"प्रक्रिया ही बन गई है सजा", न्यूजक्लिक पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे पर प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ

19 फ़रवरी 2021
शाहिद तांत्रे/कारवां
शाहिद तांत्रे/कारवां

9 फरवरी को सुबह लगभग 8 बजे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने डिजिटल समाचार पोर्टल न्यूजक्लिक से जुड़े आठ स्थानों पर एक साथ छापेमारी की. इनमें दक्षिणी दिल्ली के सैद-उल-अजाइब इलाके में स्थित वेबसाइट के कार्यालय, प्रधान संपादक-संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ, एक अन्य संपादक प्रांजल पांडे और संपादकीय समूह तथा अकाउंट टीम के पांच सदस्यों के घर शामिल हैं. कार्यालय में पड़ा छापा 38 घंटे तक चला और 10 फरवरी की रात को जाकर खत्म हुआ. पुरकायस्थ के घर पर छापेमारी की कार्रवाई 113 घंटों तक चली जो 14 फरवरी को सुबह 1.30 बजे समाप्त हुई. न तो पुरकायस्थ और न ही उनकी साथी गीता हरिहरन को, जो कि एक लेखक हैं, इस दौरान घर से एक पल के लिए बाहर निकलने दिया गया.

इस बीच, मीडिया रिपोर्टों ने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के हवाले से कहा कि छापे विदेशी धन और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के संबंध में मारे गए हैं. 15 फरवरी को वेबसाइट द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, “हम कानूनी प्रक्रिया की पवित्रता का सम्मान करते हैं और मीडिया ट्रायल में शामिल नहीं होना चाहते हैं. यानी हम इस बात को साफ कर देना चाहते हैं कि मीडिया के एक वर्ग में हमारे खिलाफ लगाए जा रहे आरोप तथ्यहीन, भ्रामक और निराधार हैं. हम उचित फोरम पर इन आरोपों का जवाब देंगे.”

कारवां के मल्टीमीडिया रिपोर्टर शाहिद तांत्रे ने छापे के एक दिन बाद पुरकायस्थ से बात की. उन्होंने न्यूजक्लिक, वामपंथ के साथ इसके जुड़ाव तथा मीडिया, आपातकाल और छापे के बारे में बात की. उन्होंने कहा, “हमने जो किया है उसमें हम पारदर्शी हैं, सब कुछ कानून के मुताबिक किया गया है.''

शाहिद तांत्रे : न्यूजक्लिक की रिपोर्टिंग आम जनता के मुद्दों पर होती है. इस संदर्भ में 113 घंटे की छापेमारी को आप कैसे देखते हैं?

प्रबीर पुरकायस्थ : भारतीय पत्रकारिता के साथ बढ़ती समस्या यह है कि ज्यादातर भारतीय प्रेस आंदोलनों पर रिपोर्ट नहीं करते हैं. अगर मजदूरों की हड़ताल होती है, तो जो एकमात्र मुद्दा सामने आता है वह है ट्रैफिक जाम, वह भी सिटी पेजों पर. मजदूर शहर में क्यों आए, उन्होंने हड़ताल क्यों की, क्या मांगें थीं- इन पर चर्चा नहीं होती. अब वह चीज रह ही नहीं गई है जैसे पहले हुआ करती थी, पहले मजदूरों को लेकर एक बीट हुआ करती थी, किसानों को लेकर एक बीट हुआ करती थी लेकिन अब नहीं है. किसानों की बीट के बजाय कृषि-कमोडिटी बीट होती है. कृषि को महज माल-मूल्य का मुद्दा बना दिया गया है. मजदूर बीट में दरअसल उद्योग के बारे में, शेयर बाजारों के बारे में बात होती है.

शाहिद तांत्रे कारवां के सहायक फोटो संपादक हैं.

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