“मृत्युदंड न्याय नहीं प्रतिशोध है”, अनूप सुरेंद्रनाथ

10 फ़रवरी 2020
रफ कट प्रोडक्शन
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अनूप सुरेंद्रनाथ दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के केंद्र प्रोजेक्ट 39-ए के निदेशक हैं. इस केंद्र का उद्देश्य भारत में आपराध-न्याय प्रथाओं और नीतियों का अध्ययन करना है. इसने भारत में पहली बार मृत्युदंड पर शोध कर 2016 में एक रिपोर्ट जारी की. इसके बाद से केंद्र लगातार देश में मत्युदंड संबंधी तथ्यांक जारी कर रहा है. केंद्र ने पाया है कि भारत में मृत्युदंड पाने वाले अधिकांश लोग गरीब या निचली जातियों से होते हैं.

भारत में अपराधों को नियंत्रित करने के लिए मृत्युदंड कितनी सफल कानूनी व्यवस्था है और संविधान और कानून इसे कैसे परिभाषित करते हैं और इससे संबंधित अन्य विषयों पर कारवां की वैब एडिटर सुरभि काँगा ने अनूप सुरेंद्रनाथ से बातचीत की.  

सुरभि काँगा : प्रोजेक्ट 39-ए की पहली मृत्युदंड रिपोर्ट में राज्य-वार मृत्युदंड का डेटा दिया गया था. आपको राज्यों में क्या पैटर्न दिखाई दिया?

अनूप सुरेंद्रनाथ : हमने मई 2016 में जो डेटा प्रकाशित किया था, वह एक निश्चित समय का था और जैसा कि हम देख रहे हैं, चीजें स्पष्ट रूप से बदली हैं. राज्य-वार आंकड़ों में सबसे आश्चर्यजनक यह रहा कि भारत में अशांत क्षेत्रों में मृत्युदंड के बहुत कम मामले सामने आए. चाहे वह जम्मू-कश्मीर हो या मध्य भारत या उत्तर-पूर्व, मृत्युदंड का बहुत कम इस्तेमाल होता है. मृत्युदंड की एक निश्चित श्रमसाध्य प्रकृति होती है इसलिए इसका राज्य के लिए कोई वास्तविक उपयोग नहीं है - राज्य अशांत क्षेत्रों में अन्य प्रकार की हिंसा और हत्याओं में अधिक विश्वास रखता है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि आतंकवाद और यौन हिंसा से संबंधित मामलों में मृत्युदंड की लोकप्रियता कम से कम इस दशक में कम है. और उन सभी देशों की तरह जहां मृत्युदंड है, मृत्युदंड का बोझ हमारे समाज के सबसे गरीब और चरम हाशिए पर खड़े लोगों पर पड़ता है.

2018 में कठुआ की घटनाओं और निश्चित रूप से दिसंबर 2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले ने इस आम धारणा को मजबूती दी कि कठोर सजा यौन हिंसा का सबसे कारगर जवाब है. (2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में एक आठ वर्षीय बच्ची के अपहरण, बंदी बनाए जाने, बलात्कार और हत्या के लिए जून 2019 में छह लोगों को दोषी ठहराया गया था.) महिला अधिकार आंदोलन और बाल अधिकार समूहों के विरोध के बावजूद, 2013 और 2018 में, भारतीय दंड संहिता और पॉस्को कानून (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012) में 2019 में संशोधन कर मृत्युदंड का विधायी विस्तार किया गया. मध्य प्रदेश में 2018 में 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार के लिए मौत की सजा का प्रावधान रखने के लिए संशोधन लाया गया. बाद में 2019 की शुरुआत में जब बच्चों के साथ बलात्कार के मामले में पॉस्को में संशोधन कर मौत की सजा देने का प्रावधान किया गया, तो आप देखेंगे कि मध्य प्रदेश मृत्युदंड के मामले में सबसे अव्वल राज्य हो गया.

सुरभि कॉंगा द कैरवैन की वेब एडिटर हैं.

Keywords: death penalty capital punishment Delhi gang-rape Supreme Court of India
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