मीडिया अंबानी की दुकान नहीं है : संदीप भूषण

20 जून 2019
सौजन्य : संदीप भूषण
सौजन्य : संदीप भूषण

वरिष्ठ पत्रकार संदीप भूषण की आने वाली किताब द इंडियन न्यूजरूम कारपोरेट मीडिया के एजेंडा वाली पत्रकारिता पर सवाल उठाती है. यह किताब सितारा पत्रकारों और ऊंची जाति के लोगों के नियंत्रण वाले भारतीय मीडिया के कामकाज के तरीकों की पड़ताल करती है. भूषण 20 साल से अधिक समय तक टीवी पत्रकार रहे और एनडीटीवी और हेडलाइंस टुडे जैसे समाचार चैनलों में काम किया. वह कारवां में नियमित तौर पर लिखते हैं.

आने वाली किताब और मीडिया से जुड़े अन्य मामलों पर ​अप्पू अजीत ने संदीप भूषण से बात की. भूषण बताते हैं कि भारतीय मीडिया ने राजनीति को बचकाना बना दिया है, इसे एक खेल में बदल दिया है.

अप्पू अजीत- जल्द प्रकाशित हो रही अपनी किताब में आप भारतीय समाचार चैनलों का असहज करने वाला पक्ष सामने ले कर आए हैं. अपने पहुंच वाली पत्रकारिता, पत्रकारों को हाशिए पर कर दिए जाने, न्यूजरूम की शक्ति संरचना और सितारा रिपोर्टर वाली परिपाटी पर आपने प्रकाश डाला है. उपरोक्त में सबसे चिंताजनक बात कौन सी है?

संदीप भूषण- चलिए सबसे पहले मैं आपको बता दूं कि मैंने यह किताब क्यों लिखी... पत्रकारिता के बारे में भारत में कोई नहीं लिखता. किसी को नहीं पता कि मीडिया की दुनिया में क्या चल रहा है. मैंने कुछ विश्वविद्यालय में अध्यापन किया है. मैंने वहां देखा है कि वहा एक समानांतर विमर्श चलता है जिसमें बताया जाता है कि कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों की वास्तविकता में क्या अंतर है. मीडिया की दुनिया आत्ममुग्ध और कुएं के मेंढ़क वाली दुनिया है. मैंने पत्रकार की तरह लिखने की कोशिश की है. इस दुनिया को मैंने जैसा देखा उसे संपूर्णता में समझने की कोशिश की. इस किताब को लिखने का मेरा दूसरा उद्देश आत्ममंथन करना था. दुनिया भर का मीडिया आत्ममंथन कर रहा है लेकिन भारत में, दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं दिखाई देता. भारत में लिबरल स्पेस और लिबरल मीडिया ने भारत में कैसा स्वरूप लिया है और आज उसके सामने कैसी चुनौतियां हैं इस पर केंद्रित होकर मैंने यह किताब लिखी है. इस बीच लिबरल मीडिया बदनाम हुआ है लेकिन फिर भी भीतर झांक कर देखने की जरूरत महसूस नहीं कर रहा है. साथ ही आज एक बहुत ताकतवर दक्षिणपंथी वैचारिक आंदोलन पत्रकारों के बीच चल रहा है.

मुझे लगता है कि जिन पत्रकारों को रखा गया और निकाला गया उसे रिकॉर्ड में लाना बहुत जरूरी है और यही मामले का केंद्रीय विषय है. हम लोग मोदी मीडिया की बात करते हैं जो सरकार से सवाल नहीं करता, सरकार चैनलों के प्रमोटरों को नियंत्रण में और संपादकों को अपनी जेब में रखती है और संपादक और प्रमोटर पत्रकारों पर दबाव डालते हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इस तरह की शक्ति संरचना है. सबसे पहले रिपोर्टिंग को खत्म कर दिया गया. समाचार पूरी तरह से गायब हो चुके हैं. पहले समाचार चैनलों में विषयों के जानकार पत्रकार होते थे अब ऐसा नहीं होता.

अप्पू अजीत कारवां के एडिटोरियल असिसटेंट हैं.

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