अदालत पहुंचा आईआईटी गुवाहाटी परिसर में बने शिव मंदिर का विवाद

04 दिसंबर 2019
जनहित याचिका में कहा गया है कि 2004 में परिसर के अंदर एक बांस का ढांचा अस्तित्व में आया था. 2004 और 2015 के बीच इस मंदिर ने 1.5 स्क्वायर मीटर जमीन कब्जा ली और इसके चारों तरफ बांसों की बाड़ा लगा दिया गया.
जनहित याचिका में कहा गया है कि 2004 में परिसर के अंदर एक बांस का ढांचा अस्तित्व में आया था. 2004 और 2015 के बीच इस मंदिर ने 1.5 स्क्वायर मीटर जमीन कब्जा ली और इसके चारों तरफ बांसों की बाड़ा लगा दिया गया.

आईआईटी गुवाहाटी परिसर के अंदर बने भगवान शिव के एक मंदिर को लेकर यहां के शिक्षकों और छात्रों के बीच विवाद चल रहा है. इस साल 6 मई को इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर बृजेश राय और उसी विभाग के पीएचडी के छात्र विक्रांत सिंह ने गुवाहाटी हाई कोर्ट में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर परिसर में स्थित मंदिर को गिराए जाने की मांग की है. याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि “मंदिर अवैध निर्माण है और यह एक धर्म विशेष के लोगों के साथ विशेष व्यवहार करने का षडयंत्र हो सकता है और इससे संस्थान का माहौल सांप्रदायिक बन जाने का खतरा है.” याचिका का जवाब देते हुए आईआईटी प्रशासन ने अदालत को कहा है कि मंदिर को तोड़े जाने की मांग याचिकाकर्ताओं की “दुराग्रही मानसिकता को दर्शाती है.”

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मंदिर को पिछले पांच साल में अवैध तरीके से चंद उच्च अधिकारियों की मिलीभगत से बनाया गया है और सार्वजनिक शिक्षा संस्थान के परिसर में इसका निर्माण उसकी धर्मनिरपेक्ष प्रकृति का उल्लंघन है. मंदिर को तोड़े जाने के अलावा याचिकाकर्ताओं ने अदालत की निगरानी में मंदिर के निर्माण की जांच और उसमें शामिल अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग भी की है. दूसरी ओर, आईआईटी प्रशासन ने अदालत से कहा है कि यह मंदिर कैंपस निर्माण होने के पहले से ही अस्तित्व में था और इसकी मरम्मत और निर्माण में संस्थान के धन का इस्तेमाल नहीं हुआ है. प्रशासन ने धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की चिंता को खारिज करते हुए अदालत से कहा कि मंदिर के होने से परिसर का धर्मनिरपेक्ष माहौल खतरे में नहीं पड़ता. इसके अलावा प्रशासन ने यह भी कहा है कि दायर याचिका को छात्रों का समर्थन नहीं है और कोर्ट को याचिकाकर्ताओं को अदालत का समय खराब करने के लिए दंडित किया जाना चाहिए.

मैंने कोर्ट के समक्ष पेश किए गए सभी सबूतों का अध्ययन किया और याचिकाकर्ताओं और संस्थान के उन निदेशकों से भी बात की जिनके कार्यकाल में मंदिर का कथित निर्माण हुआ था. इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रोचक पक्ष यह है कि प्रशासन खुले तौर पर एक धार्मिक ढांचे का समर्थन कर रहा है जबकि उसके अपने शिक्षक और छात्र विरोध कर रहे हैं. अदालत को प्रशासन ने बताया था कि याचिका का समर्थन छात्र नहीं कर रहे लेकिन याचिकाकर्ताओं ने कम से कम छह छात्रों के हस्ताक्षर वाला शपथपत्र अदालत में जमा किया है जिसमें छात्रों ने कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि सार्वजनिक परिसर के भीतर मंदिर का निर्माण सही बात है, खासकर आईआईटी गुवाहाटी जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के अंदर.”

अपनी पीआईएल में राय और सिंह ने चार पार्टियों को प्रतिवादी बनाया है जो - मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के सचिव, आईआईटी गुवाहाटी के निदेशक, आईआईटी का बोर्ड ऑफ गवर्नर्स और संस्था के पूर्व अध्यक्ष राजीव मोदी हैं. हाईकोर्ट ने राजीव मोदी को फिलहाल छूट दी है, मंत्रालय ने अब तक अपना जवाब नहीं दिया है. हालांकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का संयुक्त सचिव बोर्ड का सदस्य भी होता है. बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष टीजी सीताराम हैं जो स्वामी विवेकानंद योग शोध न्यास से भी जुड़े हैं. यह न्यास नरेन्द्र मोदी के निजी योग शिक्षक नागेंद्र गुरुजी चलाते हैं. 1 अगस्त को याचिका के जवाब में आईआईटी गुवाहाटी के रजिस्ट्रार जनरल एमजीपी प्रसाद ने अदालत के समक्ष शपथपत्र दायर किया है.

अपने जवाब में प्रसाद ने राय और सिंह पर निजी हमले किए हैं. प्रसाद ने याचिका को इस आधार पर खारिज किए जाने की मांग की है कि केवल राय और सिंह को ही मंदिर से दिक्कत है. शपथपत्र में लिखा है, “आईआईटी गुवाहाटी में 10000 लोग रहते हैं और यहां रहने वाले अधिकांश लोग मंदिर जाते हैं. लेकिन किसी ने भी मंदिर को चुनौती नहीं दी. राय और सिंह ने गलत इरादों से याचिका दायर की है.” साथ ही, सिंह को राय का “आज्ञाकारी छात्र” बताते हुए कहा गया कि उन्होंने अपने रिसर्च गाइड को खुश करने के लिए ऐसा किया है.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

Keywords: IIT Guwahati PIL temple
कमेंट