क्या पत्रकारों को सेना का समर्थक होना चाहिए?

04 मार्च 2019

युद्ध में अदम्य साहस दिखाने वाले लोग हीरो बन जाते हैं. लेकिन युद्ध ऐसे जोकर भी पैदा करता है जो देश भक्ति का चोला ओढ़े रहते हैं और मंच पर अकड़ और झल्लाहट वाला तमाशा दिखाते हैं. भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ रहे तनाव ने नियंत्रण रेखा की हमारी ओर ऐसे कई जोकरों को जन्म दिया है. 14 फरवरी को आदिल अहमद डार नाम के एक कश्मीरी युवा ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के दस्ते में अपनी विस्फोटकों से भरी गाड़ी टकरा दी. पुलवामा में हुए इस हमले में कम से कम 40 जवानों की मौत हो गई और कई घायल हुए. उस वक्त से ही भारतीय पत्रकारों ने, खासकर टीवी पत्रकार, अपने काम और निष्पक्षता को ताक पर रख दिया है और तिरंगा ओढ़ लिया है. पुलवामा हमले के बाद से ही इन लोगों ने युद्धोन्माद भरी बातें फैलानी शुरू कर दी और पिछले दो दिनों में तो इसकी अति कर दी. ये उस समय और परवान चढ़ा गया जब भारत ने बालाकोट में हवाई हमला किया. बालाकोट पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में है. इस हमले के बाद पाकिस्तान के साथ भारत का हवाई युद्ध भी हुआ.

इन पत्रकारों को उन पत्रकारों से अलग करके देखने की दरकार है जिन्होंने अपनी जानें गंवाने वाले सीआरपीएफ जवानों के प्रति संवेदना व्यक्त की. ये संवेदना करुणामय है क्योंकि किसी की जान उस तरह से नहीं जानी चाहिए जैसे इन जवानों की गई. ये बावजूद इसके है कि जवान जान के खतरों को भलीभांति समझते हैं. यह खतरा उनकी नौकरी का हिस्सा होता है. कुछ पत्रकार तो असल में अपनी संवेदना जाहिर कर रहे होते हैं. लेकिन बाकी रिपोर्टिंग भवनाओं से ओत-प्रोत होने लग जाती है जिसकी वजह से पेशेवर चीजों और निजी चीजों के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है.

कुछ न्यूजरूमों में जिस तरह की व्यथा ने घर जमा लिया है वह सच में चौंकाने वाला था. नेटवर्क एंकरों में तो एक-दूसरे को देशभक्ति को मात देने की होड़ सी लग गई जिसके लिए धुंए में लिपटे भद्दे दृश्यों के अंबार का इस्तेमाल किया गया. ऐसे ग्राफिक्स का इस्तेमाल किया गया जो कि खतरनाक है और मिर्गी से जूझ रहे लोगों को हिलाकर रख सकते हैं. हैशटैग्स भी राष्ट्र-भक्ति से ओत-प्रोत हो गए. इससे ऐसा कोई भी अवरोध समाप्त हो गया जो राज्य के प्रचार में लगे किसी चैनल और विश्वसनीय समाचार चैनलों के बीच मौजूद होते हैं. 

इनके उत्साह को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए. ये काम इंडियन जर्नलिज्म रिव्यू नाम के मीडिया ब्लॉग ने अपनी वेबसाइट पर किया. जी न्यूज के सुधीर चौधरी और नेटवर्क 18 के आनंद नरसिम्हा जैसे कुछ एंकरों ने इसके लिए ट्विटर का सहारा लिया है. वहां उन्होंने बॉलीवुड फिल्म उरी के मशहूर नारे का इस्तेमाल किया. इस डायलॉग को तब से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है. डायलॉग है- “हाउ इज द जोश?” टाइम्स नाउ चैनल के आधिकारिक हैंडल से एक ट्वीट में लिखा था, “मजबूत भारत” “नए पाकिस्तान” पर भारी है. इसे चैनल के एडिटर-इन-चीफ राहुल शिवशंकर ने रीट्वीट किया. अपने प्राइम टाइम डिबेट में उन्होंने अपनी इस भावना को और चरम पर पहुंचा दिया. इस दौरान “इंडिया स्ट्राइक्स” और “पाक फेक क्लमेस” जैसे हैशटैग्स का इस्तेमाल किया गया. उनकी सहकर्मी नविका कुमार ने पाकिस्तानी गायक-अदाकार अली जफर के ट्वीट के जवाब में भारत के हवाई हमले पर अपना उल्लास जताया. अपने ट्वीट में जफर ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के एक भाषण की तारीफ की थी. कुमार ने पूछा था कि क्या बालाकोट हवाई हमले के बाद जफर की “बोलती बंद हो गई.” अपने इस ट्वीट को उन्होंने भारतीय झंडे की 10 इमोजियों से सजाया था. उन्होंने इसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इंडियान एयर फोर्स को भी टैग किया था. अपनी देशभक्ति को वे अनदेखा कैसे होने दे सकती थीं. सुमित अवस्थी ने अपने ट्विटर पर लिखा कि भारत बेहद लंबे समय से खामोश था और यह समय शौर्य दिखाने का है.

इस फूहड़पन में शामिल होते हुए आज तक की अंजना ओम कश्यप ने एक दोहे के सहारे लिखा, “दुश्मन अच्छे से समझ लो, जब जब हमसे लोहा लोगे हार जाओगे.” राहुल कंवल ने कुछ ही महीने पहले छत्तीसगढ़ में माओवादी विद्रोहियों के खिलाफ एक काल्पनिक ऑपरेशन के “नाट्य रूपांतरण” में हिस्सा लिया था. उन्होंने उत्सुकता के साथ ट्वीट किया “जय हो” जिसके बाद उन्होंने लिखा “पाकिस्तान को यकीन नहीं हो रहा.” सीएनएन-न्यूज 18 की मारिया शकील ने तो इससे भी हद कर दी. उन्होंने विपक्ष को इस बात की झाड़ लगाई कि वे सिर्फ भारतीय एयरफोर्स की तारीफ कर रहा है, शकील ने कहा कि मोदी की राजनीतिक इच्छा को भी श्रेय मिलना चाहिए. इंडिया टुडे समूह के कार्यकारी संपादक गौरव सावंत ने तो भारतीय फौज से अपील की उन्हें पहले हमले के बाद नहीं रुकना चाहिए, बल्कि उन्हें “जोरदार और गहरे” तक और “बार बार हमला” करना चाहिए. हालांकि, अनुभवी एंकर राजदीप सरदेसाई ने तुल्नातमक रूप से संयम दिखाया. लेकिन वे भी एयरफोर्स के गुणगान करने वाली भीड़ का हिस्सा बन गए. उन्होंने भारतीय हवाई हमले को एक “शानदार अभियान” बताया जिसे शाबाशी मिलनी चाहिए. सीएनएन-न्यूज 18 के ही भूपेंद्र चौबे ने भारत के “बहादुर योद्धाओं” को सलाम किया और आज तक के रोहित सरदाना ने कहा कि भारत के हवाई हमले की कोई दरकार नहीं है क्योंकि पाकिस्तान ने इसकी पुष्टि कर दी है.

सलिल त्रिपाठी लंदन में रहते हैं और कारवां और मिंट के कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं.

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