बहुजन भारत के भरोसे को तोड़ रहे राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय

राष्ट्रीय न्याय विज्ञान विश्वविद्यालय, कोलकाता. विश्वरूप गांगुली/विकीमीडिया कॉमन्स
राष्ट्रीय न्याय विज्ञान विश्वविद्यालय, कोलकाता. विश्वरूप गांगुली/विकीमीडिया कॉमन्स

{एक}

“महामारी के चलते कॉलेज बंद हो जाने के बाद यहां की शामों ने मुझे टूटने नहीं दिया,” कोलकाता स्थित राष्ट्रीय न्याय विज्ञान विश्वविद्यालय के एक छात्र ने साल 2020 की गर्मियों में अपने घर की पानी की टंकी की छत पर बैठ कर मुझे यह बात सुनाई. छात्र के घर की पानी की टंकी दोनों तरफ से उसके घर से ऊंची इमारतों के बीच है. उस छात्र में ने मुझसे कहा, “मेरे कॉलेज में पढ़ने वाले अलग ही दुनिया में रहते हैं. वे अच्छी इंटर्नशिप पा जाते हैं और पढ़ाई में अव्वल रहते हैं. लेकिन मैं चाहे जितनी मेहनत कर लूं वहीं का वहीं हूं.”

कानून की पढ़ाई कर रहे इस छात्र को एक जन्मजात स्वास्थ्य संबंधी जटिलता है. इस जटिलता ने उसे गंभीर रूप से विकलांग कर दिया है. डॉक्टरों ने पहले ही कह दिया था कि उसे विशेष प्रकार की शिक्षा की जरूरत होगी. छात्र को कानून की पढ़ाई करने की प्रेरणा इस उम्मीद से मिली थी कि ऐसा करने से उसके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा. साथ ही, छात्र को राजनीति और समाज में गहरी रुचि भी है.

17 साल की उम्र में इस छात्र ने बेहद प्रतिस्पर्धी मानी जाने वाली संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा निकाल ली. इस परीक्षा को पास करने का अर्थ था कि यह छात्र देश के 23 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (एनएलयुओं) में से किसी एक में प्रवेश ले सकता है. कोविड-19 महामारी से पहले इस छात्र ने कोलकाता स्थित राष्ट्रीय न्याय विज्ञान विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया. यही वह जगह थी जहां एक बार यूं ही बातों-बातों में हम दोनों की मुलाकात हुई. मैं भी वहां पढ़ रहा हूं.

घर की छत पर उसने मुझे बताया कि वह जानता है कि मैं उसे ढाढस देने के लिए कहूंगा कि उसके साथ जो हो रहा है वह उसकी गलती नहीं है और यह भी कि महामारी ने मेरे जैसे करोड़ों छात्र-छात्राओं की पढ़ाई बाधित की है और उन्हें अलगाव की स्थिति में धकेल दिया है. उसने कहा, “लेकिन कई बार खुद से यह कहना कि यह मेरी गलती नहीं है बहुत मुश्किल होता है. यह इतना आसान नहीं है.”

राष्ट्रीय न्याय विज्ञान विश्वविद्यालय में भी देश के अन्य एनएलयुओं की तरह विशेष जरूरतों वाले छात्रों की मदद की खास व्यवस्था नहीं है. ऐसे छात्र जब प्रवेश लेते हैं तो ये इंक्रीजिंग डायवर्सिटी बाय इंक्रीजिंग एक्सेस जैसी गैर लाभकारी संस्था की मदद से उपलब्ध विशेष अकादमिक स्रोतों वालीं सुधार कक्षाओं से सहायता पाते हैं लेकिन विश्वविद्यालय से उन्हें बहुत कम मदद मिलती है. क्योंकि यह छात्र बहुजन समाज से आता है इसलिए मुश्किल और बढ़ जाती है. इसी वजह से एनएलयू की संभ्रांत संस्कृति से खुद को बाहर का पाता है. उसने मुझे कहा, “मैं जानता था कि मैं कभी इस संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाऊंगा. मेरे आस-पास ऐसे लोगों की भीड़ है जो संसाधनों में मुझसे बहुत बेहतर हालत में हैं. ये ऐसे छात्र हैं जो इस कॉलेज की संस्कृति को निर्धारित करते हैं. से लोग सफलता और छात्र जीवन की मौज-मस्ती के पैमाने हैं. उनकी भाषा लॉ स्कूल की भाषा है.”

यह छात्र अपने पहले साल में बहुत कम लोगों से परिचय बना सका. महामारी के वर्षों में यह स्थिति अधिक खराब हो गई और मैंने पाया ही आगे के वर्षों में उसे इस संस्थान में टिके रहने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा. ऑनलाइन पढ़ाई से विशेष जरूरतों वाले विद्यार्थियों को बेहद परेशानी हुई लेकिन यहां के शिक्षक उनकी परेशानियों से बेखबर रहे और ऐसे शिक्षकों को छात्रों की परेशानियों के प्रति संवेदनशील बनाने के बहुत कम गंभीर प्रयास किए गए. जब मैंने न्याय विज्ञान विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर एन. के. चक्रवती को ईमेल लिख कर पूछा कि विशेष जरूरतों वाले छात्रों की मदद के लिए उनकी यूनिवर्सिटी क्या प्रयास कर रही है तो उन्होंने मुझसे उलटा पूछ लिया कि मैं उन्हें बताऊं कि मैं किन छात्रों के बारे में पूछ रहा हूं. उन्होंने लिखा, “मुझे उनका नाम और रोल नंबर दीजिए. मैं उनके सामने आपको बताऊंगा कि जो आप कह रहे हैं वह ठीक नहीं है और आपकी जानकारी में पूर्वाग्रह है.”

जब विश्वविद्यालय का कैंपस दुबारा खुला तो वह छात्र कोलकाता लौट आया. लेकिन परीक्षा देने में जो अढ़चन है और प्रशासनिक ढांचे से संबंधित सवाल बने हुए हैं और साथ ही ऐसे छात्रों का महामारी से जनमा मानसिक तनाव भी खत्म नहीं हुआ है. यह छात्र परेशानियों से लड़ता अपना पांच वर्षीय पाठ्यक्रम पूरा कर रहा है. इस छात्र की कहानी भारत भर में फैले इसके जैसे अनगिनत छात्र-छात्राओं की है जो देश के शीर्ष विधि विश्वविद्यालय में इसी प्रकार का संघर्ष रोजाना झेल रहे हैं और जिनके बारे में इन सालों में कुछ नहीं किया गया.

दिसंबर 2021 में नई दिल्ली के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट होने वाले विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमन्ना ने कहा था, “कई ऐसे कारण हैं जिनके चलते एनएलयू से पास होने वाले ज्यादातर विद्यार्थी कारपोरेट कंपनियां ज्वाइन कर लेते हैं. यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण होकर भारत की अदालतों में प्रैक्टिस करने वाले ज्यादा नहीं होते. संभवत यह भी एक कारण है कि क्यों एनएलयू के पासआउट छात्रों को ऐसे एलीटवादी समझा जाता है जो सामाजिक यथार्थ से कटे हुए हैं.”

रमन्ना की यह टिप्पणी ने कइयों को सकते में डाल दिया क्योंकि ऊंचे कानूनी दायरों में- चाहे वह न्यायपालिका या बार काउंसिल हो अथवा विधानसभाएं या संसद- विधान है कि कि वहां एनएलयू के सिर्फ गुणगान गाए जाते हैं, आलोचना नहीं की जाती. लेकिन इस छात्र की तरह बहुत से अन्य भी हैं जो यह मानते हैं कि मुख्य न्यायधीश की टिप्पणी सतही है जो संस्थानों की समस्या की जड़ों को नहीं छूती तक नहीं.

रमन्ना की बात सही है कि एनएलयू, जो सार्वजनिक विश्वविद्यालय हैं, में पढ़ने वाले विद्यार्थी निजी कंपनियों की सेवा में लगे हैं. लेकिन वहां पास होने वाले विद्यार्थियों का इस तरह का कैरियर का चुनाव और उनका संभ्रांतवाद बड़ी महामारी का एक लक्षण भर है. जबकी इसकी जड़ में महंगी फीस, स्कॉलरशिप के बहुत कम प्रोग्राम और हाशिए के लोगों को आरक्षण देने में इनकी आनाकानी मुख्य वजहें हैं.

रमन्ना ने इन विषयों पर खुल कर बात नहीं की. ज्यादातर लोग ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि इससे संस्थागत संकट की जड़ प्रकाश में आ जाती है जिससे ऊंची अदालतों के जजों, एनएलयू के कुलपतियों और इनके शीर्ष पदों पर आसीन लोगों पर सवाल उठने लगते हैं.

पिछले 35 सालों में भारत के 18 राज्यों में 23 एनएलयू की स्थापना हुई है. उत्तर प्रदेश में जहां पहले से ही एक एनएलयू है वहां एक और एनएलयू बन रहा है. इसके साथ ही त्रिपुरा, उत्तराखंड और सिक्किम में भी एनएलयू की स्थापना प्रस्तावित है. राष्ट्रीय संस्थान रैंकिंग फ्रेमवर्क के शीर्ष दस लॉ कॉलेजों में सात एनएलयू है. इसके अलावा 2020 में बेंगलुरु का राष्ट्रीय लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी एशिया के शीर्ष 10 विधि विश्वविद्यालय की सूची में था.

एनएलयू बहुत सीमित छात्रों को लेते हैं. यहां से लगभग 2600 छात्र प्रति साल ग्रेजुएट होते हैं जबकि देशभर के अन्य विधि कॉलेजों हर साल 90000 से अधिक विद्यार्थी पास होते हैं. एनएलयू से पासआउट लोगों की सूची में भारत के कुछ प्रमुख नाम है. यहां के पासआउट संयुक्त राष्ट्र, लंदन की कानून कंपनी मैजिक सर्किल, न्यूयॉर्क स्टेट बार एसोसिएशन और भारत और बाहर के शीर्ष मीडिया संस्थानों में हैं. इसके अलावा ये पासआउट भारत की शीर्ष कारपोरेट कंपनियों में कानूनी पदों पर आसीन है. एनएलयू अपने प्लेसमेंट रिकॉर्ड की खूब डींग हांकता है. यह बात बताई जाती है कि राष्ट्रीय स्तर की कारपोरेट कंपनियों में जाने वाले इसके छात्रों की औसत कमाई प्रति साल 15 लाख रुपए होती है. इसके अलावा ये छात्र विदेशी कंपनियां भी ज्वाइन करते हैं जहां ये उपरोक्त धन से कई गुना अधिक कमाते हैं. इन छात्रों को मिलने वाला वेतन भारत के शीर्ष आईआईटी से पास होने वालों के बराबर है. इसके अलावा भारत के मध्यम वर्ग की कल्पना में एनएलयू ने आईआईटी के विकल्प के रूप में स्थान बना लिया है.

कॉमन लॉ प्रवेश परीक्षा भारत की कठिनतम परीक्षाओं में से है और इसे सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में से एक कहा जाता है. विधि के पेशे में प्रवेश पाने के इच्छुक विद्यार्थियों में से केवल पांच प्रतिशत छात्र एनएलयू में प्रवेश पा पाते हैं और इसका भी एक बहुत छोटा हिस्सा भारत के शीर्ष एनएलयू- बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता, जोधपुर और गांधीनगर- में दाखिला पाता है.

परंतु जो समस्याएं भारत के अन्य एलीट विश्वविद्यालयों में हैं उन्हीं समस्याओं से एनएलयू भी ग्रस्त है. एनएलयू के शिक्षकों और छात्रों में भारतीय समाज की विविधता का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं मिलता और इन क्षेत्रों में भारत की ऊंची जाति और ऊंचे वर्ग के लोगों का वर्चस्व है. उदाहरण के लिए कई एनएलयू में अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. जिन एनएलयू में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था है वहां यह आरक्षण ऑल इंडिया कोटा के अंतर्गत नहीं दिया जाता. इसी तरह एनएलयू के शिक्षकों की भर्ती में भी विविधता की कमी है. बहुजन यानी दलित, आदिवासी और गैर प्रभुत्वशाली ओबीसी जातियां, जो कि भारत की आबादी का अधिकांश हिस्सा है, के लिए ये संस्थान मददगार नहीं है और कहीं-कहीं तो खुले तौर पर शत्रुभाव रखते हैं. एनएलयू में पढ़ाई कर रहे हाशिए के समाज के कई छात्रों ने मुझे बताया कि एक्सक्लूजन वाली संस्कृति के चलते इन छात्रों को सामान्य छात्र जीवन से कट कर रहना पड़ता है जिससे उनका शैक्षिक प्रदर्शन प्रभावित होता है. यह बात मेरे विश्वविद्यालय में साफ देखी जा सकती है जहां अधिकतर मूट कोर्ट प्रतियोगिताओं, छात्र सोसाइटियों, कॉलेज पत्रिकाओं एवं अन्य प्रकार की गतिविधियां और अनुभवों में जिनसे छात्रों का भविष्य सवर सकता है, बहुजन छात्रों का प्रतिनिधित्व कम होता है.

(मैं खुद एक उत्पीड़क जाति से हूं और मुझे ऊंची जाति के विशेषाधिकारों का पता है. बहुजन छात्रों के अनुभवों को यहां प्रस्तुत करने की मेरी भावना के पीछे मौकापरस्ती या उनके अनुभव का दोहन करने की मंशा नहीं है. अपना अनुभव मुझसे साझा करने वाले छात्रों का मैं आभारी हूं.)

संपूर्ण भारतीय विधि बिरादरी के भीतर इसी प्रकार का एलीटिज्म और विशिष्टता का भाव है. बार और बेंच के वरिष्ठ पदों पर बहुजनों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है. सुप्रीम कोर्ट के 33 जजों में से केवल बी आर. गवई एकमात्र ऐसे हैं जो दलित समाज से आते हैं. गवई और उनसे पहले सुप्रीम कोर्ट में रहे दलित जज के बीच 9 साल का अंतर है. अपने पूरे इतिहास में सुप्रीम कोर्ट में केवल एक आदिवासी जज हुआ है. उनका नाम था एच. के. सीमा जो नगा समाज से थे.

तब स्थिति कैसे बदली जाए यह एक बड़ा सवाल है. भारत के दो स्तंभों में पहुंचने के लिए संयंत्र बने हैं जो कितने ही कमजोर हों, वे निर्धारित करते हैं कि ये क्षेत्र प्रतिनिधिमूलक हों. चुनाव के जरिए विधायिका में लोग चुने जाते हैं जो फिर विधायिका के सदस्य कार्यकारियों को चुनते हैं. लेकिन लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ यानी न्यायपालिका में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. न्यायपालिका के सभी वरिष्ठ पदों का रास्ता सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से हो कर जाता है जिसमें इस कोर्ट के पांच सबसे वरिष्ठ जज होते हैं. संविधान में संशोधन कर इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाने के कई प्रयास हुए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने की जिद ने कॉलेजियम व्यवस्था को बचाए रखा है.

इन सभी बाधाओं की यदि अनदेखी कर भी दी जाए तब भी कहा जा सकता है कि भारतीय विधि शैक्षिक संस्थान प्रतिनिधिमूलक दक्ष कानून के जानकारों को अदालतों में पहुंचा नहीं सके हैं. ऐसा तभी संभव है जब उचित स्तर के प्रतिनिधित्व वाले बार हों जिनका नेतृत्व और संख्याबल हाशिए के समुदाय से मजबूत हो. इसी तरह की व्यवस्था अप्रतिनिधिक न्यायपालिका पर असर डाल सकती है.

एनएलयू से उम्मीद लगाई जाती है कि वे इस दिशा में नेतृत्वदायी भूमिका निभाएंगे लेकिन उनके विफल होने से वे भारत के प्रतिनिधिक लोकतंत्र को ही विफल किए दे रहे हैं. एनएलयू की वाहवाही वाली तेज शोर में उपरोक्त बातें भुला दी जा रही हैं. एनएलयू के गौरवगान में जिस बात पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है वह है : शिक्षा की गुणवत्ता. 2010 में विधि शिक्षा सुधार विषय पर आयोजित एक परामर्श में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एनएलयू को “संस्थागत मीडियोक्रिटी के बीच उत्कृष्टता का द्वीप” बताया था. अब लगता है उसकी इस साख के ऊपर भी खतरे पर है.

हाल के सालों में कई एनएलयुओं में निरंतर छात्र प्रदर्शन हुए हैं. प्रदर्शनकारी छात्रों की एनएलयू में आधारभूत सुविधाओं की कमी, कुप्रबंधन और वित्तीय अनियमितता जैसी कई मांगें समान हैं. शिमला एनएलयू के छात्रों ने स्वच्छ भोजन और पानी की मांग के लिए प्रदर्शन किया. उन्होंने ऐसा कई छात्रों को फूड प्वाइजनिंग हो जाने के बाद किया. भोपाल के छात्रों ने कुप्रबंधन और शिक्षकों के लैंगिक भेदभाव वाले व्यवहार के खिलाफ प्रदर्शन किया. रांची एनएलयू छात्रों ने खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी और परमानेंट प्रोफेसरों की कमी के खिलाफ आवाज उठाई. इसी तरह कटक और जबलपुर एनएलयुओं के छात्रों ने लायब्रेरी में किताबों की उपलब्धता की मांग करते हुए विरोध किया. जबलपुर के छात्रों ने खेल के मैदानों की कमी और अवैध फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन किया. पहले कोलकाता और फिर पटना एनएलयू के कुलपति रहे ईश्वर भट्ट पर प्रशासनिक कामों में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए छात्रों ने प्रदर्शन किया. कोलकाता एनएलयू में वित्तीय अनियमितता के लिए रजिस्ट्रार को दोषी पाया गया था और यह अपराध भट्ट के कुलपति रहते हुआ था.

मैंने जिन एनएलयू छात्रों, फैकल्टी सदस्यों, विधिवेत्ताओं और कानून के विशेषज्ञों से बात की उन सभी माना कि इनकी समस्या व्यवस्थागत है. एनएलयू अपने चरित्र में राष्ट्रीय हैं और इनकी स्थापना जिन नियमों के तहत हुई है वे इनको राज्य विश्वविद्यालय बनाते हैं.

एनएलयू की स्थापना राज्य सरकारों और संस्थापकों के बीच करार के द्वारा होती है. राज्य की ओर से मिलने वाली प्रत्येक सुविधा के बदले में राज्य को कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं, जैसे यदि राज्य सरकार ज्यादा अनुदान देती है तो शिक्षकों की भर्ती अथवा राज्य के छात्रों के लिए कोटा लागू करने जैसी बातें एनएलयू को माननी पड़ती हैं.

एनएलयू की निर्वाचित छात्र इकाइयों में एनएलयू के राष्ट्रीयकरण की मांग बढ़ने लगी है हालांकि अभी यह ठीक से नहीं कहा जा सकता कि स्वायत्त संस्थानों के राष्ट्रीयकरण कर देने से वे दुरुस्त हो जाएंगे. एनएलयू का जैसा कानूनी दर्जा है उसके चलते एनएलयू के उद्देश और उसके चरित्र को लेकर कई तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं और एनएलयू इन समस्याओं को किस तरह हल करते हैं वह भारतीय विधि बिरादरी के साथ साथ स्वयं भारत के लिए भी दूरगामी महत्व का साबित होगा.

{दो}

एक जमाना था जब भारत में विधि पाठ्यक्रम पार्टटाइम हुआ करता था और उसे कम वेतन पाने वाले टीचर शाम को लगने वाले कॉलेजों में पढ़ाया करते थे. ये टीचर खुद बार में अप्रेंटिस होते थे. ब्रिटेन जाकर विधि की शिक्षा हासिल करने के अलावा और कोई चारा नहीं था कि इस काम में अपना कैरियर बनाया जाए. सामाजिक पूंजी और विशेषाधिकार इस क्षेत्र में लोगों के प्रवेश और यहां टिके रहने के लिए जरूरी थे.

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के कुछेक बड़े राजनेता वकील थे. मसलन, दादा भाई नौरोजी, मोतीलाल नेहरू, मोहनदास गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना. ये सभी लोग संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते थे. एकमात्र बी. आर. आंबेडकर ही थे जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद विधि का अध्ययन किया. रोहित डे ने किताब लिखी है रेडिकल इन आंबेडकर. इसमें वह बताते हैं कि आंबेडकर के समकालीन वकील नेता इस पेशे में जमने के लिए प्रभावशाली जाति या अशरफी सामाजिक संजाल की मदद पा जाते थे.

जिन्ना ने अपना पहला केस अपने खोजा व्यापारी चाचा का लड़ा. डे लिखते हैं कि गांधी जो गरीबों के हक के प्रति मुखर थे वह भी इस पेशे में पैर जमाने के लिए अपने परिवारिक संजाल पर आश्रित थे. इसी तरह मोतीलाल नेहरु ने अपने भाई द्वारा पहले से ही स्थापित विधि पेशे में एंट्री की. डे लिखते हैं, “अंबेडकर अपनी इस कमजोर कड़ी के प्रति सचेत थे इसलिए उन्होंने मुंबई बार में पुनर्विचार वकील का पेशा चुना न कि ओरिजिनल वकील का क्योंकि वहां घुसने के लिए ऊंची जाति के संजाल की आवश्यकता पड़ती थी.

आजादी के एक साल बाद भारत के दूसरे राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन के नेतृत्व में गठिक एक समिति ने विधि पाठ्यक्रम में सुधार की सिफारिशें की. कानूनविद द्वितीमोय मुखर्जी ने राधाकृष्णन की सिफारिशों को अग्रमामी बताया था परंतु आने वाली सरकारों इन सिफारिशों को बार-बार अनदेखा किया.

1964 में गजेंद्र गडकर कमिटी ने कानूनी शिक्षा में सुधार की चर्चा को आगे बढ़ाया. कमिटी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सी. डी. देशमुख मार्गदर्शन में दिल्ली विश्वविद्यालय में कानूनी शिक्षा में सुधार के प्रयास किए. गजेंद्र गडकर कमिटी ने दो मुख्य सिफारिशें की थी. पहली यह कि कानून की शिक्षा के लिए तीन वर्षीय एलएलबी कोर्स चलाया जाए और दाखिले के स्नातक होना जरूरी हो. दूसरी सिफारिश यह थी कि कुछ नमूने राष्ट्रीय कानून स्कूल खोले जाएं जिनको नए तरीके से अध्यापन और प्रयोग करने की अधिक आजादी हो. लेकिन राष्ट्रीय लॉ स्कूल का विचार 1975 तक विलोम में चक्कर काटता रहा. इसी साल प्रसिद्ध कानूनवेत्ता उपेंद्र बक्शी ने यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग के लिए लिखी अपनी रिपोर्ट में उपरोक्त विचार पर एक बार फिर जान फूंक दी.

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत के कुछेक बड़े राजनेता वकील थे. मसलन, दादा भाई नौरोजी, मोतीलाल नेहरू, मोहनदास गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना. ये सभी लोग संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते थे. एकमात्र बी. आर. आंबेडकर ही थे जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद विधि का अध्ययन किया. विकीमीडिया कॉमन्स

बख्शी का जन्म राजकोट के प्रभावशाली गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वह भूतपूर्व सौराष्ट्र राज्य के वित्त सचिव के बेटे थे और नौजवानी में खूब अंग्रेजी साहित्य पड़ा था. परंतु मुंबई के राजकीय कानून महाविद्यालय की लाइब्रेरी में उनको न्यायशास्त्र और इसके कानून और समाज में पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन में दिलचस्पी हो गई. इस महाविद्यालय को आंबेडकर ने ढेरों किताबें दी थी.

बख्शी का विचार था कि कानूनी पढ़ाई ऐसी होनी चाहिए जो इसके छात्रों को देश की जमीनी हकीकत से वाकिफ कराए. उन्होंने रिपोर्ट में लिखा था, “हमारे यहां एक अपूर्ण टेक्नोक्रेटिक कानूनी शिक्षा है. यदि हम एक अच्छी टेक्नोक्रेटिक कानूनी शिक्षा को सामाजिक रूप से प्रासंगिक मानते हैं तो सबसे पहले हमें ऐसी ही शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिए.”

पिछले साल बक्शी ने मुझे बताया कि वह जिस टेक्नोक्रेटिक शब्द का प्रयोग कर रहे हैं उसके अंदर भीतर कई चीजें हैं. “आमतौर पर इसका मतलब कानून के ज्ञान, दक्षता और कौशल से है या इसका सैधांतिक ज्ञान जैसा कि जैसा कि 1970 और 1980 के दशक में मोटे तौर पर मान्यता थी. लेकिन यह जरूरी नहीं है कि ज्ञान के होने से आपके पास अदालतों में केस लड़ते हुए प्राप्त होने वाला विषय का कौशल और दक्षता आ गई है. हमें आवश्यकता थी कि अदालतें और जज जिस तरह से कानून को लागू करते हैं और उन्हें विकसित करते हैं, इस प्रक्रिया के प्रति पूर्ण जागरूकता लाएं. बक्शी के अनुसार, “इसका समाधान सामाजिक रूप से प्रासंगिक कानूनी शिक्षा और शोध है जिसे एसआरएलईआर (SRLER) भी कहते हैं. उन्होंने मुझे बताया कि हमें भारत में कानून को संदर्भ के देख कर समझने वाला एप्रोच लेने की आवश्यकता है और संदर्भ मुख्य रूप से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक होते हैं, जो व्यापक अर्थों में या तो दमनकारी या स्वतंत्र करने वाले होते हैं. सामाजिक रूप से प्रासंगिक कानूनी शिक्षा की ओर बढ़ने का एक तरीका है कि हम यह पूछे कि कितने कानूनी शिक्षा और शोध संस्थान ऐसे हैं जो इन चीजों की विवेचना करने, अर्थ समझाने और इनके मध्य न्यायिक संदर्भ के तहत इंगेज होने का काम कर रहे हैं ताकि हम व्यक्तियों के लिए और सामाजिक न्याय हासिल कर सकें.” बख्शी ने अपनी यूजीसी रिपोर्ट में बहुविषयक कानूनी शिक्षा का प्रस्ताव दिया. इसके तहत कानूनी शिक्षा में मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और राजनीति पढ़ाई जानी चाहिए.

उनके इस विचार से आगे चल कर पांच साल के इंटीग्रेटेड बीए-एलएलबी कोर्स का रास्ता खुला जिसे अब एनएलयू कराते हैं. हालाकी बख्शी की रिपोर्ट में जिस तरह के संस्थानों की बात की गई थी उनकी स्थापना में एक दशक और लगा.

1980 के दशक की शुरुआत में दिल्ली यूनिवर्सिटी में कानून पढ़ाने वाले सेवानिवृत्त नौकरशाह एनआर माधवा मेनन को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष राम जेठमलानी का निवेदन प्राप्त हुआ कि वह कानूनी शिक्षा में सुधार के लिए प्रयोग शुरू करें. मेनन इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया और उन्होंने एक ऐसी राज्य सरकार की खोज शुरू की जो उनके प्रयोग से सहमत हो. 1983 में रामकृष्ण हेगड़े, जो उस वक्त कर्नाटका के मुख्यमंत्री थे, बेंगलुरु में राष्ट्रीय लॉ स्कूल खोलने पर सहमत हो गए. पहला एनएलयू एक साइकिल के स्टैंड के नीचे बना जिसमें तीन साल की शिक्षा दी जाती थी और इसके पहले बैच से 50 छात्र पास हुए.

इसके बाद मेनन को कलकत्ता में एनएलयू स्थापित करने को कहा गया. यहीं का छात्र में भी हूं. मेनन के लिए कानून सोशल इंजीनियरिंग और प्रशासन के लिए नीति निर्माण करने का जरिया था और उनके विचार में इसे इतिहास, दर्शन और सार्वजनिक प्रशासन के साथ जोड़ कर पढ़ाया जाना चाहिए. अपने पूरे करियर में जो भी मेनन लिखा और जो व्याख्यान दिए उनमें उन्होंने जोर दिया कि एनएलयू सोशल इंजीनियर पैदा करने वालीं फैक्ट्रियां हैं.

2001 में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित न्यू विजन फॉर लीगल एजुकेशन इन इमर्जिंग ग्लोबल सिनेरियो में लेखकों ने कहा है कि सोशल इंजीनियरिंग और एसआरएलईआर प्रोजेक्ट कल्याणकारी राज्य और समाजवादी एजेंडा से प्रभावित थे जो उस वक्त की राजनीति में डोमिनेंट थे. इस चरण में डोमिनेंट टीम थी : सामाजिक प्रासंगिकता. इसमें बढ़ती गरीबी और असमानता एवं देश में राजनीतिक द्वंद के बारे में बढ़ती चिंताएं दिखाई पड़ती है.

नेशनल ज्यूडिशल अकैडमी और एनएलएसआईयू के पूर्व निदेशक जी मोहन गोपाल ने बताया कि “हम चाहे एसआरएलईआर की बात करें या सोशल इंजीनियरिंग की, ये दोनों सारे विचार इस संभावनाओं में पैदा हुए कि समाज की रि-इंजीनियरिंग की संभावना है और ऊपर से नीचे की ओर होने वाले सुधारों के लिए कानून एक संभावित जरिया हो सकता है.

उन्होंने बताया कि कई स्तर में यह औपनिवेशिक कल्पना की रि-पैकेजिंग थी. भारत की औपनिवेशिक परियोजना में यहां के प्रभुत्वशाली समुदायों का सहयोग था और ये लोग समाजों को अपनी इच्छानुसार बनाना चाहते थे. एनएलयू के लिए, कम से कम, शुरुआत में यही दृष्टिकोण था.

प्रभुत्वशाली समुदायों के बच्चों को कुशल वकील बनाने की अपनी क्षमता को एनएलयू ने इन सालों में बखूबी साबित किया है. जबकि पहले केवल विदेश से कानून पढ़ कर आए बच्चे ही इस पेशे में सफल होते थे.

जहां तक भारतीय कानून की चेतना और उसकी शक्ल को बदलने की बात है ये संस्थान आज भी बक्शी और मेमन के आदर्शवादी विचारों से बहुत पीछे हैं. मैंने यहां के जिन छात्रों से बात कि उनकी बातों से यही समझ आता है कि यह संस्थान भारतीय कानूनी पेशे में जाति और वर्ग की जो खाई है उसे सिर्फ और सिर्फ अधिक गहरा बना रहे हैं. यह बात एनएलयू की अच्छी छवि नहीं है.

यहां के छात्र सिर्फ अपने हितों की रक्षा के लिए प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं बल्कि वे अपनी विश्वविद्यालयों को बेहतर बनाने के लिए भी संघर्षरत हैं. कोलकाता एनएलयू की निर्वाचित स्टूडेंट यूनियन ने 2014 में पाया था कि विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार सुरजीत सी मुखोपाध्याय करोड़ों के गबन में लिप्त हैं. यह तथ्य हाईकोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश एनएन माथुर की जांच रिपोर्ट में सामने आई थी. उसी साल छात्रों ने प्रदर्शन किया और मुखोपाध्याय को पद से हटा दिया गया. लेकिन छात्रों तब झटका लगा जब उन्होंने पाया कि मुखोपाध्याय को संस्था का संरक्षण प्राप्त है.

नवंबर 2016 में छात्र संघ ने भारत के मुख्य न्यायाधीश, जो एनएलयू के चांसलर होते हैं, को लिख कि वह प्रशासनिक कुप्रबंध की जांच के लिए समीक्षा आयोग गठन करें. 2017 में आई इस आयोग की रिपोर्ट ने उपरोक्त आरोपों को सही पाया.

विधि कंपनी सिरिल अमरचंद मंगलदास में एसोसिएट और एसजेए पूर्व अध्यक्ष अरिंदम नायक ने मुझे बताया कि मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय प्रशासनिक विफलताओं पर है और जब हमने वह रिपोर्ट पहली बार पढ़ी तब हमें समझ आ गया कि अब खेल खत्म हो गया है क्योंकि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने साफ शब्दों में कहा था कि वीसी अपने प्रशासनिक दायित्वों का निर्वाहन करने में विफल रहे हैं. छात्रों के प्रदर्शन के बाद उपकुलपति पी. ईश्वर भट्ट, जिनके कार्यकाल में शिक्षकों के इस्तीफों की झड़ी लग गई थी और विश्वविद्यालय की रैंकिंग बहुत नीचे आ गई थी, को अपमानित होकर पद छोड़ना पड़ा. लेकिन विचित्र बात यह थी कि उन्हें पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का वीसी नियुक्त कर दिया गया. वहां के छात्रों के प्रदर्शन के बाद भट्ट को वहां से भी हटा दिया गया.

2018 में भोपाल की नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं ने शिक्षकों सेक्सिस्ट बर्ताव के विरोध में प्रदर्शन किया. उनके प्रदर्शन को दूसरे एनएलयुओं के सीनियर छात्रों का भी समर्थन मिला. इसी तरह, कटक स्थित एनएलयू ओडीशा के छात्रों ने फीस वृद्धि और अच्छी लाइब्रेरी न होने के खिलाफ कई दिनों तक धरना दिया.

हाल के सालों में कई एनएलयुओं में निरंतर छात्र प्रदर्शन हुए हैं. प्रदर्शनकारी छात्रों की एनएलयू में आधारभूत सुविधाओं की कमी, कुप्रबंधन और वित्तीय अनियमितता जैसी कई मांगें समान हैं.

मार्च 2019 में पटियाला के राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों को हॉस्टल के खराब खाने का विरोध करने के लिए निलंबित कर दिया गया. उनके निलंबन के विरोध में हुए प्रदर्शन ने संस्थागत कुप्रबंध के खिलाफ आंदोलन का रूप ले लिया. शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने पीने के साफ पानी और मैस का खाना खाकर फूड पॉइजनिंग के शिकार हुए छात्रों को उचित स्वास्थ्य व्यवस्था मुहैया न कराने के खिलाफ प्रदर्शन किया. इसी तरह फरवरी 2021 में जब महामारी का प्रकोप जारी था तब जबलपुर के धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बगावत कर दी.

स्थापना से ही जबलपुर एनएलयू को भारत संचार निगम लिमिटेड के एक भवन से किराए पर चलाया जा रहा है. बीएसएनल ने किराया बढ़ा दिया तो छात्रों की फीस भी प्रतिवर्ष ₹250000 रुपए हो गई. अन्य एनएलयुओं में फिस 200000 रुपए प्रति वर्ष है. धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के शुरुआती बैच के छात्र ने मुझे बताया कि हमने विश्वविद्यालय के प्रशासन से कई बार फीस वृद्धि वापस लेने का अनुरोध किया था लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ.

धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी खराब अवस्था में है और इसके अलावा छात्रों के पास खेलने के लिए मैदान तक नहीं है. 2021 की शुरुआत में इंटर्नशिप कर रहे इस विश्वविद्यालय के कुछ छात्र हॉस्टल में ही रह रहे थे. एक बार जब ये लोग बीएसएनएल के मैदान में खेल रहे थे तब बीएसएनएल के अधिकारियों और इनके बीच झगड़ा हो गया.

यहां के एक छात्र ने मुझे बताया, “इससे पहले भी एक दो अवसरों पर हमसे मैदान में खेलने के लिए क्लब फीस देने को कहा गया था. इस छात्र ने मुझे बताया कि “हमें यह बात समझ नहीं आई क्योंकि हम पहले से ही इतनी भारी फीच चुका रहे हैं और हमें कॉलेज ने मैदान में खेलने की अनुमति दे रखी थी. बीएसएनल के एक अधिकारी हमें जातिसूचक गालियां दी. हमारे साथ हाशिए के समुदायों के कुछ छात्र थे इसलिए हमने पहले सोचा कि हम अत्याचार रोकथाम कानून के तहत इस मामले में एफआईआर दर्ज कराएंगे. लेकिन छात्रों ने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें ऐसा लगा कि इस मामले में विश्वविद्यालय उनका समर्थन नहीं कर रहा है.”

डीएनएलयू के छात्र ने मुझे बताया कि इस घटना के बाद यहां के छात्रों की आंख खुल गई कि उनके विश्वविद्यालय के लिए स्वयं के कैंपस की आवश्यकता है. इसके बाद छात्रों ने सूचना के अधिकार कानून के तहत कई आवेदन किए जिनसे उन्हें पता चला कि विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए पहले से 120 एकड़ जमीन एलोकेट की जा चुकी है. लेकिन निर्माण कार्य के लिए पैसा जारी नहीं हुआ था. इसके बाद छात्रों ने मध्य प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष आवेदन किया. साथ ही उन्होंने राज्य के महाधिवक्ता और अन्य प्राधिकरण के समक्ष भी प्रार्थना पत्र भेजे. छात्रों ने राज्य के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा से मुलाकात की जिन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि मामले पर गौर करेंगे.

मार्च 2021 में राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय के खाते में कोष डाल दिया और निर्माण कार्य के लिए टेंडर भी जारी कर दिए गए. मार्च 2022 को छात्रों बताया गया कि भवन के निर्माण का काम शुरू हो गया है. हालांकि जिन डीएनएलयू के छात्रों से मैंने बात की वे निर्माण कार्य शुरू होने की पुष्टि नहीं कर पाए. डीएनएलयू ने इस संबंध में भेजे गए मेरे ईमेलों का का जवाब नहीं.

इसके बाद छात्रों को एक अन्य लड़ाई भी लड़नी पड़ी. महामारी के दौरान यूनिवर्सिटी ने पढ़ाई ऑनलाइन कर दी थी और कैंपस से छात्रों को हटा दिया था. इसके बावजूद उनसे विश्वविद्यालय पूरी फीस मांगता रहा. फिर 2021 में ही राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने डीएनएलयू के खिलाफ विद्यार्थियों और उनके माता-पिता को परेशान करने के संबंध में मामला शिकायत दर्ज की. शिकायत के बाद विश्वविद्यालय ने छात्रों की फीस ₹10000 कम कर दी. एक छात्र ने मुझे बताया कि “हम फीस की इस कमी से संतुष्ट नहीं थे लेकिन हमारे पास और विकल्प ही क्या था? कभी-कभी मैं सोचता हूं कि ये लोग क्यों विश्वविद्यालय खोलते हैं जबकि दाखिले के बाद हमें भूल जाना होता है.”

नायक ने मुझे बताया कि राज्य सरकारें राज्य में एनएलयू खुलवा कर नाम कमाना चाहती हैं. उनको जवाबदेही से कोई मतलब नहीं होता. प्रत्येक एनएलयू प्रस्तावित राज्य की विधानसभा द्वारा पारित विशेष कानून के तहत अस्तित्व में आता है. लेकिन इनके प्रशासन में राज्य सरकार के अतिरिक्त भी कई अन्य संस्थानों के अधिकारी शामिल होते हैं, जैसे इनमें न्यायपालिका के प्रतिनिधि होते हैं और बार काउंसिल के, और यहां तक की राज्य और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि भी होते हैं. इस व्यवस्था की वजह से विश्वविद्यालयों और संबंधित सरकारों के बीच हमेशा तनाव की स्थिति रहती है. राज्य सरकार विश्वविद्यालयों के संचालन में अधिक शक्ति रखती है. कई लोग मानते हैं कि इस अधिक शक्ति का इस्तेमाल जरूरी नहीं है कि संस्थानों की भलाई के लिए ही होता हो. यह मॉडल आईआईटी और आईआईएम जैसे अग्रणी स्वायत्तता संस्थानों से विपरीत है. आईआईटी ने अपने अधिकारों का विस्तार कराने में अच्छी सफलता पाई है.

2020 में कर्नाटक सरकार ने एनएलएसआईयू की 75 फीसदी फंडिंग काट दी थी. मार्च 2020 में कर्नाटक विधानसभा में लगभग बिना बहस के कानून पास कर दिया गया कि विश्वविद्यालय की एक चौथाई सीटें राज्य के छात्रों के लिए आरक्षित होंगी. इस नियम का विश्वविद्यालय प्रशासन लंबे समय से विरोध कर रहा था. छात्रों ने बताया कि सरकार के इस कदम के बाद विश्वविद्यालय को स्कॉलरशिप जैसी छात्रों के लिए सहयोगी व्यवस्था में कटौती करनी पड़ी.

पिछले साल सितंबर में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक नाटकीय फैसला में राज्य के कोटे को यह कह कर खारिज कर दिया कि “यूनीक राष्ट्रीय संस्थानों” को राजकीय यूनिवर्सिटी नहीं समझ लेना चाहिए. अदालत ने एनएलएसआईयू की राष्ट्रीय महत्व की संस्था होने की मान्यता पर आधारित होकर यह फैसला सुनाया था. अदालत की मान्यता थी कि एनएलएसआईयू को फंड अन्य निकायों से भी प्रप्त होता है यानी राष्ट्रीय और राज्य के बार परिषदों से.

एनएलएसआईयू पर आया अदालत का उपरोक्त फैसला एक अपवाद है. अन्य सभी एनएलयुओं की सीटों में एक बड़ा कोटा उन राज्यों के छात्रों का है. पिछले साल सितंबर में राजस्थान के उच्च शिक्षा मंत्री ने राज्य विधानसभा को आश्वासन दिया कि एनएलयू जोधपुर भी राज्य के छात्रों के लिए कोटा लागू करेगी. सभी एनएलयू राष्ट्र स्तरीय नहीं है या उनके पास राज्य सरकार के दबाव से मुक्त बने रहने के वैकल्पिक फंड की व्यवस्था नहीं है. नायक ने मुझे बताया कि “यदि हमें एनएलयू में फीस कम करनी है और इन संस्थानों तक लोगों की पहुंच बनानी है, तो इन्हें अधिक विविधता वाला बनाना होगा. इसके लिए हमें ज्यादा धन की आवश्यकता होगी. यदि हमें धन की जरूरत है तो हमें राज्य सरकारों से समझौता करना पड़ेगा. आईआईटी और आईआईएम इस तरह के दबावों का सामना नहीं करना पड़ता और धन के लिए समझौता नहीं करना पड़ता. लेकिन एनएलयुओं को हमेशा धन की मांग के साथ अपना कोई अधिकार गिरवी रखना पड़ता है.”

अप्रैल 2017 में रांची के एनयूएसआरएल के छात्रों ने स्थायी प्रोफेसरों, इंटरनेट सुविधा, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और कोष के इस्तेमाल में अधिक पारदर्शिता की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किए. एनयूजेएस के विद्यार्थी बार संगठन के अध्यक्ष अर्जुन अग्रवाल को कुप्रबंधन की जानकारी थी और उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट पर लिखा कि एनएलयुओं को आईआईटी और आईआईएम की भांति राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों का दर्जा दिया जाना चाहिए.

अर्जुन अग्रवाल ने मुझे बताया, “एनएलएसयूआई के तत्कालीन अध्यक्ष और मैं एक ही जैसा सोच रहे थे. एनएलयुओं की कई बड़ी समस्यायों का समाधान इनके राष्ट्रीयकरण से हो सकता है.” उन्होंने कहा कि “सबसे पहले तो हम यह मानते हैं कि इससे संस्थाएं ज्यादा जवाबदेही होंगी क्योंकि संस्थानों पर केंद्र सरकार का हस्तक्षेप होगा और हमें पता है इससे विश्वविद्यालय को जिस प्रकार के संसाधन चाहिए वे मिल पाएंगे. दूसरे, हमको प्राप्त होने वाला फंड, हमारी फीस और संस्थानों के कोटे का मानकीकरण होगा.”

अग्रवाल की फेसबुक पोस्ट के ऑनलाइन पोर्टल लिगली इंडिया में छपने के बाद उन्हें कई लोगों ने कॉल किए और अपना समर्थन जताया. इसके बाद अग्रवाल ने दामोदरम संजीवय्या नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (विशाखापट्टनम) के अपने समकक्षी देबदत्त बोस से मुलाकात की जिन्होंने एनएलयू के राष्ट्रीयकरण के संबंध में एक कानूनी मसौदा पहले से तैयार किया हुआ था.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुगाता बोस ने इस बिल को लोकसभा में पेश किया. इसके बाद हैदराबाद की राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं शोध अकादमी ने भी इसका समर्थन किया और 2017 में इसके राष्ट्रीयकरण के समर्थन में एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया.

इस बिल में दो प्रमुख बातें थीं : मानकीकरण और पारदर्शिता. एम्स्टर्डम लॉ स्कूल के रिसर्च स्कॉलर देबदत्त ने मुझे बताया कि “मुझे एनएलयू के कामकाज में अधिक पारदर्शिता वाले प्रावधानों में ज्यादा दिलचस्पी थी जिसमें भारत के महालेखापाल द्वारा ऑडिट किए जाने की व्यवस्था थी.” बिल में राष्ट्रीय परिषद की बात थी जो सभी एनएलयू की नीतियों को एकरूपता प्रदान करती.

आईआईटी, आईआईएम, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर और एनआईटी की कॉन्सॉर्टियमों जिस तरह से मजबूत हैं उतनी मजबूत क्लैट कॉन्सॉर्टियम नहीं है. क्लैट एनएलयू के प्रवेश के लिए होने वाली वार्षिक संयुक्त विधि प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है.

देबदत्त ने कहा बताया प्राइवेट मेंबर बिल के पारित होने की संभावना बहुत कम होती है. “मेरे बिल के पटल पर रखे जाने के बाद चुनौती यह थी कि इस बिल को समिति के पास पहुंचाया जाए या संसद में इसका उल्लेख हो, ताकि वह ठंडे बस्ते में न चला जाए.”

इन दोनों छात्रों के प्रयासों के बावजूद बिल लैप्स हो गया. इसके एक साल बाद दो छात्र संगठनों ने निर्णय किया कि इस मांग को सफल बनाने के लिए अधिक संगठित प्रयास करने की जरूरत है. 2018 में एनएलआईयू भोपाल में हुए प्रदर्शन के बाद कई एनएलयू छात्र संगठन ने मिल कर एनएलयू छात्र कॉन्सॉर्टियम का गठन किया. उस साल संविधान दिवस के दिन छात्रों ने एसओएस (जल्द मदद भेजो) बना कर तस्वीरें खींची.

अगले दो साल तक कानूनी प्रयास सुस्त गति से चले. देबदत्त के बिल को संसद के पटल पर रखे जाने के दो साल बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संसद में एक सवाल के जवाब में कहा कि “एनएलयू के राष्ट्रीयकरण करने के संबंध में सरकार के पास कोई प्रस्ताव नहीं है.” इसके बाद एक अन्य सवाल के जवाब में प्रसाद ने यह भी स्पष्ट किया कि एनएलयुओं को “राष्ट्रीय महत्व के संस्थान” का दर्जा देने का भी कोई प्रस्ताव नहीं है.

2018 में एनएलआईयू भोपाल में हुए प्रदर्शन के बाद कई एनएलयू छात्र संगठन ने मिल कर एनएलयू छात्र कॉन्सॉर्टियम का गठन किया. उस साल संविधान दिवस के दिन छात्रों ने एसओएस (जल्द मदद भेजो) बना कर तस्वीरें खींची.

2019 के अंत में लीगली इंडिया ने खबर दी कि भारतीय जनता पार्टी की सांसद मीनाक्षी लेखी एनएलयुओं के राष्ट्रीयकरण करने हेतु संसद में एक बिल लाने वाली हैं. हालांकि यह बिल लोकसभा में पेश हुआ और तभी से राष्ट्रीयकरण का एजेंडा बहुत पीछे सरक गया है. देबदत्त ने कहा, “एनएलयू इस सरकार के लिए महत्व नहीं रखते हमें यह समझ में आ रहा है.” नायक ने भी बताया कि जिन छात्रों ने एनएलयुओं के राष्ट्रीयकरण की उम्मीद लगाई थी वे अब अनिर्णय की स्थिति में हैं.”

नायक ने बताया कि उन्हें नहीं पता कि एनएलयुओं के राष्ट्रीयकरण की बहस को पूर्व के स्तर पर कैसे पहुंचाया जा सकेगा. उन्होंने कहा, “छात्र इसे कितना ही आगे ले जा सकते हैं?” उनका कहना है कि “अब वक्त आ गया है कि भारतीय बार काउंसिल और कानून मंत्रालय इस बारे में सोचना शुरू करें, और उनसे भी पहले वकीलों को और संपूर्ण कानून बिरादरी को इस संबंध में सोचना शुरू करना होगा.” वह कहते हैं, “इस बहस को सिर्फ छात्रों की मांग की तरह नहीं समझना चाहिए. एनएलयू का राष्ट्रीयकरण हो या न हो यह एक ऐसी बहस है जो भारत में विधि शिक्षा किस दिशा में जाए उसे तय करेगी.”

“केंद्रीकृत फंडिंग के अभाव में एनएलयू वैकल्पिक स्रोतों पर आश्रित हैं जो चिंताजनक बात हैं.” यह बात मुझसे कनिष्का सिंह ने कही जो विश्वविद्यालय के छात्र यूनियन की पूर्व उपाध्यक्ष हैं. उन्होंने कहा, “एनएलयुओं में निजी पूंजी का प्रवेश हो रहा है और यह इस बात की ओर इशारा करता है कि एनएलयुओं का आगे का भविष्य क्या होगा. निजी क्षेत्र में जिस तरह की गैर बराबरी और प्रतिनिधित्व का अभाव है, वह एनएलयू में भी दिखाई पड़ेगा.”

बक्शी ने कहा कि जो यहां हो रहा है वह संपूर्ण भारत में जो हो रहा है उसके समान है. उन्होंने बताया कि “आज भारत में 1500 के करीब कानून कॉलेज है. इनमें से 780 प्राइवेट और 270 सरकारी हैं जबकि 80 कॉलेज प्राइवेट-पब्लिक कॉलेज हैं. इससे यह दिखाई पड़ता है कि विधि शिक्षा का निजीकरण होना तय है और ऐसा होने से इन संस्थाओं में भी नव उदारवादी चरित्र के बदलाव आ सकते हैं जैसे विनियंत्रण, विराष्ट्रीयकरण, विनिवेश, अधिकारहीनता, अराजनीतिकरण और अलोकतांत्रिकरण. कनिष्का सिंह का कहना है कि ऐसा होने से इन संस्थाओं का सार्वजनिक चरित्र खत्म हो जाएगा और इससे हाशिए के समुदाय पर नकारात्मक असर पड़ेगा.

{तीन}

4 अप्रैल 2022 को रात करीब 8 बजे एनएलयू ओडीशा की द्वितीय वर्ष की एक छात्रा ने हॉस्टल कॉरिडोर में तेज शोर सुन सुना. अपने कमरे से बाहर आकर उसने देखा कि असिस्टेंट वार्डन और छात्रों की भीड़ कमरा नंबर 324 के बाहर इकट्ठा है. वह कमरा सुरभि पंचपाल का था जो द्वितीय वर्ष की छात्रा थी. सुरभि की परवरिश पहले उत्तराखंड में और फिर हरियाणा में हुई थी और वह अनुसूचित जनजाति समुदाय से थी. उस छात्र ने बताया कि असिस्टेंट वार्डन ने उसे बताया कि सुरभि अपना फोन नहीं उठा रही है. उसके मां-बाप उसे लगातार फोन कर रहे हैं और उन्होंने वॉर्डन से कहा है कि वह जाकर उसके कमरे में देखें. 20 मिनट तक लोग दरवाजा खटखटाते रहे लेकिन जब दरवाजा नहीं खुला तो उन्होंने एक गार्ड को बुलाकर दरवाजा तोड़ने को कहा.

इस बीच द्वितीय वर्ष की इस छात्रा ने एक अन्य छात्रा से कहा कि वह जाकर दूसरी बिल्डिंग से वार्डन को बुला लाए. लेकिन सीनियर वार्डन नहीं आए और उन्होंने छात्रों का फोन भी नहीं उठाया. छात्रा याद करती हैं, “जब मैं उस छात्रा को भेजने के बाद घूमी तो मैंने देखा कि दरवाजा टूट गया है और वहां मौजूद छात्र डर के मारे चींख रहे हैं. छात्र चिल्लाने लगे और रोने लगे और डर के मारे इधर-उधर भागने लगे. उस छात्रा को एक अन्य द्वितीय वर्ष की छात्रा ने बताया कि सुरभि ने फांसी लगा ली है. विश्वविद्यालय की एम्बुलेंस कुछ देर बाद वहां पहुंची. सुरभि को कटक में स्थित एससीबी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल ले जाया गया लेकिन वहां उसे मृत घोषित कर दिया गया.

एनएलयू की वाइस चांसलर वेद कुमारी को मैंने ईमेल भेज कर जब मैंने इस बारे में पूछा तो जवाब में उन्होंने कहा कि सुरभि की मौत के तुरंत बाद वार्डन उसके कमरे में पहुंच गए थे. हालांकि कई छात्रों ने इस बात से इनकार किया है.

सुरभि के माता-पिता सुबह आकर बेटी के शव को ले गए लेकिन वे कैंपस नहीं आए. उनके बीच और कैंपस प्रशासन के बीच अस्पताल में क्या बातचीत हुई इसकी जानकारी किसी को नहीं है. कैंपस में सुरभि को ले जाने के बाद सीनियर छात्रों ने घबराए छात्रों की मदद के लिए प्रयास कीजिए. कई छात्रों ने मुझे बताया कि प्रशासन की ओर से किसी ने भी उनकी मदद नहीं की.

लाइव लॉ को दिए एक साक्षात्कार में रजिस्ट्रार योगेश प्रताप सिंह ने कहा कि शिक्षकों और हॉस्टल वार्डन विद्यार्थियों की पर्याप्त मदद की है. सिंह ने कहा, “ऐसा नहीं है कि छात्र-छात्राओं ने मदद मांगी हो और हमने न दी हो.”

जब मैंने एक छात्र को रजिस्ट्रार के दावे के बारे में बताया तो उसने गुस्से में आकर कहा कि “हमें लग रहा था कि हमें अकेला छोड़ दिया गया है और हमारे सीनियर के अलावा हमारी देखरेख करने के लिए वहां कोई नहीं था.” उस छात्र ने बताया कि प्रशासन की ओर से वहां कोई मौजूद नहीं था और यह बात शुरू से ही ऐसी ही थी. अंततः देर रात 1.30 बजे कुमारी ने कैंपस के एकेडमिक ब्लॉक में एक मीटिंग बुलाई. छात्रों को उम्मीद थी कि वह आत्महत्या के बारे में कुछ कहेंगी लेकिन कुमारी उन्हें प्राणायाम कराने लगीं. एक छात्र ने बताया कि कुमारी ने कहा कि “चूंकी हम सब हिंदू हैं इसलिए आइए मिलकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें.” इसके अलावा कुमारी ने मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में प्रवचन दिया. छात्रों ने बताया कि कुमारी ने उनसे कहा कि “मैं अच्छी तरह गीत नहीं गा पाती लेकिन कोई है जो अच्छी तरह गाना जानता हे तो सामने आ जाए.” जब कोई छात्र आगे नहीं आया तो वह लता मंगेशकर का एक गीत गाने लगीं. परेशान, बेबस और थके छात्र वहां से चले गए.

कुमारी ने इस बात से इनकार किया कि उन्होंने कहा था कि “हम सब हिंदू हैं” लेकिन ने यह कहा कि “ध्यान का जो अनुभव मेरा है उससे मैं कह सकती हूं कि गहरी सांस लेने से चित्त शांत हो जाता है और मैंने इसी उम्मीद से छात्र-छात्राओं से ऐसा करने को कहा था, लेकिन मैं उन्हें समझाने में पूरी तरह से विफल रही और मेरी बात सुनकर छात्र गुस्से में आ गए.” उन्होंने बताया कि जो भजन उन्होंने गाया वह कोई हिंदू प्रार्थना नहीं थी बल्कि एक सेकुलर भजन था जो लोगों को सही दिशा में बढ़ने को प्रेरित करता है. अपने जवाब में कुमारी ने यह भी कहा कि घटना के तुरंत बाद उन्होंने कैंपस में काउंसलर की मौजूदगी सुनिश्चित की और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए. इसके अलावा ऐसे मामलों के बारे में छात्रों को प्रशिक्षित किया और उनके लिए वर्कशॉप लगाई. कुमारी ने बताया, “इस घटना ने उन छात्रों के मस्तिष्क पर गहरा असर डाला जिन्होंने वह दृश्य देखा था और इन कार्यक्रमों ने ऐसे छात्रों की बहुत मदद की.”

यहां की वाइस चांसलर बनने से पहले कुमारी दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय की डीन थीं. 2018 में फीस वृद्धि और बेहतर लाइब्रेरी के बारे में छात्रों के प्रदर्शन के बाद उन्हें यहां का वाइस चांसलर नियुक्त किया गया था. उनका कार्यकाल छात्रों के प्रति उदासीनता का कार्यकाल रहा है. सुरभि की मौत के पहले कई महीनों तक विवि प्रशासन ने 700 से अधिक छात्रों के परिणामों को यह कह कर जारी नहीं किया कि ऑनलाइन परीक्षा में छात्रों ने धांधली की है. एक सीनियर छात्र का कहना था, “कुमारी का उद्देश्य छात्र-छात्राओं को प्रताणित करना था. बताया जाता है कि कुमारी ने छात्रों को कहा था कि उनको “इस बात की परवाह नहीं है छात्रों की प्लेसमेंट होती है या नहीं या उनको स्कॉलरशिप नहीं मिलेगी या वे आत्महत्या कर लेंगे क्योंकि आप सब नकलची हैं.” कुमारी ने ऐसी किसी धमकी से इनकार किया है. लेकिन 29 मार्च के एक ईमेल में भी, जिसे छात्र परिषद ने भेजा था, कुमारी पर उपरोक्त कथन का आरोप लगाया गया है.

सुरभि की मौत की अगली रात छात्र छात्राओं ने कैंपस के दोनों गेटों पर नाकाबंदी कर दी और मांग की कि विश्वविद्यालय अपनी लचर प्रतिक्रिया का स्पष्टीकरण दे वर्ना वे कुमारी को कैंपस से बाहर नहीं जाने देंगे. एक छात्र ने बताया कि “हम उनसे शांतिपूर्ण तरीके से मांग कर रहे थे कि वह आगे बढ़ कर हमसे बातचीत करें और हमारे सवालों का जवाब दें.” लेकिन कुमारी ने उनकी मांग पर गौर नहीं किया और अपनी कार के अंदर बैठी रहीं. मेरे ई-मेल के जवाब में कुमारी ने कहा कि छात्रों ने उनकी कार को घेर लिया था और नारेबाजी कर रहे थे और उन्हें कार से बाहर निकलने नहीं दे रहे थे.

इसके तुरंत बाद लाठियां लेकर पुलिस अधिकारी वहां पहुंच गए. पुलिस के साथ कोई हिंसक झड़प नहीं हुई और कुमारी अपनी कार में बैठ कर कैंपस से चली गईं. अधिकांश छात्र-छात्राएं अपने कमरों में लौट गए लेकिन वे परेशन थे.

कुमारी ने इस बात से इनकार किया कि उन्होंने पुलिस बुलाई थी. लाइव लॉ को दिए अपने साक्षात्कार में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार में कहा कि पुलिस ओडिशा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस मुरलीधर ने भिजवाई थी जो एनएलयू के चांसलर भी होते हैं. एक छात्र ने मुझे बताया कि कुमारी ने उन्हें पहले भी आगाह किया था कि कोई उन्हें छू नहीं सकता क्योंकि मुरलीधर उनके करीबी हैं. हालांकि कुमारी ने कभी ऐसा कहने से इनकार किया और बताया कि मुरलीधर को नियमित रूप से कैंपस में क्या हो रहा है इसकी जानकारी दी जाती है और उन्हें छात्रों द्वारा की गई नकल और सुरभि की आत्महत्या के बारे में भी सूचित किया गया था.

विश्वविद्यालय प्रशासन ने दावा किया है कि सुरभि ने मरने से पहले एक नोट लिखा था जिसमें उसने कहा था कि उसकी आत्महत्या के लिए विश्वविद्यालय किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं है. मुझे यह बताया गया कि रजिस्ट्रार ने एक बंद कमरे में छात्र परिषद के सदस्यों के सामने वह नोट पढ़ कर सुनाया था लेकिन किसी भी बहुजन छात्र ने वह नोट कभी नहीं देखा. एक ई-मेल में कुमारी ने दावा किया कि नोट को सीधे पुलिस के हवाले कर दिया गया था और न उन्होंने और न छात्र परिषद के सदस्यों ने उसे पढ़ा था. सुरभि की मौत के एक सप्ताह बाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने प्रशासन के सामने 14 मांगे रखीं जिनमें मुख्य मांगें बेहतर स्वस्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर और भेदभाव को संबोधित करने वाले संयंत्र के निर्माण की थी. सुरभि की आदिवासी पहचान के चलते विद्यार्थी और विभाजित हो गए. चतुर्थ वर्ष में पढ़ने वाली छात्रा रिशा साका ने मुझे बताया कि “जब मुझे पता चला कि वह अनुसूचित जनजाति से थी तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरा अपना कोई चला गया है.”

जब छात्र परिषद ने सुरभि की मौत के संबंध में प्रेस नोट जारी किया तो साका चाहते थे कि सुरभि की अनुसूचित जनजाति की पहचान का नोट में उल्लेख किया जाए. दो अन्य छात्रों ने मुझे बताया कि परिषद ने इसका विरोध किया. साका कहते हैं कि छात्र परिषद में ऊपरी जाती का वर्चस्व है और उस प्रेस नोट को ऊंची जाति के पुरुषों और एक महिला ने मिल कर तैयार किया था.

सुरभि की मौत की वजह यदि साफ-साफ जातिवादी उत्पीड़न नहीं दिखती है तो भी ओडिशा एनएलयू में उसके अनुभव को आकार देने में जाति की मुख्य थी. साका ने मुझे बताया कि एसटी रिजर्वेशन के तहत प्रवेश लेते ही सुरभि की जातिगत पहचान उसके साथ चिपक गई. साका कहते हैं, “आप जातिवादी भेदभाव को यह कह कर छुपाना चाहते हैं कि जाति खत्म हो चुकी है लेकिन संस्था की संस्कृति सुरभि की पहचान को लेकर शत्रुतापूर्ण है. और अब जब सुरभि नहीं रही तो आप उसकी पहचान को ही मानने से इनकार कर रहे हैं?”

सुरभि के एसटी होने का उल्लेख प्रेस रिलीज में नहीं किया गया. कई ऊंची जाति छात्रों ने कथित रूप से धमकी दी कि वे विरोध से हट जाएंगे यदि जाति की बात की गई. कई सीनियर छात्रों ने कुमारी के इस्तीफे की मांग की और छात्र परिषद से भी कहा कि वह इस मांग को उठाए लेकिन परिषद में यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यदि इस्तीफे की मांग उठाई जाती है तो वह प्रदर्शन से बाहर हो जाएगा.

मैंने ओडिशा एनएलयू छात्र संघ परिषद को ईमेल में सवाल भेजे थे लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया. इसके बाद प्रशासन ने इस बात की माफी मांगते हुए पत्र लिखा कि उनसे चूक हुई है लेकिन मौत की जिम्मेदारी उठाने से अब तक इनकार कर रहा है.

2019 में एनएलयू कोलकाता पर कराए गए डायवर्सिटी अध्ययन में पता चला था कि ब्राह्मण और अन्य प्रभुत्वशाली जातियों के छात्र सोसाइटियों में ज्यादा प्रतिनिधित्व पाते हैं. दलित और आदिवासी छात्रों को मूट कोर्ट में बहुत कम मौका दिया जाता है. आदित्य कुमार/विकिमीडिया कॉमन्स

कोच्चि स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज में तृतीय वर्ष की एक छात्रा के पास अपने विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक संबंधों का अच्छा अनुभव नहीं है. एनयूएएलएस में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण है. लेकिन यह आरक्षण केरल के छात्रों के लिए आरक्षित सीटों एक भाग के रूप में है. इन सीटों के अलावा अखिल भारत श्रेणी की सभी सीटें अनारक्षित हैं. उस छात्रा ने मुझे बताया कि इस तरह राज्य के बाहर से आने वाले सभी छात्र स्वाभाविक ही अपर कास्ट के होते हैं और वे आते ही अपर कास्ट उत्तर भारतीय छात्रों से जुड़ने लगते हैं या फिर उन छात्रों से जो उनके क्षेत्र के होते हैं. सवर्ण छात्र आपस में दोस्ती करते हैं. इस तरह विभाजन की लकीर खींच जाती है जो हालांकि शुद्ध रूप से जातिगत नहीं है लेकिन वह कास्ट लाइ पर तो है ही. वर्ग, शहर-ग्रमीण और जाति के आधार पर स्थापित इन नेटवर्कों से बहुजन छात्रों का न सिर्फ सामाजिक बल्कि शैक्षिक अनुभव भी प्रभावित होता है.

एनयूएएलएस के बहुजन छात्र हंसध्वनि अलागरसामी ने मुझे बताया कि बहुजन छात्रों को पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं मिलता इसलिए मूट कोर्ट प्रतियोगिताओं में उनकी भागीदारी बहुत कम होती है. ऐसा कास्ट नेटवर्क के कारण होता है. 2019 में एनएलयू कोलकाता पर कराए गए डायवर्सिटी अध्ययन में पता चला था कि ब्राह्मण और अन्य प्रभुत्वशाली जातियों के छात्र सोसाइटियों में ज्यादा प्रतिनिधित्व पाते हैं. दलित और आदिवासी छात्रों को मूट कोर्ट में बहुत कम मौका दिया जाता है. अंतरराष्ट्रीय मूट कोर्ट और डिबेट प्रतियोगिताओं में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की हिस्सेदारी भागीदारी 15 प्रतिशत से भी कम है.

कनिष्का सिंह, जो अब चतुर्थ वर्ष के छात्र हैं, बताते हैं कि “हमारे पहले वर्ष में हमारा सीनियर छात्रों के साथ ‘बहुत सकारात्मक’ संवाद था.” (उनके इस कथन का अर्थ रैगिंग से है.) सिंह ने बताया कि रैगिंग में ऊंची जाति के सीनियर हमेशा क्लैट की रैंकिंग के बारे में पूछते हैं. फ्रेशर और विधि कॉलेज में पहले साल के हाशिए के समुदाय के छात्रों के लिए यह अनुभव उन्हें तोड़ने वाला होता है. हंसध्वनि अलागरसामी कहती हैं कि “हर चीज संख्या से निर्धारित होती है. यदि विधि स्कूलों में ज्यादा बहुजन छात्र दाखिला लेंगे तो उनका प्रतिनिधित्व छात्र सोसाइटियों, कॉलेज पत्रिकाओं और मूट कोर्ट में बढ़ेगा. हमारे पास सामूहिक सामाजिक पूंजी होगी और हम अपनी मांग उठाने में सक्षम होंगे.”

एनयूजेएस में प्रतिनिधित्व की खस्ता हालत आंशिक रूप से हाशिए के छात्रों के लिए संस्थागत मदद न होने के चलते है. इससे बड़ा कारण है आरक्षण तंत्र की बनावट में है. एनएलयू के प्रशासन का स्वरूप मिलावटी है यानी जैसा ऊपर उल्लेख किया गया था कि इनकी गवर्निंग बॉडी में राज्य, केंद्र, न्यायपालिका और अन्य निकायों के प्रतिनिधि होते हैं. इस तरह आरक्षण के स्वरूप में हमेशा बदलाव होता रहता है. एनयूजेएस के प्रत्येक बैच में अप्रवासी भारतीयों के लिए 18 सीटें आरक्षित हैं जो लगभग कुल सीटों का 16 प्रतिशत है. जब इतने एनआरआई छात्र आवेदन नहीं करते, जो कि अक्सर होता है, तो इन एनआरआई सीटों को एनआरआई स्पॉन्सरशिफ सीटों में बदल दिया जाता है और ये सीटें उनके लिए होती हैं जिनके अमीर रिश्तेदार एनआरआई हैं और वे अपने रिश्तेदारों की मोटी फीस भरने को तैयार हैं. इससे यह हो जाता है कि प्रभुत्वशाली समुदायों के अल्ट्रा संभ्रांत छात्रों का प्रतिनिधित्व संस्थानों में अधिक हो जाता है. एनयूजेएस की डाइवर्सिटी अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि एनआरआई स्पॉन्सरशिप छात्र कॉलेज की सोसाइटियों पर हावी रहते हैं.

स्पॉन्सरशिप कोटा अन्य एलएलयुओं में भी है हालांकि स्वरूप अलग-अलग है. 2005 में कोलकाता हाई कोर्ट ने इसको संविधान के अनुच्छेद 14 के खिलाफ बताया था. लेकिन उसी साल सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि यह व्यवस्था जरूरी है क्योंकि इससे संस्थानों को शैक्षिक गतिविधियों के लिए आवश्यक धन मिलता है. आज भी इसी विचार के साथ यह कोटा लागू है.

एनएलयुओं में ओबीसी आरक्षण है ही नहीं. एनयूजेएस में पश्चिम बंगाल के ओबीसी छात्रों के लिए सात सीटें आरक्षित हैं लेकिन इसमें अखिल भारत स्तर का कोटा नहीं है. अधिकतर अन्य एनएलयुओं में तो अखिल भारतीय ओबीसी कोटा होता ही नहीं है. कुछ एनएलयुओं, जैसे जोधपुर, पटियाला और कटक में ऑल इंडिया और राज्य स्तरीय ओबीसी कोटा है ही नहीं. नालसार, हैदराबाद और एनएलएसआइयू में वर्तमान शैक्षिक सत्र तक ओबीसी कोटा लागू नहीं हुआ है.

इस मामले में एकमात्र अपवाद तमिलनाडु राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय है जो तिरुचिरापल्ली में स्थित है. हाल में इसने घोषणा की है कि वह ऑल इंडिया और राज्य स्तरीय एससी, एसटी, ओबीसी कोटा के तहत 69 फीसटी सीटें आरक्षित करेगी. यह तमिलनाडु की प्रतिनिधित्व के मामले में प्रगतिशील नीतियों का ही विस्तार है.

ऑल इंडिया ओबीसी परिसंघ के महासचिव जी करुणानिधि ने मुझे कहा कि “इन प्रीमियम कानून यूनिवर्सिटियों में आने वाली पीढ़ी के प्रभावशाली वकील और जज पैदा होते हैं और इसलिए ओबीसी प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है. हमारे छात्रों के लिए भविष्य में स्थान होना चाहिए.”

2019 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने नालसार के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा को नोटिस भेजा था कि उनके विश्वविद्यालय में ओबीसी छात्रों के लिए सीटें आरक्षित क्यों नहीं है. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता और विधि सलाहकार रमेश बाबू विश्वनाथन ने बताया कि मुस्तफा ने आयोग के समक्ष स्पष्टीकरण दिया कि यदि नालसार ओबीसी आरक्षण लागू करेगा तो इससे उसकी शैक्षिक क्षमका में असर पड़ेगा. अगले साल राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने यूजीसी से कहा कि वह ओबीसी कोटा लागू करने के लिए एनएलयुओं से पत्राचार करे.

इसके बाद आयोग ने 23 एनएलयुओं के प्रतिनिधियों के साथ तीन चरणों में सुनवाई की लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला. जब 2021 में ओबीसी आयोग ने नालसार में खराब प्रतिनिधित्व के मामले में तेलंगाना के मुख्य सचिव को नोटिस भेजा तो सचिव में इसके खिलाफ तेलंगाना हाई कोर्ट में अपील लगा दी. लेकिन कोर्ट ने आयोग के पक्ष में ही फैसला सुनाया. आयोग ने नालसार और अन्य विश्वविद्यालय के वाइस चांसलरों पर दबाव बनाए रखा. फिर अक्टूबर 2021 में तेलंगाना नालसार कानून, 1998 में संशोधन कर 26 सीटें ऑल इंडिया ओबीसी कोटे के तहत आरक्षित कर दी.

एनएलएसआईयू सहित कुछ अन्य एनएलयुओं ने हाल में पिछड़ा वर्ग आरक्षण शुरू किया है या उसे विस्तार दिया है. लेकिन यह मामला अभी भी सुलझा नहीं है. इस साल के शुरू में अखिल भारत ओबीसी छात्र संगठन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर मांग की थी कि एनएलयुओं में ओबीसी छात्रों के लिए 27 फीसदी ऑल इंडिया कोटा लागू किए जाने की मांग की थी. इस संगठन के अध्यक्ष किरण कुमार गौड़ ने मुझे बताया कि “मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्यों देश भर की कुछ शक्तिशाली छात्र यूनियनें, भले वे वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, इस संकट पर गंभीर होकर चर्चा करने से बच रही हैं. हम इस मामले में अधिक छात्र यूनियनों के साथ मिल कर काम करने के लिए तैयार हैं ताकि मामले को आगे बढ़ाया जा सके.” 

बख्शी ने अपनी यूजीसी रिपोर्ट में बहुविषयक कानूनी शिक्षा का प्रस्ताव दिया. इसके तहत कानूनी शिक्षा में मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और राजनीति पढ़ाई जानी चाहिए. अनुश्री फणनवीस/हिंदुस्तान टाइम्स

महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में पांचवें वर्ष के छात्र ने मुझे बताया कि कई प्रोफेसर आरक्षण के तहत प्रवेश लेने वाले बहुजन छात्रों के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं. उस छात्र ने बताया कि उसने अपने एक प्रोफेसर को कहते हुए सुना था, “यार यह फर्स्ट ईयर का तो ठीक है पर यह आरक्षित श्रेणी वाले दिमाग खराब कर रहे हैं.” उस छात्र ने बताया कि इस प्रोफेसर ने अभी फर्स्ट ईयर को पढ़ाना शुरू तक नहीं किया था लेकिन उसके भीतर जहर भरा हुआ था. “मुझे लगता है कि एनएलयुओं के अधिकांश टीचर ऊंची जाति के हैं और ये दलित और आदिवासी छात्रों को आगे बढ़ने से रोकते हैं.”

मुझे एनएलयुओं में प्रतिनिधित्व और समावेशिता की हालत के बारे कोई अध्ययन पढ़ने को नहीं मिला लेकिन छात्रों और प्रोफेसर से हुई बातचीत से पता चलता है कि यहां इन दोनों ही स्तरों में खराब स्थिति है. लेंकास्टर विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहीं प्रीति लोलक्ष्या नागवेणी ने मुझे बताया कि एनएलयुओं में बहुत कम एससी-एसटी और ओबीसी प्रोफेसर पढ़ा रहे हैं. वह कहती हैं, “जब इन समुदाय के छात्र इन जगहों में पढ़ने आते हैं तो यह नहीं पता होता है कि इन संभ्रांत विधि विश्वविद्यालय में खुद को कैसे एडजस्ट करें. जब उन्हें जाति की वजह से भेदभाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है तो उनके पास एसटी-एससी प्रोफेसर नहीं होते जिनके पास वह जाकर अपनी बात रख सकें.” एनयूजेएस में विविधता के बारे में एक शोध में पाया गया है कि एसटी और विकलांग छात्रों छात्रों का मानना है कि उनके पास अपनी समस्या साझा करने का स्पेस नहीं है. ऐसे ही बात ओबीसी छात्रों ने भी बताई है. नागवेणी का कहना है कि एनएलयू राजकीय विश्वविद्यालय हैं और इनमें अनुच्छेद 16 (4) को लागू करना बाध्यातमक है. आज हालत है कि इनमें संविधान का पालन नहीं हो रहा है और एनएलयू केंद्र और राज्य के आरक्षण नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं.

लखनऊ के राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर ने अपने शिक्षक बनने के अनुभव के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि “एक बार मेरे एक शिक्षक ने कक्षा में आरक्षण विरोधी बहस करवाई. वह बहस मेरे जीवन का सबसे बुरा अनुभव था. मैं दखल करना चाहती थी लेकिन मैं डरी हुई थी. फिर भी मैंने हिम्मत करके अपना हाथ उठाया लेकिन तभी वे लोग कहने लगे कि बहस खत्म हो गई है.” उन्होंने कॉलेज के बारे में बताया कि “मैं समझती हूं कि यहां कैसे भेदभाव होता है. यहां आरक्षण सिर्फ भावना में है लेकिन इसे लागू नहीं किया जाता और यदि यहां कुछेक बहुजन शिक्षक हैं भी तो वे लोग चुप रहते हैं. मैं शिक्षक बन कर यह सब बदलना चाहती थी इसलिए मैं शिक्षक बनी.” एलएलएम और पीएचडी करने के बाद इनको असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी. “एलएलएम खत्म होने के बाद मैंने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में शिक्षक के पद के लिए आवेदन करने की सोची थी लेकिन मैंने पाया कि वहां विदेश से पढ़ कर आए लोगों को ही भर्ती किया जा रहा है”, उन्होंने बताया. वह कहती हैं कि यही वह कल्चर है जो अब एनएलयू में भी घुस रहा है. उन्होंने बताया, “एनएलआईयू के शिक्षक भर्ती के विज्ञापन में डायवर्स पृष्ठभूमि की बात थी और मैंने जब यह पता लगाया कि किन लोगों को भर्ती किया गया है तो पता चला कि सभी के सभी ऊंची जाति की औरतें थीं जो बाहर से पढ़ कर आई थीं.”

एनयूजेएस के दिव्यांग प्रोफेसर विजय कुमार तिवारी ने बताया कि शिक्षकों की भर्ती में भारतीय डिग्रियों को महत्व नहीं दिया जाता. उन्होंने बताया कि “अगर मैं कमजोर पृष्ठभूमि का छात्र हूं तो सबसे पहले तो मैं एनएलयू में प्रवेश नहीं ले सकता क्योंकि क्लैट की फीस बहुत ज्यादा है. यदि मैं भर्ती हो भी जाता हूं तो वहां मुझ जैसे छात्रों की मदद के लिए आधारभूत संरचना की कमी है. और यदि मैं शिक्षक बनना चाहता हूं तो मैं आईवी लीग में शिक्षित लोगों से मुकाबला नहीं कर सकता.”

एमएनएलयू के एक छात्र ने मुझे बताया कि एक बार जब एक ऊंची जाति के प्रोफेसर आरक्षण के खिलाफ बात रखने लगे तभी मुझे पता चला कि कक्षा का माहौल कैसा है. बहुजन छात्र के लिए यहां का माहौल मददगार नहीं है. बहुजन छात्रों की मदद न करके और बहुजन शिक्षकों को भर्ती न करके से अध्यापन भी प्रभावित होता है और ये संस्थान एक खास तरह के वकील ही तैयार कर रहे हैं. नागवेणी ने बताया कि “कुछेक खास समुदायों के वर्चस्व के कारण हमें अत्याचार रोकथाम कानून नहीं पढ़ाया जाता. छुआछूत के खिलाफ कानूनों को छुआ तक नहीं जाता और जिस तरह से कानून का इतिहास पढ़ाया जाता है उसमें जाति विरोधी आंदोलन और जाति विरोधी साहित्य के बारे में बात नहीं की जाती.”

कनिष्का सिंह ने मुझे बताया कि जब दलित छात्र रोहित वेमुला की मौत हुई तो एनएलएसआईयू के दलित बहुजन और आदिवासी छात्रों बहुत आक्रोशित थे. वेमुला की मौत के बाद देश भर के कॉलेजों में जातिवादी भेदभाव के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हुए. कनिष्का बताते हैं कि जो वेमुला के साथ हुआ उसने सभी के अंदर भय भर दिया. इसके बाद एनएलएसआईयू में सावित्री फुले अंबेडकर कारवां का गठन हुआ. कनिष्का सिंह ने बताया कि यह संगठन दलित, बहुजन और आदिवासी छात्रों को एक मंच पर अपने अनुभव साझा करने के लिए बनाया गया था. इसके पीछे का विचार यह था कि लोग बाबासाहेब, महात्मा फुले, पेरियार और अन्य जाति विरोधी महापुरुषों के बारे में पढ़ें. आज यह संगठन एनएलएसआईयू में सबसे अधिक सक्रिय संगठनों में से एक है और हर साल आंबेडकर जयंती जैसे कार्यक्रमों का आयोजन करता है. कनिष्का के द्वित्तीय वर्ष में इस संगठन से जुड़ेने से उन्हें अपनी पहचान को समझने का अवसर मिला. तीसरे वर्ष में कनिष्का इसके कन्वीनर बन गए. सावित्री फुले अंबेडकर कारवां के बनने के बाद देशभर के एनएलयुओं में आंबेडकरवादी छात्र संगठनों का निर्माण शुरू हो गया. 2017 में कोच्ची के एनयूएएलएस में आंबेडकर स्टडी सर्किल का गठन हुआ. यह संगठन बहुजन छात्रों की समस्या को विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने उठाता है और उनके साथ होने वाले भेदभाव का विरोध करता है. एनएलयुओं में हिंदुत्ववादी संगठनों के बढ़ती सक्रियता के खिलाफ आंबेडकराइट संगठनों का उदय हुआ है. मिसाल के लिए एनएलयुओं में हिंदू राष्ट्रवादी संगठन लगभग पांच साल से मौजूद हैं. अप्रैल 2022 में जब मैं वहां गया था तो मैंने लड़कों के हॉस्टल की दीवार पर नाजी स्वास्तिक चिन्ह देखे थे. जब इस साल मार्च में योगी आदित्यनाथ दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो लड़कों के हॉस्टल में इसके जश्न में भोज का आयोजन किया गया और मिठाइयां बांटी गईं एवं पटाखे फोड़े गए.

2019 में आंबेडकर जयंती और हनुमान जयंती एक साथ पड़े. जब ऐसा हुआ तो आंबेडकर स्टडी सर्किल के पोस्टर और भगवा झंडे एक साथ दीवारों पर लगे हुए थे.

वेमुला की मौत के बाद देश भर के कॉलेजों में जातिवादी भेदभाव के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हुए. इसके बाद एनएलएसआईयू में सावित्री फुले अंबेडकर कारवां का गठन हुआ.

आंबेडकरवादी छात्र अब देश भर के विधिक कॉलेजों में छात्रों का नेटवर्क बनाने की कोशिश कर रहे हैं. महाराष्ट्र के एनएलयू के छात्र दीपांकर कांबले ने 2018 में राउंड टेबल इंडिया वेबसाइट में लिखा था कि नेशनल एसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल की तर्ज पर संगठन बनाने की आवश्यकता है. कांबले ने बताया कि वह इस विचार को जमीन पर उतारने के लिए रात-दिन चिंतित रहते हैं. उनका कहना था अगर हम हाशिए के समुदायों का ऐसा नेटवर्क बना पाते हैं तो आने वाले दिनों में यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाएगा. कांबले ने इस संबंध में विभिन्न विधि कॉलेजों के दलित और आदिवासी छात्रों से बात की है. 

बख्शी और एनएलयुओं से बहुत पहले बीआर आंबेडकर ने बराबरी और समाजिक जवाबदेहिता वाली विधि शिक्षा का अपना विजन सामने रखते हुए 1935 में एक निबंध लिखा था. उस वक्त वह बॉम्बे राजकीय विधि कॉलेज के प्रिंसीपल हुआ करते थे. उन्हें बताया था कि भारत में विधि शिक्षा में सुधार के लिए किए जाने वाले किसी भी ईमानदार प्रयास के लिए इस शिक्षा का विस्तार दमित जनता तक किया जाना आवश्यक है. उनके अनुसार यही कानून की जिम्मेदारी भी है.

एनएलएसआईयू के पूर्व निदेशक जी मोहन गोपाल के अनुसार, “आज एनएलयू एक खास जरूरत और मांग को पूरा करने में लगे हैं जबकि सोशल इंजिनियरिंग का उनका लक्ष्य बहुत पीछे छूट गया है. आज इनमें नौकरशाहों, मिडिल क्लास और प्रभुत्वशाली जातियों का बोलबाल है. जैसे ही आप इस स्थिति को बदलने के बारे में सोचते हो, इन संस्थानों की सफलता डगमगाने लगती है.”

मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या इस संकट से बाहर निकलने का कोई यथार्थवादी तरीका है तो उनका कहना था, “ऊपर ने नीचे की ओर सोशल इंजिनियरिंग का मॉडल ही गलत है. जनता को संभ्रांत वर्ग की रि-इंजिनियरिंग करनी हो और इसके लिए विधि शिक्षा में व्यवस्थित रिस्ट्रक्चरिंग की आवश्यक्ता है. लेकिन ऐसा एनएलयू के फ्रेमबर्क में नहीं हो सकता. मैं बाईस साल तक इसका प्रयास किया लेकिन इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है. एक अर्थ में एलएलयुओं की हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि सुधार नामुमकिन है.” 

लेकिन दीपांकर कांबले निराश नहीं हैं. वह मानते हैं कि ठीक है कि “एनएलयुओं को रिस्ट्रक्चर्ड नहीं किया जा सकता लेकिन हाशिए के समुदायों के छात्र बहिष्कार के नैरेटिव को पुनः लिख सकते हैं. आंबेडकरवादी चेतना का उदय होना और इस बात का विश्वास कि मेरे समुदाय की भविष्य की पीढ़ियों का भविष्य है, मेरे भीतर जबर्दस्त आशा का संचार करता है. यह सच है कि कई बार आशा करना अव्यवहारिक लग सकता है लेकिन आंदोलन के लिए आशा बहुत कुछ है. मैं आशा करता रहूंगा.”