एनसीआर का मज़दूर आंदोलन: पुलिसिया दमन और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार मज़दूर

नोएडा के कासना जेल में बंद मज़दूरों से मुलाक़ात का इंतज़ार करते परिजन. अदालत में गिरफ़्तार मज़दूरों की पैरवी कर रहे वकीलों का कहना था कि नोएडा पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए श्रमिकों की संख्या 1,000 से 1,200 के बीच थी. (कारवां के लिए सिब्तैन हैदर)

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10 अप्रैल, 2026 को राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा के विशेष आर्थिक ज़ोन (एनसेज़), जिसे स्थानीय लोग बाउंड्री कहते हैं, की कंपनियों के मज़दूरों ने हड़ताल कर दी. उनकी मांग थी कि वेतन बढ़ाया जाए, काम करने की स्थिति में सुधार हो और आठ घंटे की ड्यूटी हो. उनकी और भी मांगें थीं जैसे, ओवरटाइम के दोगुने पैसे मिलें और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी अनिवार्य हो.

13 अप्रैल तक मज़दूर आंदोलन शांतिपूर्ण था, लेकिन उसी दिन हिंसा भड़क उठी. एनसेज़ के पास सेक्टर 84 स्थित मदरसन ग्रुप के एक कर्मचारी दिलीप कुमार ने मुझे बताया, ‘13 अप्रैल की सुबह कंपनी के रात की पाली वाले मज़दूरों को बाहर निकलने नहीं दिया गया क्योंकि मैनेजमेंट को शक था कि वे गेट के बाहर इकट्ठा हो रहे प्रदर्शनकारियों में शामिल हो जाएंगे. उसी समय दिन की पाली वालों को अंदर आने से भी रोक दिया गया. मैनेजमेंट के इस कदम का मज़दूरों ने विरोध किया तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई. इसके बाद पुलिस ने आंदोलनकारी मज़दूरों पर लाठीचार्ज किया. जब यह ख़बर अन्य कंपनियों में पहुंची, तो नोएडा की अनेक कंपनियों के मज़दूर भी आंदोलन करने लगे. समाचार पत्र ‘हिंदू’ में 25 अप्रैल को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, अदालत में गिरफ़्तार मज़दूरों की पैरवी कर रहे वकीलों का कहना था कि नोएडा पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए श्रमिकों की संख्या 1,000 से 1,200 के बीच थी.

6 मई को वेब पोर्टल ‘स्क्रोल’ में प्रकाशित श्रम मामलों की जानकार और एक्टिविस्ट राखी सहगल के एक लेख के अनुसार उत्तर प्रदेश पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170 के तहत जिन तक़रीबन 1,100 मज़दूरों को हिरासत में लिया था, हालांकि इनमें से ज़्यादातर को छोड़ दिया गया है, लेकिन रिहाई के 15 दिन से ज़्यादा बीत जाने के बावजूद मज़दूरों के फ़ोन या उनका निजी सामान अब तक वापस नहीं किया गया है. उस रिपोर्ट के अनुसार, फ़ोन के न होने से मज़दूरों को पैसों की तंगी सहित कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

(एक)

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