भारतीय मीडिया में खोजी पत्रकारिता का दुखांत

01 जनवरी 2019
कारवां
कारवां

"बाईलाइन" शब्द का सबसे पहला इस्तेमाल एक सदी पूर्व अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्या द सन ऑल्सो राइजेज में हुआ था. समय के साथ हमारे बीच के आदर्शवादियों के लिए ‘बाईलाइन’ पत्रकारिता की शक्ति का प्रतीक बन गया. इस शब्द में वह बात थी कि साधारण पत्रकार शक्तिशाली लोगों को चुनौती दे पाता था. बतौर एक युवा पत्रकार मैं बाईलाइन के लिए मरता था. उसकी पवित्रता पर मुझे विश्वास था और संपादक भी अपनी पूरी ताकत से इसे संरक्षित करते थे. लेकिन मैंने अपने करियर में बाईलाइन की धीमी और क्रूर मौत को करीब से देखा है. इस हत्या में न सिर्फ सत्ता के भूखे नेताओं और उद्योगपतियों का, बल्कि मीडिया मालिक और संपादकों का भी हाथ था.

एक दशक से भी पहले मैंने अपने ईमेल में मॉर्ग यानी मुरदा घर नाम का एक फोल्डर बना लिया था. मैं इस फोल्डर में उन रिपोर्टों को रखने लगा जो स्तरीय होने के बावजूद छपी नहीं. मैंने कितनी ही नौकरियां बदलीं लेकिन उस फोल्डर का वजन बढ़ता गया. एक बड़े स्टार्ट-अप अखबार और एक विशाल मीडिया हाउस, जो अपने ऊंचे मुनाफे के प्रसिद्ध है, से लेकर नैतिक प्रतिष्ठा वाले मीडिया हाउस तक, इस फोल्डर में सबके नाम हैं. मेरे इस मॉर्ग में बड़े नेताओं और कारपोरेट दिग्गजों पर रपटें हैं जो किसी मजबूत मीडिया वाले देश में बहुत बड़ी मानी जातीं और कानून के राज वाले समाज में बड़ी आपराधिक जांचें करवातीं. लेकिन भारत में ऐसी खबरों को कोई लेनदार नहीं है. कई बार ऐसे संपादकों भी दिखे जो पत्रकारिता के साथ खड़े हुए लेकिन ऐसे लोग विरले थे. न्यूजरूम की संस्कृति धीरे-धीरे खराब हुई और खुद की सेंसरशिप करना युवा पत्रकारों की प्रकृति बन गया.

करियर शुरू करने के कुछ सालों के भीतर ही मैं न्यूजरूम की वास्तविकताओं से परिचित हो गया. लगभग एक दशक पहले एक शाम मुझे अपने समाचार पत्र के प्रमोटर का कॉल आया. मेरी टीम के एक सदस्य ने एक रहस्यमय आगजनी के बारे में एक सनसनीखेज रिपोर्ट पता लगाई थी. उस आगजनी में एक प्रमुख रियल एस्टेट कंपनी पर लगाए गए बड़े जुर्माने से संबंधित आयकर फाइलें नष्ट हो गई थीं. प्रमोटर ने मुझे कुछ दिनों तक उस रिपोर्ट को रोके रखने के लिए कहा क्योंकि “उस कंपनी से कोई अपना पक्ष रखना चाहता” था. दो दिन बाद अखबार के पहले पन्ने पर टैक्स चोरी करने वाली रियल एस्टेट कंपनी बड़ा विज्ञापन छपा. वह खबर फिर कभी अखबार में नहीं छप पाई.

एक दशक से भी पहले मैंने अपने ईमेल में मॉर्ग यानी मुरदा घर नाम का एक फोल्डर बना लिया था. मैं इस फोल्डर में उन रिपोर्टों को रखने लगा जो स्तरीय होने के बावजूद छपी नहीं. मैंने कितनी ही नौकरियां बदलीं लेकिन उस फोल्डर का वजन बढ़ता गया.

पिछले कुछ दशकों में भारतीय मीडिया को सिर्फ मुनाफे से मतलब रहा है और सभी ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका त्याग दी है. ऐसी स्थिति में सराहना तो दूर की बात है, उल्टे अच्छी रिपोर्टिंग को जानबूझ कर सेंसर कर दिया जाता है. व्यावसायिकता के लिबास को बनाए रखते हुए संपादक विभिन्न हितों को संतुलित करने की कोशिश कर रहे दलालों का काम करते हैं और मालिकों ने राजनीतिक और व्यावसायिक लाभ के लिए अपने ब्रांडों को प्यादे के रूप में इस्तेमाल किया है. सबसे तेज प्रमोशन और सबसे मोटा वेतन या पैकेज ज्यादातर दलालों के लिए आरक्षित हैं, जो पत्रकारों के भेष में सौदे फिक्स करते हैं और मीडियापतियों की परेशानियों को सुलझाने का काम करते हैं.

जोसी जोसेफ खोजी पत्रकार हैं और टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिंदू और डीएनए जैसे मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. वे ए फीस्ट ऑफ वल्चर: द हिडने बिजनेस ऑफ डेमोक्रेसी इन इंडिया के लेखक हैं.

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