संविधान सभा से लेकर इंद्रा साहनी मामले तक, आर्थिक आरक्षण बहस पर एक नजर

संविधान सभा ने भारत में आरक्षण की प्रकृति और दायरे पर बहस की थी.
विकिमीडिया कॉमनस
संविधान सभा ने भारत में आरक्षण की प्रकृति और दायरे पर बहस की थी.
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"आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों" के नागरिकों के लिए 12 जनवरी को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत तक आरक्षण लागू करने के लिए भारतीय संविधान में 103वां संवैधानिक संशोधन किया गया. इस संशोधन में वे नागरिक शामिल नहीं हैं जो पहले ही संविधान के अनुच्छेद 15 (4) और (5), और 16 (4) के तहत शामिल थे. संविधान के ये अनुच्छेद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से संबंधित हैं. वास्तव में, यह आरक्षण केवल उच्च जातियों के व्यक्तियों पर ही लागू होगा. सामाजिक रूप से हाशिए पर खड़े समूहों के पिछड़ेपन को दूर करने पर केंद्रित मौजूदा आरक्षणों के विपरीत, 10 प्रतिशत कोटा केवल व्यक्तिगत आर्थिक कमजोरी पर केंद्रित है और केवल उच्च-जाति के उन परिवारों पर लागू होगा जिनकी वार्षिक आय 8 लाख से कम है.

इसकी घोषणा होने के कुछ ही समय बाद, आरक्षण विरोधी गैर-सरकारी संगठन यूथ फॉर इक्वैलिटी, वकील रीपक कंसल और पवन तथा राजनीतिक टिप्पणीकार तहसीन पूनावाला ने सुप्रीम कोर्ट में संशोधन को चुनौती देने वाली अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं. याचिकाओं में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी श्रेणियों के व्यक्तियों को छोड़कर आरक्षण के लिए एकमात्र आधार के रूप में आर्थिक मानदंडों के उपयोग पर सवाल उठाया गया था. अदालत ने याचिकाओं पर सुनवाई करने का फैसला किया, लेकिन संशोधन को लागू करने पर रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया. इस मुद्दे पर 28 मार्च को शीर्ष अदालत दलीलें सुनेगी जिसके बाद तय किया जाएगा कि क्या याचिकाओं को पांच जजों वाली संविधान पीठ को भेजने की जरूरत है या नहीं.

आर्थिक मानदंडों के आधार पर आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में दिए जा रहे तर्क नए नहीं हैं. ये तर्क संविधान सभा की बहसों में अपनी सबसे पुरानी बान​गी तलाशते हैं. हालांकि, संविधान सभा ने केवल आर्थिक रूप से परिभाषित पिछड़ेपन को कभी भी आरक्षण की कसौटी नहीं माना. यहां तक कि जिन सदस्यों ने आरक्षण के लिए आर्थिक आधार का समर्थन किया, उन्होंने भी ऐसे समूहों के लिए इसका समर्थन किया जिन्हें वे सामाजिक रूप से वंचित या कुछ अन्य मामलों में पिछड़े हुए मानते थे. संविधान को अपनाने के बाद, सरकार द्वारा नियुक्त कई आयोगों ने भारत में आरक्षण की प्रकृति पर विचार किया है.

स्वतंत्र भारत के संविधान की रूपरेखा बनाने के लिए 1946 में स्थापित संविधान सभा, आरक्षण को अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने के लिए एक राजनीतिक सुरक्षा के रूप में लेती थी. बहस का मार्गदर्शन करने वाला निर्विरोध व्यापक सिद्धांत यह था कि आबादी का हर वर्ग, चाहे वह “संख्यात्मक रूप से या राजनीतिक रूप से अल्पसंख्यक” हो, “देश के प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व और एक उचित आवाज होना चाहिए.” सदन में केवल इस बात पर बहस थी कि ऐसे प्रतिनिधित्व को कैसे स्थापित किया जाए.

1980 में प्रस्तुत मंडल आयोग की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि पिछड़े वर्गों की पहचान करने में जाति के बजाय आर्थिक मापदंड का उपयोग, “भारतीय समाज में सामाजिक पिछड़ेपन की उत्पत्ति की अनदेखी” है.

मालविका प्रसाद वकील और विधि अध्ययन एवं शोध राष्ट्रीय अकादमी में डॉक्टोरल फेलो हैं.

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