राजनीति से प्रेरित है दिल्ली हिंसा की पुलिस जांच : अपूर्वानंद

27 जून 2020
कारवां के लिए शाहिद तांत्रे
कारवां के लिए शाहिद तांत्रे

अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर होने के साथ एक मानव अधिकार कार्यकर्ता भी हैं. उन्होंने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार के तहत हिंदुत्व के उभार पर बेबाकी से लिखा और बोला है. पिछले साल दिसंबर में जब नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक पंजिका के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन हो रहे थे तो अपूर्वानंद ने इस कानून के खिलाफ निरंतर आवाज उठाई. साथ ही वह जामिया मिलिया इस्लामिया में पुलिस के अत्याचार, बीजेपी से जुड़े छात्रों द्वारा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों पर हमले और शैक्षणिक संस्थानों के सरकारी दमन के खिलाफ हमेशा मुखर रहे हैं. अपूर्वानंद देश के उन बुद्धिजीवियों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में से एक हैं जो इस साल फरवरी में दिल्ली में हुई हिंसा की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं. उस हिंसा में मारे गए 50 से अधिक लोगों में ज्यादातर मुस्लिम थे. दिल्ली हिंसा की पुलिस जांच, नागरिकता कानून और न्यायपालिका की भूमिका पर कारवां के रिपोर्टिंग फेलो तुषार धारा ने अपूर्वानंद से बातचीत की.

तुषार धारा : नागरिकता संशोधन कानून पास होने से लेकर दिल्ली हिंसा के बीच जो कुछ घटा उसे कैसे देखते हैं?

अपूर्वानंद : जब नागरिकता संशोधन कानून पारित हुआ तो विपक्षी दलों की चुप्पी हैरान करने वाली थी. लेकिन उत्तर प्रदेश, दिल्ली और अन्यत्र जगहों में लोगों ने आंदोलन किए. दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों सहित अन्य लोगों ने कानून का विरोध किया. लेकिन विरोधियों का बर्बर दमन किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने दमन का संज्ञान लेने से इनकार कर दिया. उसने बस यह कहा कि नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों को कोई हक नहीं है कि वे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाएं और यदि आंदोलनकारी चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए तो वे सड़क छोड़ कर ही अदालत आएं.

तब शाहीन बाग शुरू हुआ. शाहीन बाग के रूप में इन घटनाओं ने एक अनूठा स्वरूप धारण कर लिया. वह औरतों का अपने परिवारों के समर्थन से चलाया गया ऑर्गेनिक आंदोलन था. शाहीन बाग ने संविधान की प्रस्तावना को नागरिकता में बराबरी के अधिकार का नारा बना दिया. नागरिकता संशोधन कानून भारतीय नागरिकता हासिल करने में धर्म के आधार पर भेदभाव करता है जो संविधान की भावना के खिलाफ है. यही बात है जो शाहीन बाग का आंदोलन बतलाना चाहता था और इसके लिए उसने शांतिपूर्ण आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया. पहली बार भारत के मुसलमान नागरिकता का दावा कर रहे थे.

तुषार धारा : शाहीन बाग का क्या असर हुआ?

तुषार धारा कारवां में रिपोर्टिंग फेलो हैं. तुषार ने ब्लूमबर्ग न्यूज, इंडियन एक्सप्रेस और फर्स्टपोस्ट के साथ काम किया है और राजस्थान में मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ रहे हैं.

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