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भारतीय जलक्षेत्र के एकदम क़रीब ईरानी युद्धपोत आइरिस डेना पर अमेरिकी पनडुब्बी के हमले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी कोई नई बात नहीं है. बल्कि यह उस पैटर्न के अनुरूप है जिसमें भारत अपने पड़ोसी जलक्षेत्र में हो रही रणनीतिक अवमानना पर मौन रहता है और ऐसा दिखावा करता है गोया उसकी तथाकथित संयम की नीति भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आर्थिक हितों के लिए सहायक साबित होगी.
भारतीय नौसेना के एक कार्यक्रम में शामिल होने के कुछ ही घंटों बाद श्रीलंकाई तट के समीप अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी युद्धपोत को डुबाया जाना दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा की गई इस तरह की पहली कार्रवाई है. यह घटनाक्रम एक ऐसे क्षेत्र में हुआ जो तकनीकी रूप से घोषित युद्धक्षेत्र नहीं है, किंतु भारत के प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत आता है. मोदी सरकार ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया कि यह 'रेड लाइन' का उल्लंघन है. इस चुप्पी ने क्षेत्रीय और बाह्य शक्तियों को यह संदेश दिया है कि भारत अपने निकटवर्ती जलक्षेत्र में तीसरी शक्तियों की सैन्य कार्रवाई को स्वीकार करने के लिए तैयार है.
इस हमले ने सीधे तौर पर भारत के उन बुनियादी सिद्धांतों को चुनौती दी है जिनसे वह कभी समझौता नहीं करता : व्यापार और ऊर्जा हेतु समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखना, अमेरिका-ईरान टकराव से दूरी बनाए रखना और अपने तटों के ठीक बाहर महाशक्तियों की सैन्य सक्रियता को सामान्य न बनने देना. तकनीकी रूप से, वॉशिंगटन इस तर्क की आड़ ले सकता है कि आइरिस डेना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में था, लेकिन राजनीतिक रूप से वास्तविकता स्पष्ट है. भारतीय नौसेना के बेड़े की समीक्षा में आमंत्रित एक जहाज, जो नई दिल्ली के 'गंभीर सरोकार' वाले क्षेत्र से गुज़रते हुए स्वदेश लौट रहा था, उसे बिना किसी पूर्व चेतावनी के समुद्र में नष्ट कर दिया गया और भारत मौन रहा.
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