मराठा आरक्षण को मिल सकती है कानूनी चुनौती

09 दिसंबर 2018

30 नवंबर को महाराष्ट्र के राज्यपाल ने महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग कानून (2018) को मंजूरी दे दी. यह कानून संस्थाओं और सार्वजनिक सेवाओं में मराठा समुदाय के लिए 16 प्रतिशत कोटा आरक्षित करता है. महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की जिस रिपोर्ट को इस आरक्षण का आधार बनाया गया है वह कानून बनने से मात्र 15 दिन पहले जमा की गई थी. सरकार ने इस रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर नहीं रखा.

मराठा समुदाय बहुत पहले से आरक्षण की मांग कर रहा है. इसकी शुरुआत 1990 में हुई थी जिस समय द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे मंडल आयोग के नाम से भी जाना जाता है, ने अपनी रिपोर्ट जारी की थी. इस आयोग ने भारत के अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण प्रस्तावित किया था लेकिन ओबीसी की अपनी सूची में मंडल आयोग ने मराठा के स्थान नहीं दिया था. अगस्त 1990 में केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट को मान लिया. यह ऐसा निर्णय था जिसे हिंसा और व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. इंदिरा साहनी बनाम भारतीय संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की खंडपीठ ने आरक्षण के उन आधारों को स्पष्ट किया जो स्वीकार्य हैं. उस ऐतिहासिक फैसले में खंडपीठ ने उपलब्ध सीटों और पदों में आरक्षण को 50 प्रतिशत सीमित कर दिया था.

हाल के आरक्षण कानून से पहले ही महाराष्ट्र में आरक्षण तय 50 प्रतिशत सीमा से 2 प्रतिशत ज्यादा है. कई जांचों से पता चलता है कि मराठा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग नहीं है.वर्ष 2000में पिछड़ा वर्ग के राष्ट्रीय आयोग ने और वर्ष 2008 में महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी यही माना था. महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन इंदिरा साहनी मामले में अदालत के फैसले के बाद केन्द्रीय और राज्य की ओबीसी सूचीसे छूटे लोगों की शिकायत की सुनवाई के लिए किया गया था.2014 से लेकर वर्तमान तक महाराष्ट्र की सभी सरकारों ने मराठों की इस मांग को संबोधित करने का प्रयास किया है. सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोगों की अनदेखी कर “विशेष समिति” की सिफारिशों के आधार पर कानून पारित किया और बॉम्बे हाई कोर्ट में समुदाय के आरक्षण के दावे के समर्थन में 2500 पन्नों का हलफनामा दायर किया. इस अतिरिक्त 16 प्रतिशत आरक्षण के बाद महाराष्ट्र में आरक्षण का कुल प्रतिशत 68 हो गया है. लेकिन इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च अदालत के फैसले के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ऐसा नहीं लगता कि हाल का आरक्षण संवैधानिक चुनौतियों के सामने टिक पाएगा.

महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग कानून (2005) के तहत राज्य आयोग की सिफारिशें आमतौर पर सरकार के लिए बाध्यकारी हैं. इसके बावजूद 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान की कांग्रेस सरकार ने आयोग की 2008 की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया और मराठा समुदाय की आरक्षण की मांगों का आकलन करने के लिए विशेष समिति का गठन किया. कांग्रेस सरकार ने मराठा समुदाय के नारायण राणे, जो उस वक्त सरकार में उद्योग मंत्री थे, की अध्यक्षता में यह समिति गठित की थी.

राणे समिति ने सिफारिश की कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के लिए निर्धारित कोटे को प्रभावित किए बिना मराठों को आरक्षण दिया जाना चाहिए. इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने 9 जुलाई 2014 को अध्यादेश जारी किया जिसमें समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर दिया गया. राज्य सरकार ने दूसरा अध्यादेश जारी किया और शैक्षणिक संस्थाओं और सार्वजनिक नौकरियों में मुसलमानों के लिए 5 प्रतिशत सीट आरक्षित कर दी. मुसलमानों के लिए आरक्षण 2013 की महमूद-उर-रहमान की अध्यक्षता वाले समूह की सिफारिशों पर आधारित था. महमूद-उर-रहमान भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे.

मालविका प्रसाद वकील और विधि अध्ययन एवं शोध राष्ट्रीय अकादमी में डॉक्टोरल फेलो हैं.

Keywords: Maratha Indra Sawhney Economic and Political Weekly Devendra Fadvanis Mandal Commission
कमेंट