2002 गुजरात हिंसा : कैसे एसआईटी ने सबूतों को अनदेखा कर मोदी को दी क्लीन चिट

19 सितंबर 2022
अहमदाबाद में 1 मार्च 2002 को मुस्लिमों की एक जलती हुई दुकान के पास खड़ी पुलिस.
एमी विटाले / गेट्टी इमेजिज
अहमदाबाद में 1 मार्च 2002 को मुस्लिमों की एक जलती हुई दुकान के पास खड़ी पुलिस.
एमी विटाले / गेट्टी इमेजिज

इस साल जून में सुप्रीम कोर्ट ने 2002 की गुजरात हिंसा के संबंध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोपों को खारिज कर दिया. फैसले के तुरंत बाद गुजरात पुलिस ने सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और गुजरात पुलिस के पूर्व महानिदेशक आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार कर लिया. पूर्व पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट के साथ, जो पहले से ही जेल में है, सीतलवाड़ और श्रीकुमार को एक पुलिस अधिकारी द्वारा दायर की गई एफआईआर के तहत गिरफ्तार किया गया है जिसमें उन पर ‘‘निर्दाेष’’ लोगों को फंसाने के लिए जालसाजी और सबूत गढ़ने का आरोप लगाया गया है.

27 फरवरी 2002 को अयोध्या से लौट रहे हिंदू कारसेवकों वाली साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी में गोधरा रेलवे स्टेशन के पास आग लग गई थी. इसके बाद गुजरात में तीन दिनों तक भयानक सांप्रदायिक हिंसा देखी गई, जो बाद के कई महीनों तक जारी रही. भीड़ ने एक हजार से ज्यादा लोगों को मार डाला जिनमें से ज्यादातर मुसलमान थे. ढरों अन्य घायल हुए और एक लाख पचास हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हुए. राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को हिंसा को रोकने में अपनी सरकार की निष्क्रियता के लिए देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी निंदा का सामना करना पड़ा. बावजूद इसके कि वह राजनीतिक सत्ता में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, 2002 का मुस्लिम विरोधी नरसंहार मोदी के करियर पर एक खूनी दाग बना हुआ है.

हिंसा के दिनों में भीड़ ने कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की बेरहमी से हत्या कर दी थी. उनकी पत्नी जाकिया जाफरी ने 2006 में सुप्रीम कोर्ट में मोदी और 63 अन्य लोगों के खिलाफ याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में एक विशेष जांच दल का गठन किया. उस एसआईटी ने 2012 में अपनी क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें मोदी और अन्य के खिलाफ ‘‘अभियोजन योग्य सबूत’’ की कमी के लिए आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया. एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ 2013 में दायर पांच सौ से भी ज्यादा पेजों की एक प्रोटेस्ट पिटीशन अथवा नाराजी याचिका के अलावा जाफरी ने एसआईटी रिपोर्ट की स्वीकृति के खिलाफ 2018 में सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की.

जाफरी की 2018 की याचिका को खारिज करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जून के फैसले ने एसआईटी द्वारा की गई जांच पर बहुत अधिक भरोसा जताया है. अदालत ने ‘‘अथक काम’’ के लिए एसआईटी की तारीफ की है और ऐलान किया कि ‘‘एसआईटी के नजरिए में कोई दोष नहीं पाया जा सकता है.’’ इसमें कहा गया है कि अंतिम एसआईटी रिपोर्ट, ‘‘इस मजबूत तर्क के जरिए बड़ी आपराधिक साजिश (उच्चतम स्तर पर) के आरोपों को खारिज करती है क्योंकि एसआईटी विश्लेषणात्मक विचार को उजागर करने और सभी पहलुओं की निष्पक्ष रूप से जांच कर सकने के काबिल थी.’’

हालांकि यह न्यायाधीशों का विशेषाधिकार है कि वे अपने निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए एसआईटी रिपोर्ट पर भरोसा करें या न करें पर अदालत का कोई भी फैसला एसआईटी रिपोर्ट को सार्वजनिक जांच (पब्लिक स्क्रूटनी) से परे नहीं रख सकता है. रिपोर्ट का विस्तृत अध्ययन के बाद इस दावे से सहमत होना मुश्किल होता है कि एसआईटी के नजरिए में कोई गलती नहीं थी या रिपोर्ट वास्तव में निष्पक्षता या ‘‘मजबूत़ तर्क’’ पर आधारित है.

हरतोष सिंह बल कारवां के पॉलिटिकल एडिटर और वॉटर्स क्लोज ओवर अस : ए जर्नी अलॉन्ग द नर्मदा के लेखक हैं.

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