भारतीय न्यायपालिका : आरोपी भी जज भी

26 अगस्त 2019
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस चेलामेश्वर समेत चार वरिष्ठतम न्यायधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी.
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस चेलामेश्वर समेत चार वरिष्ठतम न्यायधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी.

2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यालय में आगमन ने भारतीय न्यायपालिका के लिए तनावपूर्ण दिनों की घोषणा कर दी. भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में उच्च न्यायपालिका में न्यायधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग गठित करने का वादा किया गया था. सत्ता में आने के कुछ ही महीने बाद संसद के दोनों सदनों ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) बनाने के लिए संविधान का 90वां संशोधन पारित कर दिया. वर्ष के अंत तक 16 राज्य विधानसभाओं ने इसकी पुष्टि कर दी, राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर कर दिया गया और कानून बन गया.

अनुमान के अनुरूप एनजेएसी के छह सदस्य होने थे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट सभी और उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों और स्थानांतरण का नियंत्रण सौंपा जाना था. मुख्य न्यायधीश के नेतृत्व में इसमें सु्प्रीम कोर्ट के दूसरे और तीसरे नम्बर के वरिष्ठतम न्यायधीशों, कानून मंत्री, मुख्य न्यायधीश के पैनल द्वारा नामित दो “प्रतिष्ठित व्यक्तियों” और प्रधानमंत्री व नेता प्रतिपक्ष को शामिल किया जाना था. इनमें से एक व्यक्ति को या तो महिला या धार्मिक अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होना था.

इस नए प्रस्तावित निकाय को कॉलेजियम व्यवस्था की जगह लेनी थी जिसने 1993 से इसी उद्देश्य को कार्यान्वित किया है. कॉलेजियम का नेतृत्व भी मुख्य न्यायधीश करते हैं लेकिन उसकी बाकी सदस्यता उनके 4 वरिष्ठतम सहयोगियों तक सीमित है, सुप्रीम कोर्ट के बाहर से उसमें कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. यह अनुशंसित नियुक्तियों के नाम विधि मंत्रालय को अग्रेसित करती है जो इंटेलीजेंस ब्यूरो के माध्यम से उनकी पृष्ठिभूमि की जांच कर सकता है. इसके बाद मंत्रालय की किसी आपत्ति के अतिरिक्त, अन्य उम्मीदवारों को राष्ट्रपति द्वारा न्यायालय में नियुक्त कर दिया जाता है. अगर मंत्रालय चाहे तो कारण स्पष्ट करते हुए किसी उम्मीदवार का नाम पुनर्विचार के लिए कॉलेजियम को वापस भेज सकता है. अगर कॉलेजियम फिर भी उम्मीदवार के पक्ष में है और अपनी अनुशंसा को दोहराता है तो सरकार की सभी आशंकाओं के बावजूद राष्ट्रपति के लिए नियुक्ति का परवाना जारी करना आवश्यक है. (प्रत्येक हाई कोर्ट का अपना कॉलेजियम है जिसमें उसका मुख्य न्यायधीश और उसके दो वरिष्ठतम सहयोगी शामिल होते हैं. ये उम्मीदवार न्यायधीशों को अपने समबंधित न्यायालयों के लिए नामित करते हैं, उनकी नियुक्ति से पहले उनकी फाइलों की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की मंजूरी आवश्यक है)

उच्च न्यायपालिका में उम्मीदवारों की चयन सूची बनाने में सरकार की कार्यकारी शाखा को प्रत्यक्ष हस्तक्षेप प्रदान करना आशावादियों की नजरों में, कुछ हद तक पारदर्शिता को बढ़ावा दे सकता था. संविधान के प्रमुख शिल्पकार बीआर अम्बेडकर ने इसे न्यायधीशों के कॉलेजियम वाली व्यवस्था से बेहतर माना होता जैसी कि उन्होंने संविधान सभा के साथी सदस्यों के सामने स्पष्ट भी किया था. जिस दस्तावेज को सभा ने 1949 में अभिपुष्ट किया था उसने उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों को केवल न्यायधीशों या अकेले सरकार पर नहीं छोड़ा था. यह आशा करता था कि सबसे उपयुक्त नामांकित व्यक्ति की तलाश के लिए दोनों मिलकर काम करेंगे. लेकिन वह आशा 1970 के दशक में धराशायी हो गई.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक अधिवक्ता ने मुझे बताया कि “इंदिरा का मामला सबसे खराब था”. भारत के सम्पूर्ण विधिक समुदाय को उसी सामंजस्य को स्थापित करने की कल्पना करना दूर की कौड़ी नहीं है. उस समय के सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठतम न्यायधीशों को पीछे छोड़कर 1973 में इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री की हैसियत से ए. एन. रे को मुख्य न्यायधीश पद पर आसीन करना वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति की उस बहुमूल्य परंपरा का उल्लंघन था जिसे न्यायपालिका ने अपने पूरे इतिहास में कायम रखा था. इस कदम को केशवानंद भारती केस में अतिक्रमित तिकड़ी के खिलाफ प्रतिशोध के रूप में देखा गया. इसमें सुप्रीम कोर्ट की 13 सदस्यीय पीठ ने मामूली बहुमत से फैसला सुनाया कि संसद ऐसा कोई कानून पारित नहीं कर सकती जो संविधान के “बुनियादी ढांचे” का उल्लंघन करता हो और पहली बार किसी कानून को रद्द करने के अदालत के अधिकार को विधिवत पुष्ट किया. गांधी ने सत्ता की शक्ति की इस कटौती को विनम्रतापूर्व नहीं लिया था.

अतुल देव कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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