वाराणसी में पत्रकारों पर हमलों का मानवाधिकार आयोग ने लिया संज्ञान

23 जुलाई 2020
मार्च 2018 में पुलिस द्वारा पत्रकारों की पिटाई का दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर विरोध करते पत्रकार. वाराणसी में कोरोना नियंत्रण में सरकार की विफलता की रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों पर पुलिस मामले दर्ज कर रही है.
संचित खन्ना / हिंदुस्तान टाइम्स / गैटी इमेजिस
मार्च 2018 में पुलिस द्वारा पत्रकारों की पिटाई का दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर विरोध करते पत्रकार. वाराणसी में कोरोना नियंत्रण में सरकार की विफलता की रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों पर पुलिस मामले दर्ज कर रही है.
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22 जून को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए नोटिस जारी किया. 26 मार्च को जनसंदेश टाइम्स के संपादक विजय विनीत और पत्रकार मनीष मिश्रा ने मुसहर गांवों की खस्ता हालत के बारे में खबर प्रकाशित की थी. कोइरीपुर गांव में मुसहर जाति के लोग भूख से मजबूर होकर जंगली घांस खाने को विवश हो रहे थे. अचानक घोषित लॉकडाउन की वजह से ये लोग अपने लिए भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाए थे. उसी दिन विनीत को वाराणसी के डीएम कौशल राज शर्मा की ओर से नोटिस मिला जिसमें खबर को “झूठा” कहते हुए इसे “मुसहर परिवारों को बदनाम करने का बेहुदा प्रयास” बताया गया था. डीएम ने विजय विनीत को अपना पक्ष रखने के लिए 24 घंटे का समय दिया और कहा कि उनके ऐसा न करने पर उनके खिलाफ जांच की जाएगी.

इससे अगले दिन मानव अधिकार कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी ने एनएचआरसी में विनीत के मामले में शिकायत दर्ज कराई. रघुवंशी की शिकायत में कहा गया है कि शर्मा का नोटिस पत्रकारों को “धमकी” के समान है और “प्रशासन का व्यावहार ऐसा रहा तो पत्रकार और समाचार पत्र जमीनी हकीकत से जुड़ी खबरे प्रकाशित नहीं करेंगे.” एनएचआरसी ने मुख्य सचिव को इस शिकायत पर आठ हफ्तों के भीतर जवाब देने और कार्रवाई के बारे में सूचित करने का निर्देश दिया.

जून के मध्य में उत्तर प्रदेश पुलिस ने पत्रकार और स्क्रॉल वेबसाइट की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी में उनके गोद लिए गांव से रिपोर्टिंग करते हुए बताया था कि लॉकडाउन में उस गांव के लोग भूखे रहने के लिए विवश हैं. पुलिस ने शर्मा द्वारा इंटरव्यू लिए गए उस गांव की एक निवासी की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की जिसमें शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि रिपोर्ट में उन्हें गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है. शिकायतकर्ता ने पत्रकार पर आरोप लगाया है कि उन्होंने एससी-एसटी अत्याचार रोकथाम कानून के तहत उनकी मानहानि करने वाली सामग्री छापी है.

शर्मा के खिलाफ एफआईआर वाराणसी में पत्रकारों के दमन के एक पैटर्न को दिखाती है. यूपी प्रशासन और पुलिस कोरोनावायरस लॉकडाउन में प्रशासन की विफलता पर लिखने वाले पत्रकारों पर कार्रवाई कर रहे हैं. 10 जुलाई को भारतीय प्रेस परिषद ने कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा पत्रकारों को लक्ष्य बनाने के मामलों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए वक्तव्य जारी किया था. उस वक्तव्य में राज्य के भदोही जिले के चार पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर और विनीत के खिलाफ नोटिस जारी करने का उल्लेख है. उस वक्तव्य में यूपी सरकार को इस संबंध में जवाब देने के लिए कहा गया है.

विजय विनीत ने मुझसे कहा, “मुझे पत्रकारिता करते हुए तीन दशक हो गए हैं. मैंने अमर उजाला, हिंदुस्तान, दैनिक जागरण जैसे अखबारों में और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में काम किया है.” उन्होंने बताया कि मुसहर समाज की घास खाने की मजबूरी से संबंधित समाचार प्रकाशित करने से पहले उन्होंने डीएम का पक्ष जानने के लिए उन्हें फोन लगया था लेकिन बात नहीं हो पाई थी.

सुनील कश्यप कारवां में डाइवर्सिटी रिपोर्टिंग फेलो हैं.

Keywords: COVID-19 Freedom of Press Press Council National Human Rights Commission Musahar
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