औपनिवेशिक कानून की तरह है यूएपीए संशोधन

11 सितंबर 2019
केविन इलंगो/कारवां
केविन इलंगो/कारवां

8 जुलाई को लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम में संशोधन बिल पेश किया. संशोधित कानून में किए गए सबसे महत्वपूर्ण बदलाव के तहत केंद्र सरकार को किसी व्यक्ति विशेष को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार मिला गया है.

संसदीय समिति की समीक्षा के बिना इस कानून को जल्दबाजी में पारित कर 14 अगस्त से लागू कर दिया गया. शाह ने संसद को बताया कि संशोधित कानून से मिलते-जुलते कानून अन्य कई देशों में लागू हैं. लेकिन उनका यह दावा इस संशोधन से जुड़ी चिंताओं का जवाब नहीं है. संशोधित कानून पर नजर डालने से यह साफ हो जाता है कि नया कानून केंद्र सरकार को किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने की बेलगाम ताकत देता है.

इस संशोधन की तीन मुख्य विशेषताएं हैं जिससे यह साफ होता है कि संशोधन पारित करते वक्त सरकार ने राज्य और नागरिक के संबंधों पर पड़ने वाले संवैधानिक असर की उपेक्षा की है. पारित संशोधन में स्पष्ट नहीं है कि सरकार का कौन सा प्राधिकरण यह तय करेगा कि आतंकवादी कौन है और इसका आधार क्या होगा? कानून द्वारा आतंकवादी घोषित किए गए व्यक्ति को इस बात की जानकारी कैसे दी जाएगी? इसके अलावा यह कानून किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने के परिणामों पर भी मौन है. सरकार ने किए गए संशोधनों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया है बल्कि उसने राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्व को संशोधन का जरूरी आधार बताया है. ऐसा लगता है कि भविष्य में भारतीयों को एक लोकतंत्र के नागरिक की जगह एक पुलिसिया राज्य की प्रजा की तरह देखा जाएगा.

पहली बात तो यह कि संशोधित कानून केंद्र सरकार के उस अधिकार के प्रति स्पष्ट नहीं है जिसका प्रयोग व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने या उसके ऊपर लगे इस दाग को हटाने के लिए किया जाएगा. यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार में बैठे वे कौन लोग होंगे जो किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करेंगे? यह तय करने वाले गृहमंत्री होंगे या गृह सचिव? या इसके लिए एक समिति होगी? हमें नहीं पता कि इस प्रक्रिया में कितने लोग शामिल होंगे. क्या राष्ट्रीय जांच एजेंसी या राज्य की पुलिस किसी को आतंकवादी घोषित करने के लिए उससे जुड़े मामले की जांच कर केंद्र सरकार से अनुमोदन करने को कहेंगी? क्या सरकार समय-समय पर आतंकवादी घोषित किए गए मामलों की समीक्षा करेगी?

इस तरह आतंकवादी घोषित करने की प्रक्रिया को अस्पष्ट रखना, ऐसे लोगों को जवाबदेही से मुक्त कर देता है जिनके पास ताकत है, इससे राज्य और जनता के बीच का संबंध असंतुलित होने लगता है.

अभिनव सेखरी दिल्ली में वकालत करते हैं.

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