इसरो जासूसी मामला : नई याचिका में नंबी नारायणन और पूर्व सीबीआई अधिकारियों के बीच "संदिग्ध" भूमि सौदे का आरोप

28 जुलाई 2021
इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन और उनके बेटे उन सीबीआई अधिकारियों के नाम पर विभिन्न भूमि लेनदेन के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी धारक हैं.
इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन और उनके बेटे उन सीबीआई अधिकारियों के नाम पर विभिन्न भूमि लेनदेन के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी धारक हैं.

इसरो जासूसी मामले से संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष एक याचिका 1994 से 1996 तक हुई सीबीआई की जांच पर और सवाल उठाती है. इस साल 23 जुलाई को केरल के पूर्व पुलिस अधिकारी एस विजयन ने अदालत में याचिका दायर कर इसरो जासूसी मामले को फिर से शुरू करने और दोबारा जांच कराने का अनुरोध किया है. सीबीआई द्वारा 25 साल बाद मामले पर अपनी अंतिम रिपोर्ट में यह बात सामने आई है. याचिका रिपोर्ट में "गंभीर तथ्यात्मक और कानूनी दोषों" की ओर ध्यान आकर्षित करती है "जिसके कारण अंततः आरोपी व्यक्तियों को बरी कर दिया गया." इस महीने की शुरुआत में विजयन ने अदालत के समक्ष दस्तावेज पेश किए, जिसमें 2004 और 2008 में तमिलनाडु में लगभग सौ एकड़ जमीन का लेन-देन दिखाया गया था, जो इस मामले के प्रमुख संदिग्धों में से एक पूर्व इसरो वैज्ञानिक नंबी नारायणन और अन्य के साथ सीबीआई अधिकारियों के बीच हुआ था.

याचिका में जिन पूर्व सीबीआई अधिकारियों के नाम हैं उनमें राजेंद्रनाथ कौल, केवी हरिवलसन और पीएम नायर शामिल हैं. 1994 और 1996 के बीच जब सीबीआई इसरो मामले की जांच कर रही थी कौल और नायर ने एजेंसी में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और हरिवलसन ने नारायणन और शशिकुमारन के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत एक अलग मामला दर्ज किया था- वह खुद इस मामले में शामिल इसरो वैज्ञानिक हैं. सीजेएम अदालत के समक्ष पेश किए गए भूमि दस्तावेजों के अनुसार, नारायणन और उनके बेटे शंकर कुमार इन सीबीआई अधिकारियों या उनके रिश्तेदारों के नाम पर विभिन्न भूमि लेनदेन के पावर ऑफ अटॉर्नी हैं. विजयन की नवीनतम याचिका में कहा गया है कि "जांच अधिकारी और उनके वरिष्ठ अधिकारियों को रिश्वत देकर" इसरो मामले को नांबी नारायणन ने नुकसान पहुंचाया था.

इसरो जासूसी मामला रॉकेट प्रौद्योगिकी के संदिग्ध हस्तांतरण और विदेशी नागरिकों को भारत के रक्षा प्रतिष्ठानों के बारे में जानकारी पहुंचाने से संबंधित है. सीबीआई को दिए जाने से पहले इस मामले की जांच केरल पुलिस और इंटेलिजेंस ब्यूरो ने की थी. एजेंसी ने उन सभी सुरागों को खारिज कर दिया जो उस समय तक एकत्र किए गए थे और आईबी और केरल पुलिस पर एक विस्तृत साजिश रचने का आरोप लगाया था. नवंबर 2020 में कारवां की कवर स्टोरी में इस बारे में विस्तार से बताया गया है. सीबीआई के हस्तक्षेप के कारण मामले को प्रभावी ढंग से बंद कर दिया गया था और मामले के तथ्यों पर कोई सुनवाई नहीं हुई थी. इसके बजाय जांचकर्ता खुद जांच और लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक कार्यवाही का शिकार बन गए.

2019 में पद्म भूषण प्राप्त करने वाले नारायणन विवाद का सबसे अधिक पहचाना जाने वाला चेहरा हैं, यहां तक ​​​​कि हाल ही में उनके साथ हुए कथित उत्पीड़न को दर्शाने वाली एक फीचर फिल्म भी बनी है जिसमें आईबी और केरल पुलिस अधिकारियों पर पूछताछ के दौरान उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप लगाया और उनके करियर को लगे झटके के बारे में दिखाया गया है. 1995 में केरल उच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों की एक खंडपीठ, जिन्होंने पूछताछ के वीडियो टेप देखे थे, ने कहा कि उन्हें यातना के कोई संकेत नहीं मिले. 2005 में एक विभागीय जांच के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अधिकारियों को दोषमुक्त कर दिया. इसके बाद केरल उच्च न्यायालय और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट राज्य सरकारों ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के खिलाफ फैसला सुनाया.

सितंबर 2018 में दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हालांकि नारायणन के पक्ष में फैसला सुनाते हुए एक पूर्व न्यायाधीश डीके जैन की अध्यक्षता में एक समिति की नियुक्ति कर "गलती करने वाले अधिकारियों के खिलाफ उचित कदम उठाने के तरीके और साधन खोजने" का निर्देश दिया. तीन सदस्यीय समिति में केंद्रीय गृह मंत्रालय में पूर्व अतिरिक्त सचिव डीके प्रसाद और केरल के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव वीएस सेंथिल शामिल थे. आयोग ने 25 मार्च 2021 को सीलबंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट सौंपी.

निलीना एम एस करवां की रिपोर्टिंग फेलो हैं. उनसे nileenams@protonmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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