रिपब्लिक टीवी की बहसों का एजेंडा क्या है? 1179 बहसों की पड़ताल

इलसट्रेशन : सुकृति अनाह स्टेनली
इलसट्रेशन : सुकृति अनाह स्टेनली

हमेशा सुर्खियों में बने रहने वाला समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी एक बार फिर तब सुर्खियों में आया जब नवंबर की शुरुआत में उसके मालिक और स्टार एंकर अर्नब गोस्वामी को महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार किया. गोस्वामी को व्यवसायी अन्वय नाइक की आत्महत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया.

नाइक ने अपने सुसाइड नोट में गोस्वामी का नाम लेकर कहा है कि उन्होंने बकाया नहीं चुकाया जिसकी वजह से उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. गोस्वामी आठ दिनों तक हिरासत में रहे. सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले में रिकॉर्ड तेजी से सुनवाई की और अंतरिम जमानत देते हुए उन्हें रिहा करने का निर्देश दिया.

गोस्वामी की गिरफ्तारी ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी. सबसे हैरतअंगेज प्रतिक्रिया नरेन्द्र मोदी सरकार के मंत्रियों की रही कि इस पत्रकार को जेल भेजना अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है. हालांकि ये नेता जेलों में बंद अन्य मीडिया कर्मियों पर उतना ध्यान नहीं देते. अन्य बहुत से पत्रकार हैं जो मानने को तैयार नहीं थे कि गोस्वामी पर हमला मीडिया पर हमला है क्योंकि वे गोस्वामी को प्रेस बिरादरी का मानते ही नहीं हैं.

अर्नब का एक खास अंदाज है जहां वह खुद को एक राष्ट्रवादी की तरह पेश करते हैं और पक्षपाती रिपोर्टिंग करते हैं. पत्रकारों का कहना है कि वह पत्रकारिता के नाम पर दर्शकों को गुमराह करते हैं. लोग इससे सहमत हों या न हों लेकिन रिपब्लिक टीवी पर पक्षपाती होने का आरोप खारिज नहीं किया जा सकता. हमने मई 2017 से अप्रैल 2020 तक इस चैनल पर प्रसारित होने वाले सभी प्राइम टाइम कार्यक्रमों का अध्ययन किया. इस तरह हमने कुल 1779 प्राइम टाइम प्रसारणों का अध्यन किया और हमारा निष्कर्ष एकदम स्पष्ट है कि रिपब्लिक टीवी मोदी सरकार और उसकी नीतियों के पक्ष में लगातार बहस आयोजित करता है. यहां तक कि बीजेपी की विचारधारा के पक्ष में भी वह ऐसा ही करता है. ज्यादा खराब बात यह है कि इन बहसों में बहुत कम ऐसे मुद्दों को शामिल किया जाता है जो भारत की जनता पर असर डालते हैं, जैसे अर्थतंत्र, शिक्षा और स्वास्थ्य. इन बहसों में अक्सर विपक्ष और उन लोगों, समूहों पर हमला किया जाता है जो सत्तारूढ़ सरकार की विचारधारा का विरोध करते हैं.

कई तथ्य तो चौंकाने वाले हैं. रिपब्लिक टीवी की राजनीतिक बहसों का लगभग 50 फीसदी विपक्ष की आलोचना में खर्च हुआ है और उसने एक भी ऐसी डिबेट नहीं की है जिसे हम विपक्ष का पक्ष लेने वाला कह सकें. रिपब्लिक टीवी ने हर 100 बहसों में केवल 8 बीजेपी की आलोचना में की हैं. इस समाचार चैनल ने विपक्ष विरोधी बहसों को 2019 के चुनाव आते-आते तेजी से बढ़ा दिया. 2019 के आखिर और 2020 के शुरू में इसने सीएए पर 54 बहसें आयोजित की जिसमें से कम से कम 30 फीसदी में शाहीन बाग में चल रहे आंदोलन की आलोचना थी. हर दूसरी बहस में उसने सत्तारूढ़ पार्टी का पक्ष लिया और सीएए विरोधी प्रदर्शनों की आलोचना की. कृषि, स्वास्थ्य, अर्थतंत्र जैसे विषयों पर केवल एक फीसदी प्राइम टाइम चर्चा हुई. निरंतर और आक्रमक रूप से रिपब्लिक टीवी ने मोदी सरकार के पक्ष में हैशटैग चलाए जिनमें “मोदी ने पाकिस्तान को रौंदा”, “G-7 मीटिंग में चलाया जादू” और मोदी का “भ्रष्टाचार पर हमला” तथा “धोखाधड़ी करने वालों को सजा” जैसे हैशटैग शामिल हैं. हमने रिपब्लिक टीवी की बहसों की तुलना एनडीटीवी की बहसों से की. आप पूछ सकते हैं कि क्यों इन दोनों की तुलना की गई? ऐसा इसलिए है कि हमारा अनुमान है कि हाल के मुख्यधारा के लोकप्रिय समाचार चैनलों में ये दो चैनल दो ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं. हमने जो डेटा लिया है वह इन चैनलों ने अपनी-अपनी वेबसाइटों पर साझा किया है.

क्रिस्तोफ जाफ्रलो कारवां के कन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं.

विहांग जुमले आईटी इंजीनियर है. ट्विटर : @vihangjumle

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