भारतीय राज्य के फासीवादी चरित्र पर आयोजित चर्चा में शामिल हुए ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के नेता

08 दिसंबर 2020
राउंडटेबल का आयोजन एमनेस्टी इंटरनेशनल और ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के संगठन हिंदूइज्म प्रोजेक्ट, हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स और इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल ने संयुक्त रूप से किया था.
राउंडटेबल का आयोजन एमनेस्टी इंटरनेशनल और ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के संगठन हिंदूइज्म प्रोजेक्ट, हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स और इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल ने संयुक्त रूप से किया था.

1 दिसंबर को भारत के विदेश मंत्रालय ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें ट्रूडो ने भारत में जारी किसान आंदोलन को चिंताजनक स्थिति बताते हुए किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार का समर्थन किया था. मंत्रालय ने अपनी आपत्ति में कहा था, “ऐसी टिप्पणियां अनावश्यक हैं, खासकर तब जब यह एक लोकतांत्रिक देश के आंतरिक मामलों से संबंधित हैं.” उसी दिन ऑस्ट्रेलिया की एक सीनेटर जेनेट राइस ने वहां की संसद को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक फासीवादी संगठन बताया.

ऐसा कहने से पांच दिन पहले 29 नवंबर को भारत के संविधान दिवस के अवसर पर राइस ने एक राउंडटेबुल चर्चा में भाग लिया था जिसका विषय था : “क्या भारत फासीवादी राज्य बन रहा है?”

राउंडटेबल का आयोजन एमनेस्टी इंटरनेशनल और ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के संगठन हिंदूइज्म प्रोजेक्ट, हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स और इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल ने संयुक्त रूप से किया था.

ऑस्ट्रेलियाई ग्रीन पार्टी के न्यू साउथ वेल्स संसद के सदस्य डेविड शूब्रिज ने इस चर्चा को मॉडरेट किया था. (ऑस्ट्रेलिया में आठ स्तरीय संसद होती है.) शूब्रिज ने सत्र की शुरुआत यह पूछते हुए कि “क्या वे मूल्य जो एक उदार लोकतांत्रिक परंपरा वाले लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित हैं, भारत में उनकी मान्यता है?” फिर उन्होंने कहा, “भारत के मित्र होने के नाते ये ऐसे सवाल हैं जो मुझे लगता है कि पूछे जाने चाहिए.”

इस राउंडटेबुल में दो पैनल चर्चाएं हुईं जिनमें से एक का शीर्षक था : “अकादमी और नागरिक समाज का दृष्टिकोण”. इसमें शोधकर्ताओं और कार्यकर्ताओं ने अपनी बातें रखीं. दूसरे सत्र का शीर्षक था, “अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका” जिसमें ब्रिटेन और अमेरिका के नेताओं सहित अन्य लोगों ने अपनी बात रखी. इन चर्चाओं में पैनल के सदस्यों ने संघ परिवार और उससे संबद्ध संगठनों और भारतीय जनता पार्टी की सरकार की गतिविधियों पर चर्चा की और साथ ही भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपत्ति के अधिकार के समक्ष मौजूदा चुनौतियों पर बात रखी.

अमृता सिंह कारवां की एडिटोरियल फेलो हैं.

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