ना थूकने वाले हैं, ना जिन पर थूका गया लेकिन झारखंड के चार बड़े अखबारों ने छापी फर्जी खबर

बीते 5 सालों में झारखंड में करीब 20 लोगों की हत्या बच्चा चोरी, गौ-हत्या और गौ-तस्करी जैसी अफवाहों की वजह से हुई है और अब कोरोनायवायरस संक्रमण को लेकर तमाम तरह की अफवाहें समाचार पत्र उड़ा रहे हैं.
22 April, 2020

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7 अप्रैल को झारखंड की राजधानी रांची से करीब 120 किलोमीटर दूर गुमला जिले के सिसई ब्लॉक में अफवाह फैली कि मुसलमान जगह-जगह थूक कर कोरोनावायरस फैला रहे हैं. यह अफवाह सिसई और पास के ही कुदरा गांव में हिंदू-मुस्लिम टकराहट और मारपीट में तब्दील हो गई जिसमें कई लोग घायल हुए और 50 साल के भुलवा उरांव की मौत हो गई.

सिसई पंचायत की मुखिया शकुंतला उरांव के पति प्रकाश उरांव ने इस घटना के बारे में मुझे बताया, “शाम को वह अफवाह फैली. कहीं बोला जा रहा थी कि मुस्लिम लोग कुएं में जहर और कोरोनावायरस डाल रहे हैं और नोट में थूक लगाकर फेंक रहे हैं. इसमें कोई सच्चाई नहीं है. सब अफवाहें हैं. अभी इलाके में शांति है. इधर हमलोग पुलिस प्रशासन के साथ लगातार बैठक कर लोगों को समझा रहे हैं.”

थूक फेंकने वाली अफवाहों पर गुमला के पुलिस सुपरिटेंडेंट (एसपी) हृदीप पी. जर्नादनन ने मुझे कहा, “आप ही बातइए क्या कोई ऐसा करेगा. यह सिर्फ अफवाह है. थूक वाली अफवाह तो पूरे भारत में है. यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ. कोरोनावायरस फैलाने की अफवाह फैली थी, जिससे दो ग्रुप में झड़प हो गई. इसी में एक मानसिक रूप से विक्षिप्त आदमी की मौत हुई.” हालांकि गांव वालों ने बताया कि 50 साल के भुलवा उरांव विक्षिप्त नहीं थे.

जर्नादनन के मुताबिक मामले में अब तक 9 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. झारखंड पुलिस के अनुसार राज्य में लॉकडाउन के बाद से 13 अप्रैल तक अफवाह फैलाने के आरोप में 42 मामले दर्ज हुए हैं और 30 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.

गुमला की घटना के दो दिन बाद 9 अप्रैल की शाम तक सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टल पर थूक प्रकरण को लेकर एक और खबर वायरल हुई जिसमें कहा गया कि रांची के एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र हिंदपीढ़ी में सैनिटाइजेशन करने गए रांची नगर निगम के सफाईकर्मियों पर छतों से लोगों ने थूका. दूसरे दिन 10 अप्रैल को झारखंड से निकलने वाले दैनिक भास्कर, प्रभात खबर, दैनिक जागरण और हिंदुस्तान जैसे सभी प्रमुख अखबारों में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई. दैनिक जागरण के रांची संस्करण में “सफाईकर्मी, सैनिटाइजर वाहन व इंफोर्समेंट टीम पर थूक रहे हिंदपीढ़ी के लोग,” शीर्षक से खबर प्रकाशित हुई. हिंदुस्तान ने खबर बनाई, “इधर सफाईकर्मियों का सम्मान, उधर बदसलूकी”, प्रभात खबर ने लिखा, “हिंदपीढ़ी में गए निगमकर्मियों पर लोगों ने थूका, लौट गए” और दैनिक भास्कर ने अपनी इस खबर को शीर्षक दिया, “हिंदपीढ़ी में सैनिटाइज करने गए कर्मियों पर फेंका थूक, काम बंद.” प्रभात खबर ने उस दिन एक और भड़काऊ खबर छापी जिसका शीर्षक था, “दो युवकों ने 100 के नोट पर थूक कर फेंका, नारा भी लगाया - कोरोना से तबाह करना है.”

इस पूरे मामले की पड़ताल करने पर अखबारों में छपी खबरों और जमीनी हकीकत के बीच साफ फर्क देखने को मिलता है. सबसे पहले तो उपरोक्त किसी भी अखबार ने हिंदपीढ़ी के स्थानीय लोगों या पार्षद का पक्ष नहीं छापा जिससे यहां के पार्षद समेत स्थानीय लोग नाराज हैं और मामले की जांच कराने की मांग कर रहे हैं.

दैनिक भास्कर के लिए यह रिपोर्ट करने वाले रिपोर्टर से जब मैंने पूछा कि खबर करने से पहले उन्होंने स्थानीय लोगों से बात क्यों नहीं की जबकि ऐसा करना उनकी जिम्मेदारी थी तो उस पत्रकार ने मुझे बताया, “खबर की सूचना रात के 9 बजे के बाद मिली थी. उस दिन तो ऐसा मामला ही नहीं था. जो शिकायत आई खबर वह लिखाई. पार्षद के पास उस दिन (9 अप्रैल को) सूचना ही नहीं थी, तो वह क्या बताएंगी. निगम का मामला था, निगम के सबसे जिम्मेदार व्यक्ति नगर आयुक्त होते हैं. उनके संज्ञान में मामला है कि नहीं, उन्होंने कार्रवाई की कि नहीं, हमलोगों को बस इतने से ही मतलब होता है. चार आदमी चार तरह की बात बोलते हैं. नगर आयुक्त बोल देते कि ऐसी कोई बात नहीं है, तो बात खत्म हो जाती.”

खबर के स्त्रोत के बारे में पत्रकार ने मुझे कहा, “खबर नगर आयुक्त (रांची नगर आयुक्त) के हवाले से है. क्योंकि नगर आयुक्त को सफाईकर्मियों ने लिखित शिकायत की है.” लेकिन खबर में नगर आयुक्त का वर्जन नहीं है बल्कि उप नगर आयुक्त रजनीश कुमार के हवाले से बात लिखी गई है.

वह यह भी कहते हैं, “जिस समय खबर का पता चला उस समय स्थानीय लोगों और पार्षद का पक्ष लेना संभव नहीं था. लेकिन दूसरे दिन जब पार्षद से बात हुई तो (11 अप्रैल को प्रकाशित हुई खबर में) पार्षद का वर्जन, स्थानीय लोगों की अपत्ति और उनकी बातें लिखी गई हैं.”

यही सवाल जब मैंने हिंदुस्तान अखबार के रिपोर्टर से पूछा, तो उनका कहना था, “खबर निगम के अधिकारी, सफाईकर्मियों के हवाले से लिखी गई है. मैंने पार्षद को भी फोन किया था, लेकिन उन्होंने कॉल रिवीस नहीं किया.” मैंने इलाके (वार्ड नंबर 23, जहां की यह घटना बताई जा रही है) की पार्षद साजदा खातून से जब पूछा कि क्या उन्हें फोन आया था तो उन्होंने इनकार किया और कहा कि उन्हें “घटना” की सूचना दूसरे दिन के अखबारों से मिली थी.

प्रभात खबर में इस खबर को लिखने वाले रिपोर्टर ने मुझसे कहा, “सफाईकर्मियों के माध्यम से जो खबरें आईं उन्हें लिखा गया है. जो लोग सफाई के दौरान हिंदपीढ़ी में मौजूद थे, उनका कहना था यह. इस बाबत मैंने नगर आयुक्त से पूछा, तो उन्होंने कहा कि अगर ऐसा है तो इस मामले में डीसी और एसपी को लेटर लिखा जाएगा.” जब मैंने रिपोर्टर से पूछा कि उनकी खबर में उन सफाईकर्मियों का नाम क्यों नहीं है जिन पर थूकने की बात की गई है तो रिपोर्टर ने कहा, “क्योंकि वे लोग घबराए हुए थे. मैंने पार्षद को भी कॉल किया था, लेकिन उधर से कॉल रिसीव नहीं किया गया.” इस पर भी खातून ने कहा कि उन्हें रिपोर्टर का फोन नहीं आया.

यही जानकारी लेने के लिए मैंने दैनिक जागरण के रिपोर्टर को कई बार कॉल और मैसेज किए लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.

पार्षद खातून कहती हैं, “ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं है. यह सरासर गलत खबर है. जहां की घटना बताई जा रही है, दरअसल मेरा घर वहीं पर है. पुलिस प्रशासन हर समय, हर जगह मौजूद है, तो निगम प्रतिनिधि होने के नाते मुझे खबर क्यों नहीं दी गई.

इस मामले में नगर आयुक्त मनोज कुमार को मैंने फोन किया तो उन्होंने कहा, “जो हिंदपीढ़ी में सैनिटाइज करने गए थे, उन लोगों ने बताया था कि उन पर थूका गया है. इस मामले पर अज्ञात लोगों पर एफआईआर कराने का भी निर्णय लिया जा रहा है, ताकि जांच हो कि क्या हुआ था, किस जगह पर हुआ था, क्यों हुआ था, कौन लोग थे.”

प्रमुख अखबारों की आधारहीन रिपोर्टिंग से लोग इस कदर नाराज हो गए कि 10 अप्रैल की शाम को लोगों ने खबर को झूठा और मनगढ़त बताते हुए इन अखबारों की कॉपियां जलाईं.

जिन सफाईकर्मियों के ऊपर थूके जाने और जिनकी शिकायत की बात इन अखबारों में लिखी है, मैंने उनमें से कुछ से संपर्क किया. 12 और 13 अप्रैल को उनसे हुई बातचीत में मुझे पता चला कि “घटना” की तारीख तक को इन अखबारों ने गलत छापा है. नाम न छापने की शर्त पर सफाईकर्मियों ने मुझे बताया कि जो “घटना” 9 अप्रैल की बताई गई है वह असल में 7 अप्रैल की थी. सफाईकर्मियों ने यह भी कहा कि उन्होंने 9 अप्रैल को किसी भी अखबारवाले को अपना बयान नहीं दिया था. उन्होंने बताया कि हिंदपीढ़ी में किसी ने भी उन पर छतों से नहीं थूका था और ना ही किसी ने दस-दस रुपए के नोट पर थूक लगाकर उन पर फेंका था. सफाईकर्मियों ने यह जरूर कहा कि थूक जैसा पदार्थ उनकी सफाई वाली गाड़ी के शीशे पर ऊपर से गिरा था और उसे तुरंत ही धो कर सैनिटाइज किया गया था लेकिन थूकते हुए किसी को नहीं देखा.

एक सफाईकर्मी ने विस्तार से बताया, “7 अप्रैल को शाम 7 बजे रूटीन के मुताबिक हमलोग फॉगिंग करते हुए हिंदपीढ़ी के नाला रोड इलाके की तरफ बढ़ रहे थे जब गाड़ी के शीशे पर ऊपर से थूक जैसा पदार्थ गिरा. हमलोगों ने उसे तुरंत धोया और शीशे को सैनिटाइज कर दिया. फिर हमलोग काम में लग गए. यह बात हमलोगों ने किसी को बताई भी नहीं थी. हमलोग इसके बाद वहां 8 और 9 अप्रैल को भी काम पर गए और काम किया. ना ही किसी को हमलोगों ने थूकते हुए देखा और ना किसी ने हमलोगों पर थूका है.” उस सफाईकर्मी ने बताया कि अखबारों में प्रकाशित काम ना करने वाली बात झूठी है.

उन्होंने बताया, “9 अप्रैल को 3 बजे के आसपास रांची नगर निगम के सामने वाली सड़क पर दो बाइक सवार व्यक्तियों ने एक लपेटा हुआ कागज फेंका था जिसमें 100 रुपए का नोट था. यह बात निगम नगर आयुक्त सर को पता चली और पांच मिनट बाद ही सर हमलोगों को बुलाकर मीटिंग किए और पूछे कि सफाई के दौरान कोई दिक्कत तो नहीं हैं न. तब हमलोग बताए हिंदपीढ़ी वाली बात. इसके बाद हमलोगों को कुछ नहीं बोला गया. उस दिन हमलोगों ने किसी भी अखबार में कोई भी बयान नहीं दिया.”

यह पूछने पर कि बाइक सवार लोगों ने कागज फेंकते समय कोई नारा लगाया था, इसके जवाब में उन्होंने कहा कि किसी ने कोई नारा नहीं लगाया.

हालांकि खबर के प्रकाशन के बाद जब पुलिस पर जांच का दबाव बना तो पुलिस ने सफाईकर्मियों से 10 अप्रैल को हिंदपीढ़ी थाने में लिखित शिकायत ली. उस शिकायत में लिखा है, “07/04/20 को सैनिटाइजेशन के दौरान नाला रोड हिंदपीढ़ी में कुछ अज्ञात लोगों के द्वारा चलती गाड़ी पर थूका गया लेकिन अंधेरा होने के कारण हमलोग थूकने वाले को पहचान नहीं पाए और गाड़ी के शीशा को ड्राइवर से धुवा (धुलवा) कर आगे निकल गए और दैनिक सैनिटाइजेशन करते हुए आगे चले गए.”

जबकि लिखित शिकायत में यह कहा गया है कि सफाईकर्मी “गाड़ी के शीशा को ड्राइवर से धुवा कर आगे निकल गए और दैनिक सैनिटाइजेशन करते हुए आगे चले गए” यानी काम जारी रहा, दैनिक भास्कर ने अपनी खबर में लिखा है कि “इसके बाद इंफोर्समेंट अफसर राजेश गुप्ता मोहल्ले को सैनिटाइज किए बिना ही वाहन लेकर वहां से निकल गए.” पुलिस में दर्ज उस शिकायत में राजेश गुप्ता के भी हस्ताक्षर हैं. मैंने जब लिखित शिकायत और भास्कर की रिपोर्ट के विरोधाभास बारे में गुप्ता ने पूछा तो उनका कहना था कि उन्होंने भास्कर के किसी पत्रकार को ऐसा बयान नहीं दिया. गुप्ता ने मुझे बताया कि उन्होंने बिना बात किए उनका बयान छापने की शिकायत दैनिक भास्कर से की है.

पुलिस ने अपनी जांच में पाया है कि मामले में कोई सच्चाई नहीं है. मामले की जांच करने वाले कोतवाली डीएसपी अजीत कुमार विमल ने मुझे बताया, “यह (थूक वाली बात) जांच में सत्यापित नहीं हो पाई. उन लोगों (सफाईकर्मियों) ने कहा है कि थूक जैसा पदार्थ गाड़ी में ऊपर से गिरा, लेकिन थूकते हुए किसी को नहीं देखा है.”

वहीं डीजीपी एमवी राव ने मीडियाकर्मियों के द्वारा किए सवाल पर कहा, “अफवाहें फैलाई जा रही हैं. अफवाहों पर ध्यान नहीं दें. मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि किस पर थूका गया. उस आदमी को आइडेंटिफाई किया आप लोगों ने? पहले उनको लाइए ना. हम वहीं से जांच शुरू करेंगे. हम उसी आदमी को ढ़ूंढ रहे हैं. सिंपल सी बात है. कौवा आया कान काटकर ले गया है, तो पहले कान देखिए, है कि नहीं?”

राज्य में अफवाहों के बढ़ते मामले पर डीजीपी एमवी राव ने कारवां से बातचीत में कहा, “सोशल मीडिया पर लोगों की एक्टिविटी पर झारखंड पुलिस बहुत करीब से नजर रखे हुए है. लोगों से लगातार अपील की जा रही है कि अफवाहों पर ध्यान नहीं दें. लॉकडाउन शुरू होने के बाद से सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट-वीडियो डालने और अफवाहों को लेकर अब तक 42 मामले दर्ज हो चुके हैं. इनमें से 30 लोगों की गिरफ्तारी भी की जा चुकी है. बाकी की तलाश जारी है.”

हिंदपीढ़ी की थूक वाली घटना पर उन्होंने कहा, “मैं मीडिया में पहले ही इस पर बयान दे चुका हूं. जिस पर थूका गया, उसे सामने आना चाहिए. इसे लेकर अगर कोई अपना बयान नहीं देता है तो केस आगे नहीं बढ़ सकता है”