कोरोना में पत्रकारों की धरपकड़ का मामला : कश्मीरी फोटो पत्रकार मसरत जहरा पर पुलिस ने लगाया यूएपीए

23 अप्रैल 2020
साभार : शराफत अली
साभार : शराफत अली

20 अप्रैल को 26 साल की कश्मीरी फोटो पत्रकार मसरत जहरा को साइबर पुलिस ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के तहत बुक कर लिया. उस दिन सुबह सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही कश्मीर जोन साइबर पुलिस स्टेशन की एक प्रेस विज्ञप्ति में जहरा के फेसबुक अकाउंट का जिक्र था और लिखा था, "इस फेसबुक अकाउंट को चलानेवाली के लिए... माना जाता है कि वह ऐसी तस्वीरें अपलोड कर रही हैं जो जनता को कानून तोड़ने के लिए उकसा सकती हैं." इस पर जहरा कहती हैं, “यह वैसी ही बात है कि एक पत्रकार के रूप में मेरी कोई पहचान ही नहीं है.”

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार जहरा पर "युवाओं को भड़काने और सार्वजनिक शांति के खिलाफ अपराधों को बढ़ावा देने के आपराधिक इरादों के तहत राष्ट्र विरोधी पोस्ट अपलोड करने" का आरोप लगाया गया है. विज्ञप्ति में आगे लिखा है, "अकाउंट यूजर ऐसी पोस्टें भी अपलोड कर रही हैं जो देश विरोधी गतिविधियों को महिमामंडित करने और देश के खिलाफ असहमति पैदा करने के अलावा कानून को लागू करने वाली एजेंसियों की छवि को धूमिल करती हैं." जहरा के अनुसार, उन्होंने केवल वही तस्वीरें अपलोड की हैं जो उन्होंने जमीनी रिपोर्टिंग करते समय ली थीं. जहरा ने कहा, "मैं बस अपने काम को अपलोड कर रही हूं जिसे मैंने सालों से कवर किया है और कश्मीर में देखा है." उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ तस्वीरें पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुकी थीं. "मैं एक फोटो जर्नलिस्ट हूं, मुझे और क्या अपलोड करना चाहिए?"

जहरा की फेसबुक टाइमलाइन उनके विचारों को दर्शाती है. उनकी कई तस्वीरें कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा की गई दैनिक ज्यादतियों का दस्तावेज हैं, जैसे कि उन परिवार के सदस्यों की तस्वीरें जिन्होंने पुलिस की गोलीबारी के दौरान अपने परिजनों या अपना घर-बार गुमा दिया. अन्य तस्वीरों में इस क्षेत्र में चल रहे प्रतिरोध को दर्ज किया गया है. उदाहरण के लिए, 18 अप्रैल को जहरा ने एक तस्वीर अपलोड की जिसमें कपड़े का एक टुकड़ा, कुछ दस्तावेज और फुटकर नोट दिखाई दे रहे हैं. उन्होंने इसे कैप्शन दिया, ''आरिफा जान अखबार की कतरनें और अपने पति अब्दुल कादिर शेख के खून से सने नोटों को समेटते हुए. उन्हें भारतीय सेना ने आतंकवादी होने के संदेह में गोली मारी थी.” उन्होंने कहा, 'मैं इस दुख से अब उभर नहीं सकी हूं.''' 6 अप्रैल को प्रकाशित एक अन्य तस्वीर में, एक महिला को एक ध्वस्त हो चुके घर के सामने खड़ा दिखाया गया था और कैप्शन था, ''कवि माधो बलहामी, जिन्होंने सुरक्षाबलों की गोलाबारी के दौरान तबाह हो चुके अपने घर में 30 साल में लिखी अपनी कविताओं को खो दिया, ने कहा, ''पहले यह घर मेरे लिए बस एक मकान था अब मेरे लिए यह जगह आस्तान (तीर्थस्थल) है.'" 

साइबर पुलिस ने यूएपीए की धारा 13 के तहत जहरा पर मामला दर्ज किया, जिसके तहत किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल होने या भाग लेने के लिए 7 साल तक की सजा का प्रावधान है. यह अधिनियम गैरकानूनी गतिविधियों में "भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता" के खिलाफ किसी भी गतिविधि में शामिल होने और "भारत के खिलाफ असंतोष का कारण बनने या कारण बन सकने की संभावना" को शामिल करता है. साइबर पुलिस का इस कानून को जहरा पर लगाने से यह प्रतीत होता है कि विभाग पत्रकारिता को गैरकानूनी काम मानता है.

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि "दिनांक 18-04-2020 को दर्ज एफआईआर संख्या 10/2020 साइबर पुलिस स्टेशन, कश्मीर जोन, श्रीनगर में पंजीकृत है और जांच जारी है." जहरा ने मुझे बताया कि उन्हें 18 अप्रैल को साइबर पुलिस से एक कॉल आया था और उनसे पूछताछ के लिए स्टेशन आने को कहा था. पुलिस ने उस समय उन्हें यह नहीं बताया था कि उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है. जहरा ने कहा कि उन्होंने पुलिस को सूचित किया कि वह कर्फ्यू पास नहीं होने के कारण नहीं आ पाएगी, लेकिन पुलिस अधिकारियों ने उनसे कहा कि जिस भी चेक पोस्ट पर उन्हें आगे आने से रोका जाए वहां से वह उन्हें कॉल कर लें. इसके बाद उन्होंने कॉल के बारे में सूचित करने के लिए कश्मीर प्रेस क्लब के सदस्यों से बात की,जिन्होंने कश्मीर के पुलिस महानिरीक्षक और जम्मू-कश्मीर के सूचना और जनसंपर्क विभाग के निदेशक सैयद सेहरिश असगर से संपर्क किया.

अर्शु जॉन कारवां के सहायक संपादक (वेब) है. पत्रकारिता में आने से पहले दिल्ली में वकालत कर रहे थे.

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