प्रवीण स्वामी की “अज्ञात सूत्रों” वाली खबरें

07 मार्च 2019
प्रवीण स्वामी को राष्ट्रीय सुरक्षा बीट के शीर्ष पत्रकारों में माना जाता है. उनके पास इस बीट में रिपोर्टिंग का 30 साल का अनुभव है.
ध्रुव दत्ता
प्रवीण स्वामी को राष्ट्रीय सुरक्षा बीट के शीर्ष पत्रकारों में माना जाता है. उनके पास इस बीट में रिपोर्टिंग का 30 साल का अनुभव है.
ध्रुव दत्ता

भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के टकराव के बाद, मुख्यधारा के भारतीय मीडिया में, पाकिस्तानी सीमा के भीतर भारतीय वायुसेना के हमले और दोनों देशों के बीच हुई हवाई झड़प की परिस्थितियों पर, अटकलबाजियों की बाढ़ सी आ गई. कई मीडिया संस्थानों ने अज्ञात सूत्रों, असत्यापित साक्ष्य पर पूरी तरह से निर्भर रह कर गंभीर दावे किए और कई बार तो पूरी तरह से फर्जी खबर प्रकाशित की.

ऐसी अप्रमाणित सूचनाओं को प्रकाशित करने वाले मीडिया संस्थानों में फर्स्टपोस्ट भी है. इसके प्रमुख प्रवीण स्वामी नेटवर्क 18 के सलाहकार संपादक हैं. फर्स्टपोस्ट, नेटवर्क 18 की संस्था है. स्वामी को राष्ट्रीय सुरक्षा बीट के शीर्ष पत्रकारों में माना जाता है. उनके पास इस बीट में रिपोर्टिंग का 30 साल का अनुभव है. उनकी अधिकांश रिपोर्ट, गुप्तचर एजेंसियों के अज्ञात सूत्रों के हवाले से हैं. प्रवीण ने अपने करियर का ज्यादातर समय “द हिंदू समूह” के साथ बिताया है. वे 1990 के दशक में द हिंदू से जुड़े और 2014 तक कुछ अंतरालों के अलावा निरंतर इससे जुड़े रहे. इसके बाद, कुछ साल उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस के साथ काम किया. फिर 2018 में अचानक द इंडियन एक्सप्रेस को छोड़ दिया. कयास लगाया गया है कि पाकिस्तान की जेल में कैद नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव पर उनकी विवादास्पद रिपोर्ट के कारण उनको इस्तीफा देना पड़ा.

2013 में अंग्रेजी कारवां में भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा बीट पर मैंने स्टोरी की थी. उस रिपोर्ट में मैंने बताया था कि भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा बीट के लिए रिपोर्ट करना एक संदेहास्पद काम है जो सुरक्षा एजेंसियों और पत्रकारों के बीच लेनदेन वाले संबंधों पर आधारित रहता है. इस बीट का आकर्षण कुछ ऐसा है जो यह सुनिश्चित करता है कि पत्रकार अपने सूत्रों को अज्ञात रख सकते हैं, संपादक उनसे बहुत कम सवाल करते हैं. इस बीट के पत्रकार लीकों पर निर्भर रहते हैं और इन्हें हासिल करने के लिए सूचनाओं के स्रोत को नजरअंदाज करना पड़ता है. इस डाइनैमिक्स का लाभ भारतीय सुरक्षा संस्थान और सरकार उठाते हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सार्वजनिक जांच और जवाबदेहिता से परे रह कर काम करना पसंद करते हैं.

प्रवीण स्वामी, जिनके काम की मैंने 2013 की अपनी रिपोर्ट में समीक्षा की है, उपरोक्त पैटर्न में फिट बैठते हैं. मानव अधिकार समूह जामिया टीचर्स सेलिब्रिटी एसोसिएशन की 2010 की रिपोर्ट कहती है, “यदि आपको जानना है कि भारत की शीर्ष गुप्तचर एजेंसियां क्या योजना बना रहीं हैं तो प्रवीण स्वामी के लेखों में इसका सटीक संकेत मिल जाता है.”

स्वामी की अधिकांश रिपोर्ट इंटेलिजेंस एजेंसियों के अज्ञात सूत्रों के हवाले से होती हैं और इनमें बार बार दोहराया जाने वाला पैटर्न दिखाई देता है. 2013 में मैंने लिखा था कि उनकी रिपोर्ट में मुश्किलों से मिलने वाले ब्यौरे आत्मविश्वास से बताए जाते हैं. उनका काम आज तक ऐसे ही चल रहा है. 26 फरवरी को विदेश सचिव विजय गोखले ने घोषणा की कि भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में हवाई हमला किया है. इस हमले से संबंधित आरंभिक खबर देने वालों में फर्स्टपोस्ट भी थी. उस रिपोर्ट में दावा किया गया कि, “अज्ञात सूत्रों के अनुसार, भारतीय वायु सेना के विमानों ने जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को ही नहीं बल्कि मुजफ्फराबाद में लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन के अड्डों को भी लक्ष्य बनाया है.” सूत्रों ने यह भी दावा किया कि “चकोटी, बालाकोट और मुजफ्फराबाद” सहित 6 अन्य लक्ष्यों पर भी हमला किया गया और “खैबर पख्तूनख्वा के कांगर” के पांच अन्य आतंकी अड्डों को भी वायु सेना ने अपना निशाना बनाया. यह रिपोर्ट एफपी स्टाफ के नाम से छपी थी.

प्रवीण दोंती कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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