“नए पेरुमाल को जाति पर लिखने पर संकोच होता है”, अपनी नई किताब पर बोले पेरुमाल मुरुगन

27 जनवरी 2020
नाथन जी
नाथन जी

पेरुमाल मुरुगन तमिल साहित्य की खास अभिव्यक्ति हैं. अब तक उनके 11 उपन्यास, चार कहानी संग्रह और पांच कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं. 53 वर्षीय मुरुगन तमिल नाडु के कंगू नाडु क्षेत्र में पैदा हुए और फिलहाल अतुर के सरकारी कॉलेज में तमिल के प्रोफेसर हैं.

2014 में तमिल उपन्यास माधोरुबागन (2010) का अंग्रेजी अनुवाद वन पार्ट वुमन के नाम से छपने के साथ ही विवाद खड़ा हो गया. हिंदूवादी संगठन भावनाएं आहत होने का आरोप लगाते हुए किताब पर प्रतिबंध की मांग करने लगे. 2015 में मुरुगन ने घोषणा कर दी कि वह अब किताब नहीं लिखेंगे. उन्होंने लिखा : “लेखक पेरुमाल मुरुगन मर गया है. वह भगवान भी नहीं है कि दुबारा जन्म ले ले. पुनर्जन्म में उसका विश्वास नहीं है. अब वह एक सामान्य जीवन जिएगा. पी. मुरुगन के नाम से. उसे अकेला छोड़ दो.”

हाल में उनकी किताब अम्मा प्रकाशित हुई है. कारवां की एडिटोरियल इंटर्न मेघना प्रकाश ने किताब और उनके जीवन के बारे में मुरुगन से बात की.

मेघना प्रकाश : “अम्मा” एक नितांत निजी अनुभव है. यह आपकी “पूनाची” जैसी बाकी किताबों से काफी अलग है, जो जाति और पहचान की राजनीति के सवालों पर केंद्रित थीं. किस घटना ने आपको “अम्मा” लिख देने को प्रेरित किया? क्या यह आपकी मां की कहानी है?

पेरुमाल मुरुगन :  मेरी मां का देहांत 2012 में हुआ. उस समय मैंने दो निबंध लिखे. एक निबंध साहित्यिक पत्रिका कलछुवडु में प्रकाशित हुआ और दूसरा उइरेतु नामक पत्रिका में. तमिल पाठकों ने इन दोनों निबंधों को बहुत सराहा. दोनों का अंबाई (लेखक सीएस लक्ष्मी का उपनाम) ने अंग्रेजी में अनुवाद किया. इन निबंधों ने सभी का ध्यान आकर्षित किया. 2007 के बाद जब मैंने मेरे प्रकाशक कन्नन के साथ विभिन्न साहित्यिक समारोह में जाना शुरू किया, तब मैं अपनी मां के बारे में बहुत बातें करता था. कन्नन ने मुझे मां पर किताब लिखने का सुझाव दिया और इस तरह मां पर किताब लिखने का विचार बना. जब भी हम मिलते थे, वह मुझे किताब लिख लेने का जोर डालते. मैं अपनी मां के इतिहास को लेकर अनिश्चित था क्योंकि ऐसा करने में मेहनत लगती है और मैं नहीं जानता था कि मैं उनके बारे में अधिक जानकारी हासिल कर पाऊंगा या नहीं. ऐसा इसलिए कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं, जो अपने परिवार के इतिहास पर अधिक ध्यान नहीं देता, यहां तक कि मुझे अपनी मां के जन्म का साल तक पता नहीं चला. इसलिए मैं काफी संशय में था. तब मैंने फैसला किया कि मैं मां के जीवन के बारे में न लिखकर, उनके व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए, उनके प्रभाव पर लिखूं जो उनका मेरे दिल पर पड़ा था. किताब में मां के बारे में मेरे विचार और मेरे जीवन के विभिन्न स्तरों पर उनके प्रभावों को अभिलिखित किया गया है, फिर भी मुझसे बहुत कुछ छूट गया. यह एक पूर्ण वर्णन नहीं है. मैं उनके बारे में एक उपन्यास लिखने पर विचार कर रहा हूं.  

मेघना प्रकाश कारवां में एडिटोरियल इंटर्न हैं.

Keywords: Tamil literature perumal murugan censorship
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