असम एनआरसी : अपने ही देश में शरणार्थी हो जाने का दर्द

21 दिसंबर 2018
अशरफ अली उन भारतीयों में हैं जिन्हें असम के राष्ट्रीय नागरिक पंजिका की नवीनीकरण प्रक्रिया में विदेशी नागरिक करार दे दिया गया. जिस रात उन्हें गिरफ्तार किया गया उसे याद करते हुए उनकी बीवी तारा खातून कहती हैं, “हम लोगों को ऐसे घेरा जैसे हम लोग आतंकवादी हों, जैसे हम बाहर से आए हों”.
शाहिद तांत्रे/कारवां
अशरफ अली उन भारतीयों में हैं जिन्हें असम के राष्ट्रीय नागरिक पंजिका की नवीनीकरण प्रक्रिया में विदेशी नागरिक करार दे दिया गया. जिस रात उन्हें गिरफ्तार किया गया उसे याद करते हुए उनकी बीवी तारा खातून कहती हैं, “हम लोगों को ऐसे घेरा जैसे हम लोग आतंकवादी हों, जैसे हम बाहर से आए हों”.
शाहिद तांत्रे/कारवां

12 अगस्त 2015 को रात करीब एक बजे , पश्चिमी असम के उदालगुरी जिले के सोनाजुली गांव के 38 वर्षीय किस्मत अली और उनका परिवार गहरी नींद में था जब उनके दरवाजे पर जोर की दस्तक सुनाई दी. “किस्मत, किस्मत” कोई उनका नाम पुकार रहा था. किस्मत ने दरवाजा खोला तो देखा कि असम सीमा पुलिस ने उनके मकान को चारों ओर से घेर लिया है. वे लोग किस्मत को जबरदस्ती अपने साथ पुलिस स्टेशन ले गए. उन लोगों ने गिरफ्तारी का कारण किस्मत को नहीं बताया. जाते वक्त पुलिस वालों ने उनके गांव के 40 वर्षीय अशरफ अली को भी हिरासत में ले लिया. उदालगुरी पुलिस स्टेशन में पुलिस अधिकारियों ने एक बयान में किस्मत से जबरन दस्तखत कराया. बयान में लिखा था: “मैं बंगलादेशी हूं”.

किस्मत बताते हैं कि उन्होंने पुलिस वालों को बताया, “मैं हिंदुस्तानी हूं.” फिर उन्होंने पूछा, “मुझे बंगलादेशी क्यों बना रहे हो”. किस्मत बताते हैं कि पुलिस ने उन्हें और अशरफ को धमकी देकर बयान में दस्तखत ले लिए और फिर 200 किलोमीटर दूर गोवालपारा जिले में स्थित डिटेंशन सेंटर (हिरासत केन्द्र) ले गई. असम में ऐसे छह डिटेंशन सेंटर हैं. इन डिटेंशन केन्द्रों में डी-वोटरों को रखा जाता है. डी-वोटर का मतलब है ‘डाउटफुल वोटर यानी संदिग्ध मतदाता’ है. ऐसे लोगों पर असम में गैरकानूनी रूप से रहने का शक है. बाद में किस्मत और अशरफ को विदेशी नागरिकों के लिए अर्ध न्यायाधिकरण ने विदेशी करार दे दिया. एमनेस्टी इंटरनेशनल की हाल की रिपोर्ट में बताया गया है कि 25 सितंबर 2018 तक असम के डिटेंशन केन्द्रों में कैद 1037 लोगों को विदेशी नागरिक करार दिया गया है.

23 नवंबर को एमनेस्टी ने बिटवीन हेट एंड फियर : सर्वाइविंग माईग्रेशन डिटेंशन इन असम नामक एक रिपोर्ट जारी की. यह रिपोर्ट उस वक्त आई जब असम में रह रहे भारतीय नागरिकों की सूची, राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (एनआरसी), को नवीनीकरण करने की सर्वोच्च अदालत द्वारा तय अंतिम समय सीमा निकट थी. 30 जुलाई को जारी पंजिका के ताजा प्रारूप से राज्य के लगभग 40 लाख लोग गायब हैं. इस माह के आरंभ में सर्वोच्च अदालत ने पंजिका में नाम डलवाने के दावों और शिकायतों की अंतिम तिथि को बढ़ाकर 31 दिसंबर 2018 कर दिया. पंजिका परियोजना के तहत जिन लोगों का नाम पंजिका से छूट जाएगा उन्हें हिरासत में ले लिया जाएगा.

किस्मत और अशरफ को सर्वोच्च अदालत के दखल और केन्द्रीय अंवेषण ब्यूरो की जांच के बाद भारतीय नागरिक घोषित कर दिया गया. इन के मामलों से पता चलता है कि कैसे एनआरसी संदिग्ध विदेशियों को, खासकर असम के बंगाली मूल के मुसलमान और उसके बाद बंगाली हिंदुओं को प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में अलग-थलग करता है. इनमें शामिल हैं जटिल दस्तावेजों की आवश्यकता, जो पंजिका में शामिल होने के रास्ते में कठनाइयां पैदा करती हैं, विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष होने वाली भेदभावपूर्ण कार्यवाहियां, जो अक्सर एकतरफा और बिना कानूनी मदद के होती हैं, और डिटेंशन केन्द्रों में रहने की अमानवीय परिस्थितियां. डिटेंशन में रहने का वक्त भी अनिश्चितता के खौफ से भरा होता है. समझ नहीं आता कि यह सब कब खत्म होगा. किस्मत से बात करते हुए लगता है कि हिरासत का भयावह मंजर अभी भी उसकी स्मृतियों की खिड़कियों से झांक रहा है. बातचीत में किस्मत बार बार दोहराते हैं, “दो साल, दो महीना, 17 दिन.”

एमनेस्टी की रिपोर्ट का लोकार्पण दिल्ली के प्रेस क्लब में हुआ. लोकार्पण के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दो सत्रों को एमनेस्टी इंडिया की शोधकर्ता अस्मिता बासु ने मॉडरेट किया. पहली पैनल चर्चा में किस्मत, अशरफ और उनकी बीवी तारा खातून ने अपनी पीड़ा को याद किया. अशरफ की गिरफ्तारी वाली रात को याद करते हुए तारा ने बताय, “हम लोगों को ऐसे घेरा जैसे हम लोग आतंकवादी हों, जैसे हम लोग बाहर से आए हों.”

अमृता सिंह कारवां की एडिटोरियल फेलो हैं.

कमेंट