“कोरोना से जान जाएगी लेकिन सीएए से नस्लें और संविधान तबाह होंगे,” लखनऊ की आंदोलनकारी औरतें

19 मार्च 2020
लखनऊ में 26 जनवरी 2020 को नागरिकता संशोधन कानून, 2019, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ प्रदर्शन कर रहीं मुस्लिम औरतें.
सुमित कुमार/अनादोलू एजेंसी/गैटी इमेजिस
लखनऊ में 26 जनवरी 2020 को नागरिकता संशोधन कानून, 2019, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ प्रदर्शन कर रहीं मुस्लिम औरतें.
सुमित कुमार/अनादोलू एजेंसी/गैटी इमेजिस

पिछले दो महीनों से उत्तर प्रदेश के लखनऊ के घंटाघर में नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के खिलाफ शहर की औरतें प्रदर्शन कर रही हैं. शहर के पुराने इलाके हुसैनाबाद में 17 जनवरी की दोपहर करीब 3 बजे 25-30 औरतों ने सीएए के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया था. दो महीने से घंटाघर का प्रदर्शन रुकवाने में असफल रही सरकार अब कोरोना वायरस के बहाने धरना खत्म कराने की कोशिश कर रही है. हालांकि आंदोलनकारी औरतों का कहना है कि अगर सरकार को हमारी चिंता है तो सीएए वापस ले जिससे धरना खुद ही समाप्त हो जाएगा.

घंटाघर प्रदर्शन में मौजूद 30 साल की इरम कहती हैं, “हमारे लिए सबसे बड़ी कोरोना खाकी वर्दी (पुलिस) है जो हम महिलाओं को दो महीने से प्रताड़ित कर रही है.” उन्होंने आगे कहा, “हमारे लिए आगे कुआं और पीछे खाई जैसी हालत है और इसलिए आंदोलन खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि कोरोना वायरस से तो सावधानी बरत कर बचा जा सकता है लेकिन सीएए के चलते सारा जीवन डिटेंशन केंद्र में गुजारना पड़ेगा.”

राज्य प्रशासन तमाम तरह के दबावों के बावजूद प्रदर्शनकारी औरतों से घंटाघर प्रांगण खाली नहीं करा सका है. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की धमकियों और प्रशासन के दबाव के बीच लखनऊ में सीएए के खिलाफ दो महीने से धरना जारी है. प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारियों और मुकदमों से भी औरतों के हौसलों में कमी नहीं आई और वे सीएए के वापस न होने तक प्रदर्शन खत्म करने को राजी नहीं हैं. इस दौरान प्रशासन और कुछ महिलाओं के बीच बातचीत भी हुई जो विफल रही.

17 जनवरी को जब प्रशासन तमाम कोशिशों के बादजूद घंटाघर पर जमा औरतों को नहीं हटा सका तो पुलिस ने सर्दी की ठंडी रात में उनके कम्बल जब्त कर लिए. इसके अलावा, आसपास के सार्वजनिक शौचालयों में भी ताले जड़वा दिए. औरतों ने कड़ाके की ठंड में भी खुले आसमान के नीचे धरना जारी रखा. सुबह होते-होते प्रशसन ने धरनास्थल को किले में तब्दील कर दिया.

अगले दिन सुबह बड़ी संख्या में औरतों को इकट्ठा होते देख प्रसाशन ने सख्ती बढ़ा दी. पुरुषों के घंटाघर के आसपास खड़े होने पर भी पाबंदी लगा दी और पार्किंग स्थल पर खड़ी गाड़ियों का चालान करना शुरू कर दिया. बाद में घंटाघर के पास जमा प्रदर्शनकारियों की भीड़ को कम करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया. लेकिन प्रदर्शन को बढ़ता देख अंत में राजधानी में धारा 144 लगा दी गई, जो लोगों को इकट्ठा होने से रोकती है.

इस दौरान प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कई सामाजिक संगठन के लोग भी आने लगे. अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति ने पहले दिन से ही सीएए के खिलाफ प्रदर्शन को अपना समर्थन दे दिया था. इसके अलावा महिला संगठन साझी दुनिया और इंसानी बिरादरी भी प्रदर्शन में शामिल हो गए. इसके अलावा अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष 80 साल के कल्बे सादिक भी व्हीलचेयर पर धरने में पहुंचे जिन्होंने वहां मौजूद औरतों से कहा कि केंद्र और प्रदेश सरकार से डरे बगैर आंदोलन को जारी रखना होगा. 

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस से पहले प्रशासन एक बार फिर सक्रिय हो गया और उसने धरने में आने वालों को गिरफ्तार करना और उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज करने शुरू कर दिए. समाजवादी पार्टी की छात्र नेता पूजा शुक्ला समेत 6 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को 25 जनवरी की सुबह 11 बजे घंटाघर से हिरासत में ले लिया गया. पूजा शुक्ला को हिरासत से जेल भेज दिया गया. महिला प्रदर्शनकरियों ने पुलिस पर उनसे अभद्र भाषा में बात करने का आरोप लगाया. घंटाघर पर सक्रिय रहने वाली एक महिला आंदोलनकारी उज्मा परवीन ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनसे अभद्र भाषा में बात की और उनके आठ महीने के बच्चे को छीन लेने की धमकी दी.

मौलाना कल्बे सादिक, जिन्होंने धरना स्थल पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा बोली जा रही भाषा की निंदा की थी, के बेटे कल्बे सिब्तैन नूरी और 10 अन्य लोगों के विरुद्ध भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया. नूरी ने भी सीएए के खिलाफ औरतों के प्रदर्शन का समर्थन किया था. साथ ही, सीएए के खिलाफ एक कैंडल मार्च में शामिल होने पर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया है.  

राज्य प्रशासन के दबाव के बावजूद घंटाघर पर गणतंत्र दिवस के मौके पर अभूतपूर्व जनसैलाब सुबह से ही मौजूद था. दिल्ली के शाहीन बाग की तरह घंटाघर के प्रांगण में भी सुबह झंडा रोहण हुआ और राष्ट्रगान गाया गया. उस दिन घंटाघर पर चारों तरफ तिरंगे ही तिरंगे थे. प्रदर्शनकारी, जिसमें पुरुष और बच्चे भी शामिल थे, हाथों में तिरंगे उठाए हुए “आजादी” और “नागरिकता संशोधन कानून वापस लो” के नारे लगा रहे थे. घंटाघर को मोहनदास गांधी, चंद्रशेखर आजाद, वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना अबुल कलाम आजाद की तस्वीरों से सजाया गया था. उस दिन कवियों, समाज सेवी और हिंदू और मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मगुरुओं ने भी आकर प्रदर्शनकारी महिलाओं से मुलाकात की और उनके आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान किया. इस मौके पर प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की बर्बरता को भुला कर उन्हें फूल भेंट किए. 

गणतंत्र दिवस के बाद 9 फरवरी को घंटाघर पर “घंटाघर चलो अभियान” के लिए एक बार फिर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों की भीड़ जमा हुई. इसमें प्रदेश के दूसरे हिस्सों और राजधानी दिल्ली से भी प्रदर्शनकारी शामिल होने आए. “घंटाघर चलो अभियान” में प्रदर्शनकारियों की बड़ी संख्या को देख प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उसी शाम से कार्रवाई शुरू कर दी. प्रदर्शन में मौजूद बहुजन मुस्लिम महासभा के उपाध्यक्ष मोहम्मद ताहिर को पुलिस ने घंटाघर से गिरफ्तार कर लिया. इसके अलावा 21 प्रदर्शनकारियों, जिसमें ज्यादातर औरतें थीं, पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया. 

जिन प्रदर्शनकारियों पर मुकदमा दर्ज किया गया उनमें नसरीन जावेद, उज्मा परवीन, शबीह फात्मा, अब्दुल्लाह, रिहाई मंच के स्वैव, नाहिद अकील, रुखसाना जिया, हाजरा, इरम, नताशा, सय्यद जरीन, सना, अकरम नकवी, अल हुदा, दानिश हलीम, राष्ट्रीय भागीदारी आंदोलन के पी. सी. कुरील, फहीम सिद्दीकी, मुर्तुजा अली, मोहम्मद एहतेशाम, मोहम्मद अकरम और सदफ जाफर हैं. इनमें से कइयों पर पहले भी सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने के मुकदमे दर्ज हुए थे और सदफ जाफर को 19 दिसंबर को प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था. वह जमानत पर रिहा हैं और उनके खिलाफ एक और मुकदमा बना दिया गया है. इस बीच जानेमाने शायर मुनव्वर राना की बेटियों- सुमैया राना और फौजिया राना- पर भी ठाकुरगंज पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया.

घंटाघर पर समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को आता देख लखनऊ जिला प्रशासन ने नागरिक समाज से जुड़े लोगों को प्रदर्शन में शामिल न होने की हिदायत देनी शुरू कर दी. लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व उपकुलपति और साझी दुनिया की सचिव रूप रेखा वर्मा से लेकर रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शोएब, मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पाण्डे, रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी, मौलाना सैफ अब्बास और मौलाना कल्बे सिब्तैन नूरी और अन्य लोगों को नोटिस देकर प्रदर्शन में शामिल न होने को कहा गया. उल्लेखनीय है कि दारापुरी व रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शोएब को सीएए के विरोध में प्रदर्शन करने के लिए जेल भेजा गया था और दोनों जमानत पर रिहा हैं. संदीप पाण्डे को सीएए विरोधी पर्चे बांटने और पैदल यात्रा से रोकने के लिए हिरासत में ले लिया गया था.

घंटाघर पर बढ़ रही प्रदर्शनकारियों की संख्या को कम करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की बाल कल्याण समिति ने 29 जनवरी को एक नोटिस जारी कर चेतावनी दी कि प्रदर्शनकारी अपने बच्चों को तत्काल प्रभाव से धरनास्थल से हटाएं अन्यथा उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. हालंकि प्रदर्शनकारियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ. प्रदर्शन में शामिल औरतों ने आरोप लगाया कि बच्चों के बहाने सरकार प्रदर्शन को खत्म करने की कोशिश कर रही है.

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कानपुर में सीएए के विरोध में धरना देने वाली औरतों के पतियों पर तंज कसते हुए कहा था, “पुरुष घरों में रजाई में सो रहे हैं और महिलाएं धरने पर बैठी हैं.” आदित्यनाथ ने आगे चेतावनी देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश की धरती पर कश्मीर वाले आजादी के नारे लगे तो देशद्रोह का मुकदमा दायर किया जाएगा. 

उनकी धमकी के अलावा कुछ अज्ञात युवकों ने आकर औरतों को धमकाया. औरतों ने बताया कि उन्होंने कुछ युवकों को पकड़ कर पुलिस को सौंपा था लेकिन बिना किसी कार्रवाई के पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. 

पुलिस अभी भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुकदमें दर्ज कर रही है. हाल ही में 16 मार्च को करीब 18 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 145, 147, 149, 188, 283, 353, 427, 505, आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 1932 की धारा 7 और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (संशोधन) कानून 2008 के अंर्तगत मुकदमें दर्ज किए गए हैं. जिन पर मुकदमें किए गए हैं उनमें कई ऐसे भी हैं जिन पर पहले से मुकदमें दर्ज हैं. थाना ठाकुरगंज में एक एफआईआर (संख्या : 0142) दर्ज की गई है जिसमें ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) के प्रदेश उपाध्यक्ष नितिन राज, समाजवादी छात्र सभा की पूजा शुक्ला और अधिवक्ता यामीन खान के अलावा आसिफ खान, रुखसाना जिया, शबी फात्मा, नसरीन खान, जियाउद्दीन, जीनत, रेहाना, रानी, रउफ, सुमैय्या राना, उज्मा परवीन, सैफउद्दीन मोहम्मद वसी, फैय्याज अहमद के नाम शामिल हैं.

समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसी राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टियों का कोई बड़ा नेता आज तक प्रदर्शन स्थल पर नहीं आया है. वामपंथियों को छोड़ कोई भी विपक्षी पार्टी प्रदर्शन का खुलकर समर्थन नहीं कर रही है. इस बीच प्रशासन की सख्तियां कम नहीं हो रही हैं और राजधानी लखनऊ का तापमान बढ़ता जा रहा है. धरनास्थल पर तंबू लगाने की भी अनुमति नहीं है. आंदोलन नेतृत्वविहीन है और नागरिक संगठनों से जुड़ी कुछ औरतों और कुछ गृहणियों के मजबूत इरादे ही पूरे आंदोलन को संभाले हुए हैं.

जब मैंने जारी कोरोनावायरस महामारी के बीच आंदोलन के भविष्य के बारे में अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संयुक्त सचिव मधु गर्ग से पूछा तो उन्होंने कहा कि कोरोना सिर्फ एक बहाना है धरना खत्म कराने का लेकिन सावधानी बरतना भी जरूरी है. गर्ग ने कहा, “कम औरतों के साथ सांकेतिक धरना चलता रहना चाहिए. बाकी औरतें घर-घर जा कर अभियान चलाएं और वायरस खत्म होने के बाद प्रदर्शन का फिर विस्तार किया जाए.”

लेकिन प्रदर्शन में ही मौजूद 44 साल की रूबीना जावेद ने मुझे बताया कि प्रदर्शन से ज्यादा भीड़ तो सार्वजनिक परिवहन में होती है और जब उस पर रोक नहीं है तो धरने से क्या परेशानी है. रूबीना ने समझाया कि घंटाघर का परिसर बड़ा है और महिलाएं उचित दूरी बनाकर बैठ सकती हैं. उन्होंने कहा, “अगर सरकार को औरतों और स्वास्थ्य सेवाओं की इतना ही फिक्र है तो प्रदर्शन स्थल पर मास्क और सैनिटाइजर आदि रखा दे.” उन्होंने कहा, “वायरस तो वक्त के साथ खत्म हो जाएगा और सावधानी अपना कर इससे बचा भी जा सकता है. लेकिन यह आंदोलन देश के संविधान को बचाने और आगे आने वाली नस्लों के लिए है. इसको बंद नहीं किया जा सकता.”

असद रिज़वी 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और देश के कई मीडिया संस्थानों के लिए लिखते रहे ​हैं.

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