बिल्डअप

बंगाल चुनाव : दुर्गा पूजा पंडालों पर बीजेपी और टीएमसी की चुनावी बिसात

ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर के परिसर में लगा पंडाल. ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर, कोलकाता के साल्ट लेक इलाके में स्थित केंद्रीय कला और संस्कृति मंत्रालय का क्षेत्रीय कार्यालय है. कारवां के लिए अमन गुप्ता

We’re glad this article found its way to you. If you’re not a subscriber, we’d love for you to consider subscribing—your support helps make this journalism possible. Either way, we hope you enjoy the read. Click to subscribe: subscribing

सितंबर 2025 को दुर्गा पूजा की रोशनी में सराबोर कोलकाता शहर के सियालदह रेलवे स्टेशन के बाहर लोगों का रेला लगा हुआ था. वहां आ रहे ज़्यादातर लोग संतोष मित्रा स्क्वायर का रास्ता पूछ रहे थे, जो स्टेशन से दो किलोमीटर की दूरी पर है. स्टेशन के बाहर के दुकानदार, बंगाल पुलिस के सिपाही, एनसीसी के कैडेट और कोलकाता पुलिस के वॉलंटियर पूछने वालों को रास्ता बताने और भीड़ प्रबंधन में लगे हुए थे. 

18वीं शताब्दी में नादिया जिले के गुप्तिपारा गांव में कुछ ब्राह्मण दोस्तों ने गांव के जमींदार से नाराज़ हो कर विद्रोह स्वरूप जिस पूजा की शुरुआत की थी, आज वह पूजा अरबों रुपए का कारोबार होने के साथ ही राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का प्रभावकारी मंच भी है. आज दुर्गा पूजा कोलकाता के साथ ही पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव है. रिपोर्टिंग के दौरान मैं देख सकता था कि कोलकाता में हर कहीं दिखाई दे रहे विज्ञापनों के बड़े-बड़े फ्लेक्स बंगाल में दुर्गा पूजा की अहमियत को बता रहे थे. 2025 की दुर्गा पूजा में कोलकाता में 3,000 के क़रीब पंडाल लगाए गए थे. वहीं राज्य भर में लगे पंडालों की संख्या लगभग 45,000 थी. इनको देख कर ऐसा लगता था कि पूजा पंडाल देखने के लिए मानो पूरा कोलकाता सड़क पर उतर आया है. हर पंडाल का अपना इतिहास होता है. मूर्तियों की सुंदरता, थीम, कलात्मकता और ड्रेस कोड होता है. इसके बावजूद शायद ही कोई एक दूसरे से मिलता-जुलता हो. इन पंडालों का इतिहास दशकों पुराना है, कई तो ऐसे हैं, जो 100 साल से भी अधिक पुराने हैं और उनका एक सिरा बीते इतिहास में जाकर खुलता है. 

रेड रोड पर कार्निवाल के साथ सम्पन्न हुए इस उत्सव के दौरान लेबुतल्ला मोहल्ले के संतोष मित्रा स्क्वायर का आकर्षण अधिक था क्योंकि वहां बने पंडाल की थीम ‘ऑपरेशन सिंदूर’ थी. यह अप्रैल 2025 में पहलगांव में हुए आतंकी हमले के बाद, मई में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारतीय सेना के अभियान का नाम था. पंडाल में आर्टिफीशिल इंटेलीजेंस और वर्चुअल रियलिटी के इस्तेमाल से सैन्य कार्रवाई से संबंधित घटनाएं प्रदर्शित की जा रही थीं. 

पंडाल की तरफ़ जाती हुई भीड़ में कोई ‘जय श्रीराम’ चिल्ला रहा था, तो कोई ‘भारत माता की जय’. पंडाल के क़रीब नारों का स्वर कर्णभेधी था. साफ़ दिख रहा था कि नारे लगा रहे ज़्यादातर लोग कोलकाता के बाहर से थे. भीड़ में से ही कुछ लोगों ने मुझे बताया कि उन्हें वहां आने के लिए मेहनताना भी मिला है. इन तेज़ नारों की गूंज इन्हें लगाने वालों की पहचान स्पष्ट कर रही थी.

हालांकि, शहर के अन्य पंडाल भी कम अनूठे नहीं थे. उन्होंने भी अपनी तरह से थीमें बनाई थीं. काशी बोस लेन पर लगे पंडाल में मशहूर लेखिका ‘लीला मजुमदार’ की बच्चों पर लिखी किताबों को इस साल की थीम बनाया गया था. यह बच्चों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र था. चलता बागान सार्वोजनिन सभा पंडाल की थीम में कोलकाता के मूल (ज़मींदारों/रईसों के घर) को स्थान दिया गया था. इसके अलावा राजाबाज़ार, श्याम बाज़ार, बाघबाज़ार, जैसे कुछ और दूसरे प्रसिद्ध पंडाल थे, जो अपनी थीम के लिए ही विख्यात हैं. एमडी अली पार्क, ताराचंद्र दत्त लेन सहित दूसरे पंडालों को साधारण, लेकिन दुर्गा की मूर्ति के साथ साउंड और लाइटिंग का प्रयोग कर सुंदर और कलात्मक बनाने का प्रयास किया गया था.

थीम से इतर संतोष मित्रा स्क्वायर पर लगे पंडाल के चर्चा में रहने की एक और वजह यह थी कि बीजेपी नेता और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने समय से पहले, नवरात्री के चौथे दिन, इसका उद्घाटन कर दिया था. बंगाल में दुर्गा पूजा पंडालों की एक आम परंपरा है कि उनको आम लोगों के दर्शन के लिए षष्ठी (बोधन) के दिन खोला जाता है.  

शाह दुर्गा पूजा के समय दूसरी बार बंगाल पहुंचे थे, इससे पहले 2023 में भी वह बंगाल आए थे और इसी संतोष मित्रा स्क्वायर पर लगे राम मंदिर की थीम पर बने पंडाल का उद्घाटन किया था. बीते कुछ सालों से यह पंडाल बीजेपी की राजनीतिक को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है. 

बंगाल में दुर्गा पूजा समितियां समय और परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को बदलती रहती हैं, लेकिन जो बात स्थायी है वह है इनका राजनीति के साथ संबंध. संतोष मित्रा स्क्वायर पंडाल के मुख्य आयोजकों में लेबुतल्ला इलाके के पुराने कांग्रेसी नेता प्रदीप घोष का नाम प्रमुख रूप से शामिल है. बाहुबली माने जाने वाले घोष, 2014 में कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. आयोजन समिति के सचिव उनके बेटे सजल घोष हैं. सजल ने 2021 में बीजेपी के टिकट पर कोलकाता नगर निगम में पार्षद और 2024 में एक विधानसभा का उपचुनाव भी लड़ा. जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 12 अगस्त, 2025 को 75 वर्ष की आयु में प्रदीप का निधन हो गया.

टीएमसी और कांग्रेस के कई पुराने नेताओं को अपने पाले में लेकर बीजेपी ने इन क्लबों के ज़रिए अपनी राजनीति को आगे बढ़ाया है. टीएमसी का लोकल क्लबों के समूहों पर कब्जा है, ऐसे में बीजेपी छोटे स्तर के प्रभावशाली नेताओं को अपने पाले में लाकर पूजा पंडालों या फिर स्पोर्टिंग क्लब के माध्यम से आगे बढ़ रही है. 

इसके लिए बीजेपी ने एक सांस्कृतिक मंच, ‘पश्चिम बंग संस्कृति मंच’, भी बनाया है. इसके जरिए अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए ऐसे क्लब संगठनों में पैंठ बनाई जाती है. बीजेपी के जिन प्रमुख नेताओं को आगे बढ़ाया उसमें बीजेपी के राज्य अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के संयोजक रुद्रानील घोष सहित अन्य नेता शामिल हैं. ये सभी अपने क्षेत्र और आस-पास के क्षेत्रों में अपने प्रभाव के बल पर इन क्लबों को लक्ष्य कर रहे हैं.

संतोष मित्रा स्क्वायर के अलावा अमित शाह ने ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर के परिसर में लगे पंडाल का भी उद्घाटन किया. ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर, कोलकाता के साल्ट लेक इलाके में स्थित केंद्रीय कला और संस्कृति मंत्रालय का क्षेत्रीय कार्यालय है. इस पंडाल को मंत्रालय या फिर किसी विभाग द्वारा नहीं बल्कि ‘पश्चिम बंग संस्कृति मंच’ द्वारा लगाया गया था. 

ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर के पंडाल की तरफ़ जाने वाली सड़कों के दोनों तरफ़ ‘ओउम्’ लिखे भगवा झंडे लगे थे. यह बीजेपी के मूल संगठन आरएसएस का परंपरागत और आजमाया हुआ तरीका है, जिसे वह उत्तर-मध्य भारत के राज्यों में नए त्योहारों को शुरू करने या फिर परंपरागत त्योहारों पर कब्जा जमाने के लिए प्रयोग करता आ रहा है. इस पंडाल पर प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह के बड़े-बड़े फ्लेक्स लगे थे. कल्चरल सेंटर को आयोजन की अनुमति किसने दी और उसमें हुआ खर्च किसने उठाया? इन सवालों को पूछते मेरे ईमेल का मुझे अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.

केंद्र सरकार के कला और संस्कृति मंत्रालय के इस परिसर में दुर्गा पूजा पंडाल की शुरुआत बीजेपी से जुड़े संगठनों द्वारा पिछले विधानसभा चुनावों से पहले साल 2020 में की गई थी. अगले साल 2021 के विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद से उत्साह कम हो गया और असर पंडाल पर भी पड़ा. जैस-तैसे करके अगले दो साल भी यहां पंडाल तो लगाया जाता रहा, लेकिन उसको बहुत महत्व नहीं दिया गया. 

इस साल होने वाले राज्य के विधानसभा चुनावों से पहले, दो साल के अंतराल के बाद इस पंडाल को दोबारा से शुरु किया गया है. पंडाल उद्घाटन के मौक़े पर अमित शाह ने कहा कि, ‘आगामी विधानसभा चुनाव में मां दुर्गा के आशीर्वाद से बंगाल में ‘सोनार बांग्ला' का निर्माण करने वाली सरकार बनेगी. उन्होंने कहा कि बंगाल फिर से सुरक्षित, समृद्ध, शांत, सुजलाम, सुफलाम बनेगा और कवि-गुरु रवींद्र नाथ टैगोर जी की कल्पना के बंगाल का निर्माण होगा’. 

पिछले सालों में वाम सरकार के बाद बनी टीएमसी सरकार और उसे हटा कर राज्य जीतने की बीजेपी की मंशा ने पंडाल राजनीति को उत्कर्ष पर पंहुचा दिया है. टीएमसी सरकार ने पूजा पंडालों को सरकारी सहायता देने की शुरुआत साल 2018 में की थी, उस समय 10,000 रुपए की सहायता राज्य के हर पूजा पंडाल को दी गई थी. महज आठ सालों में यह राशि 1,10,000 रुपए तक पहुंच गई. सरकार के इस फ़ैसले से राज्य सरकार के खज़ाने पर क़रीब 495 करोड़ रुपए का बोझ पड़ा. ऐसा तब है जब राज्य सरकार के 12 लाख कर्मचारियों (पेंशनर्स सहित) का लगभग 10 हजार करोड़ रुपए का महंगाई भत्ता (डीए) बकाया है. कर्मचारियों ने इस मसले पर कोलकाता हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था, जिसकी सुनवाई के बाद इस साल मई में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर यानी अगस्त के मध्य तक इस बकाए के भुगतान का आदेश दिया था. हाईकोर्ट द्वारा दी गई यह समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी कर्माचारियों को उनका बकाया नहीं मिला है. राज्य में बहुत सारी सरकारी योजनाएं ऐसी हैं जो पैसे की कमी के चलते अटकी हुई हैं. 

मुख्यमंत्री बनर्जी केवल सरकारी सहायता देने तक ही सीमित नहीं है, उनकी कोशिश होती है कि वह अधिक से अधिक पंडालों तक पहुंच कर उनका उद्घाटन करें. इस मौक़े पर उन्होंने कई पंडालों के लिए थीम गीत भी लिखे और उन्हें कंपोज भी किया, जिसकी जानकारी उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर शेयर भी की.  

टीएमसी नेता और ख़ुद बनर्जी इसे लोकल अर्थव्यवस्था को बढ़ाने वाला फैसला बताती हैं. साल 2019 के ब्रिटिश काउंसिल की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में बंगाल में दुर्गा पूजा के समय 32,377 करोड़ रुपए का व्यापार हुआ था. उस समय यह राज्य की कुल जीडीपी का लगभग 2.5 प्रतिशत था. मनी कंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार 2025 में दुर्गा पूजा के दौरान इस आंकड़े के 65-70 हज़ार करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है जो पिछले साल से 8-10 प्रतिशत अधिक है. द हिंदू अख़बार के पत्रकार शिव सहाय कहते हैं कि दुर्गा पूजा बंगाल में एक ऐसी इंडस्ट्री है जो सबसे अधिक राजस्व पैदा करती है. 

आयोजन समितियों के लोग सरकार के इस फैसले से दो धड़ों में बंटे हुए हैं. इसके पीछे का कारण यह है कि कोलकाता के बाहर के छोटे शहरों-कस्बों में पंडाल आयोजकों को शायद ही कोई स्पॉन्सर मिलता है, ऐसे में यह सरकारी सहायता उनके बहुत काम आती है. जबकि कोलकाता के पंडालों को इस मदद से शायद ही कोई फर्क पड़ता हो, क्योंकि वे पूरी तरह से चंदे और विज्ञापनों पर निर्भर हैं. 

कुछ पूजा समितियां और आम लोग सरकार के इस फ़ैसले के विरोध में भी थे. विरोध करने वालों में वे लोग प्रमुख हैं, जो मानते हैं कि सरकारी पैसे का प्रयोग पंडालों को सहायता देने के बजाए विकास के काम में करना चाहिए. वैसे भी यह सार्वजनिक उत्सव है, पैसा देने की बजाए पंडालों में बेहतर सुविधाएं प्रदान करे जो सरकार का काम है. इसके अलावा विरोध करने वालों में बीजेपी समर्थक लोग हैं जिनका मानना है कि इन समितियों को पैसा देकर ममता सरकार अपने लिए वोट खरीदने का इंतजाम कर रही हैं.

धार्मिक पंडालों को आर्थिक सहायता देने के मसले पर कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार प्रसून आचार्य बताते हैं, ‘ममता के पास और विकल्प क्या है? पार्टी के कार्यकर्ता सब वसूली में लगे हुए हैं, राज्य में गरीबी और पलायन की समस्या लगातार बढ़ती ही जा रही है, बीजेपी जैसी पार्टी मुस्लिमपरस्त होने का आरोप लगा रही है. ऐसे में वह क्या करेंगी’? 

आचार्य कहते हैं, ‘वैसे भी यह उनका ऑरिजनल आइडिया नहीं है, इसे उन्होंने बांग्लादेश की हसीना सरकार से लिया है. शेख हसीना सरकार बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं के दुर्गा पूजा के मौक़े पर इस तरह से सहायता देती रही थी.’ जो काम शेख हसीना बांग्लादेश में करती थीं, वही पश्चिम बंगाल में बनर्जी कर रही हैं. 

कोलकाता की ही एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी इसे ऑनरशिप और लॉयल्टी से जुड़ा मामला बताया. उन्होंने कहा, ‘बंगाल में दुर्गा पूजा पंडालों से राजनीतिक दलों और नेताओं का जुड़ाव हमेशा रहा है, लेकिन दिखावे के लिए ही सही, उनकी भूमिका कम होती थी, उनका हस्तक्षेप भी कम होता था. उसके बाद भी लोगों को पता होता था कि किस पंडाल में किस नेता की क्या भूमिका है. आयोजकों को इसका फायदा यह होता था कि पंडाल के लिए ज़रूरी फंड और चंदे की व्यवस्था करने में आसानी होती थी.’

मानिकतल्ला चलता बागान लोहा पट्टी पंडाल की आयोजक समिति के सदस्य सुरेश गुप्ता कहते हैं, ‘ममता बनर्जी की कोशिश है कि इन पंडालों को अपने साथ लेकर आने वाले चुनाव में एकमुश्त वोटों का जुगाड़ कर सकें.’ गुप्ता ने कहा कि पूजा पंडालों में नेताओं का जुड़ना नया नहीं है, हमेशा से होता आ रहा है, लेकिन वोट पाने के लिए इस तरह सरकारी पैसे का दुरुपयोग किसी ने नहीं किया. गुप्ता ने बताया, ‘पैसा लेने वाले पंडालों के लिए बनर्जी का पोस्टर-बैनर लगाना ज़रूरी है, पैसा लेना भी ज़रूरी है. अगर कोई क्लब पैसा लेने से मना करता है, तो सरकार उसे ब्लैक लिस्ट कर देती है. यह गुंडई नहीं है तो क्या है?’   

ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर के परिसर में लगा पंडाल. कारवां के लिए अमन गुप्ता

कुछ साल पहले शुरू हुई सरकारी सहायता से इतर राज्य के पूजा पंडालों में होने वाले खर्चों को पूरा करने का सबसे बड़ा साधन है विज्ञापन और स्पॉन्सरशिप. दुर्गा पूजा के समय पूरा कोलकाता बड़ी-बड़ी कंपनियों के फ्लेक्स से अटा पड़ा होता है, इसमें हर छोटी-बड़ी कंपनी के हजारों होर्डिंग एक जगह पर लगे होते हैं. इसमें 100 साल पुरानी कंपनी बोरोलीन से लेकर शिखर और कमला पसंद पान मसाला तक फ्लेक्स लगे होते हैं. इन्हें देख कर ही अंदाजा लग जाता है कि किस पंडाल को किसने प्रायोजित किया है. किस पंडाल को कौन सी कंपनी प्रायोजित करेगी, उसका बजट कितना होगा, यह पंडाल में आने वाले दर्शकों की संख्या पर निर्भर करता है. ऐसे में हर पंडाल की कोशिश है कि वह सबसे अलग और सबसे बेहतर पंडाल बनाए. इसमें थीम, लाइटिंग, साउंड सिस्टम, थीम संगीत, देवी की मूर्ति और उसका शृंगार, इन थीम पूजाओं के सबसे ज़रूरी भाग हैं. 1984 में एशियन पेंट्स कंपनी ने पंडालों के लिए ‘शरद सम्मान’ शुरू किया था. बाद में अन्य कंपनियां भी ऐसे सम्मान देने लगीं. आज ऐसे एक सौ से अधिक सम्मान दिए जाते हैं.

पंडालों में लगे विज्ञापनों के फ्लेक्स देख कर लगता है कि इनका धर्म और आस्था से बहुत लेना-देना नहीं है. हर आयोजक समिति पुरस्कार पाने की होड़ में शामिल है. कौन पंडाल सबसे बेहतर है, सबसे अच्छे पंडाल का ईनाम किसको मिलेगा, इसका निर्णय रेड रोड पर होने वाली परेड़ में किया जाता है. रेड रोड पर होने वाली इस परेड को ‘कार्निवाल’ कहा जाता है, जिसका आयोजन दशहरे के दो या तीन दिन बाद किया जाता है, इसमें राज्य की मुख्यमंत्री शामिल होती हैं. कारपोरेट के चंदे से चलने वाले इन पूजा पंडालों पर दबाव होता है कि वे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को अपने पंडाल में आकर्षित करें. जिसके चलते पंडालों में एक नया ट्रेंड यह भी बन रहा है कि परंपरा से हट कर कुछ पंडाल अब पहले ही खोले जाने लगे हैं. 

कोलकाता स्थित सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंस कॉलेज में इतिहास की प्रोफ़ेसर ताप्ती गुहा ठाकुरता ने अपनी किताब, ‘इन द नेम ऑफ़ गोडेस: द दुर्गा पूजास ऑफ़ कंटेम्पररी कोलकाता’, में दुर्गा पूजा को सिर्फ़ एक धार्मिक त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे सार्वजनिक सांस्कृतिक प्रदर्शन के रूप में देखा है जिसमें राजनीति, पहचान और कला एक साथ मिले हुए हैं, जो बंगाली समाज में बदलते हुए शक्ति संबंधों को भी प्रतिबिंबित करता है. उनके अनुसार, शानदार पंडालों, थीम-आधारित कला और उनके बीच की प्रतिस्पर्धा के माध्यम से, यह त्योहार शहरी संस्कृति के राजनीतिकरण को दर्शाता है.

नादिया जिले की निवासी शुभव्रता विस्वास ने बताया, ‘यह हमारे लिए बहुत खुशी का मौक़ा होता है. इसको लेकर इतना उत्साह होता है कि हर कोई सबसे पहले और सब कुछ घूम और देख लेना चाहता है. लोग कोशिश करते हैं कि अधिक से अधिक पंडाल देख सकें. लोगों की इस उत्सुकता को पूरा करने के लिए कुछ पंडाल जल्दी खुलने लगे हैं. यह बहुत नया ट्रेंड है जो आज से पांच छह साल पहले तक देखने को नहीं मिलता था’. ज़्यादातर पंडालों में वास्तविक शुरुआत षष्ठी (छठा दिन) के दिन ही होती है’. जो पंडाल पहले खुल रहे हैं वह केवल लोगों को आकर्षित करने के लिए लाइट और साउंड या फिर थीम ही दिखाते हैं. इसके पीछे सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और विज्ञापन एजेंसियों और पंडालों की राजनीति को भी काफी हद तक ज़िम्मेदार मानती हैं.

मानिकतल्ला के चलता बागान लोहापट्टी दुर्गा पूजा समिति के सदस्य सुरेश गुप्ता ने दुर्गा पूजा को आस्था और धर्म से अधिक कारोबार और राजनीति का केंद्र बताया जिसका धर्म, आस्था से कोई लेना देना नहीं है. उन्होंने कहा, ‘पहले सभी पूजा पंडाल विज्ञापन के साथ आम लोगों से भी चंदा लेती थीं, इसके पीछे सोच होती थी लोगों का जुड़ाव रहे. ज्यादातर आयोजक समितियों ने बीते कुछ सालों से आम लोगों से चंदा लेना ही बंद कर दिया. जिस समिति का मैं सदस्य हूं उसने बीते तीन-चार सालों से मुझसे ही चंदा नहीं लिया. समिति के लोग जब आख़िरी बार चंदा मांगने आए थे, तब मैंने 350 रुपए चंदा दिए था.’ 

बंगाल में दुर्गा पूजा उत्सव दो तरह से मनाए जाते हैं. एक सार्वजनिक और दूसरा बाड़ी पूजा. कुलीन माने जाने वाले परिवार द्वारा समर्थित पूजा को बाड़ी पूजा कहा जाता है, जिसमें होने वाला सारा खर्च संबंधित परिवार उठाता है. बाड़ी पूजा के आयोजक बड़े व्यापारी, ज़मींदार जैसे लोग होते हैं जिन्हें भद्रलोक के तौर जाना जाता है. वहीं सार्वजनिक उत्सवों में सबकी भागीदारी होती है, जो चंदे और विज्ञापन की मदद से आयोजित किये जाते हैं.

‘द हिंदू’ अख़बार के पत्रकार शिव सहाय सिंह ने मुझसे कहा, ‘ममता बनर्जी द्वारा पूजा पंडालों को सहायता दिए जाने के पीछे का कारण उनका कोई वैचारिक आधार न होना है. टीएमसी में निर्णय केवल एक व्यक्ति द्वारा लिए जाते हैं और वह हैं ख़ुद ममता बनर्जी. इसलिए उनको जो ठीक लगता है, वह करती हैं. इसके चलते उनका राजनीतिक स्पेक्ट्रम बड़ा हो जाता है. कल को अगर उन्हें लगेगा कि किसी मुस्लिम त्योहार को सहायता देकर अपनी पहुंच बढ़ा सकती हैं, तो वह ऐसा ही करेंगी.’

सरकार और सरकारी संस्थाओं द्वारा सीधे तौर पर धार्मिक आयोजनों में शामिल होने या न होने को लेकर काफ़ी विवाद है. पहला ऐसा विवाद स्वतंत्रता के बाद शुरुआती सालों में ही सामने आ गया था जब प्रधानमंत्री नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के बीच गुजरात के सोमनाथ मंदिर के पूजन में शामिल होने को लेकर तक़रार हुई थी. नेहरू चाहते थे कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के चलते उच्च पदों पर बैठे लोगों को इस तरह के धार्मिक आयोजन से दूरी बनानी चाहिए. हालांकि अब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति खुलेआम मंदिरों के उद्घाटन में पहुंच रहे हैं और दावा रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता जैसी बातें पुरानी हो चुकी हैं.

कारवां के लिए अमन गुप्ता

पूजा पंडालों में राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप पर पत्रकार शिखा मुखर्जी ने मुझसे कहा कि बंगाल में यह नया नहीं है, इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के समय यह पंडाल अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ राजनीतिक चेतना के प्रसार का प्रमुख केंद्र थे. विपिन चंद्र पॉल, अरविंदो घोष, टैगोर, सुभाष, सीआरदास जैसे लोग इन पंडालों को अपनी राजनीति और राजनीतिक चेतना के प्रसार के लिए प्रयोग करते थे. स्वतंत्रता के बाद भी कांग्रेस नेताओं ने इसमें अपना हस्तक्षेप बनाए रखा. 

कम्युनिस्ट पार्टी से आठ बार लोकसभा सांसद रहे हन्नान मोल्लाह ने मुझसे कहा कि राज्य सरकार लोगों के बकाया बेतन भत्ते नहीं दे पा रही है, मनरेगा में लोगों को काम देने के लिए पैसा नहीं है. ऐसे में पंडालों को करोड़ों रुपए देना साफ़ तौर पर करप्शन है. जिन आयोजकों को पैसा दिया गया है, उनका प्रयोग चुनाव में वोट लेने के लिए किया जाएगा. यह संविधान, कानून और नैतिकता का विरोधी है. मोल्लाह इसे ‘क्रिमिनल द्वारा, क्रिमिनल पर, क्रिमिनल का शासन’ बताते हैं. 

संविधान के आर्टिकल 26 के तहत राज्य का कोई धर्म नहीं है, वह समान रूप से सभी धर्मों को बराबर महत्व देगा. ऐसे में सरकारी महकमों का इस तरह के आयोजनों में शामिल होना सीधे तौर पर संविधान की अवहेलना है और बंगाल में पक्ष-विपक्ष अपने-अपने तरीके से इसकी धज्जियां उड़ा रहे हैं और कोई उन्हें रोकने वाला नहीं है. 

मुखर्जी ने बताया कि बंगाल में दुर्गा पूजा पंडाल हमेशा से राजनीति का केंद्र रहे हैं, आज़ादी के पहले सुभाष बोस जैसे बड़े नेता तक इनको संरक्षण देते रहे हैं. आज़ादी के बाद भी ये कांग्रेस की राजनीति का केंद्र रहे हैं. राज्य की सत्ता से बाहर होने के बाद भी कांग्रेस ने इन पर अपना नियंत्रण बनाए रखा. इसका कारण राज्य की सत्ता में आई कम्युनिस्ट पार्टी ने पंडालों को राजनीति के तौर पर इस्तेमाल करने में बहुत दिलचस्पी नहीं ली. कांग्रेस के कमज़ोर होने के बाद इसका फायदा सीधे तौर पर टीएमसी को मिला. 2011 में सत्ता में आने से पहले ही टीएमसी ने इन पंडालों को जनता के बीच पैर जमाने के साधन के तौर पर इस्तेमाल किया. अब उसी तरीके को अपना कर बीजेपी अपनी राजनीति जमाने की कोशिश कर रही है. संतोष मित्रा स्क्वायर बीजेपी के लिए वही मौक़ा दे रहा है. 

मुखर्जी ने बताया कि बीजेपी बंगाल में सरकार बनाने के लिए हर कोशिश कर रही है, इसके लिए वह साम, दाम, दंड, भेद की हर नीति अपना रही है, और बंगाल के बाहर उसके तौर तरीकों को देखते हुए यह बिल्कुल भी नया नहीं है. वह लोगों को पैसा दे रही है, नए त्योहारों को समाज का हिस्सा बना रही है. बीते कुछ सालों में गणेश पूजा का चलन आया है जबकि आम बंगालियों में गणेश का कोई बहुत महत्व नहीं है. फिर भी बंगालियों के लिए दुर्गा पूजा हमेशा ही एक गर्व की बात रही है. इस गर्व को सतुंष्ट किए बिना राज्य की सत्ता में आना काफ़ी मुश्किल होगा. मुखर्जी के कहा, ‘केवल ईश्वरचंद्र विद्या सागर, रविंद्रनाथ टैगौर जैसे बड़े प्रतीकों का नाम लेकर या उन पर फूल मालाएं चढ़ा कर बंगाली गर्व को नहीं जीता जा सकता है.’ 

Thanks for reading till the end. If you valued this piece, and you're already a subscriber, consider contributing to keep us afloat—so more readers can access work like this. Click to make a contribution: Contribute