलाल नेहरू का समर्थन किया. विशेष रूप से 1946 में यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि उस समय कांग्रेस अध्यक्षता के साथ अंतरिम सरकार का नेतृत्व और अंततः स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने की संभावना भी जुड़ी हुई थी. उल्लेखनीय है कि उस मौके पर 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने पटेल का नाम प्रस्तावित किया था, लेकिन गांधी की प्राथमिकता नेहरू के पक्ष में रही.
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