2013 के माओवादी हमले की जांच पर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने, हमले में मारे गए थे कांग्रेसी नेता

22 अक्टूबर 2019
कांग्रेस के नेताओं ने इस हमले को राजनीतिक षडयंत्र बताया है.
एपी
कांग्रेस के नेताओं ने इस हमले को राजनीतिक षडयंत्र बताया है.
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2013 की मई में माओवादी विद्रोहियों ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला किया. हमले में पार्टी के शीर्ष नेताओं सहित कम से कम 27 लोग मारे गए. जिस वक्त यह हमला हुआ उस वक्त राज्य में मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी. घटना के बाद कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने कहा, “यह एक साधारण हमला नहीं है. एक राजनीतिक साजिश है." उन्होंने दवा किया, "कुछ ताकतें कांग्रेस को सत्ता में वापस आते नहीं देखना चाहतीं."

हमले के बाद राज्य सरकार की सिफारिश पर गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी को इसकी जांच सौंप दी. दिसंबर 2018 में, घटना के पांच साल बाद कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव जीता और 18 दिसंबर को राज्य का मुख्यमंत्री बनने के कुछ घंटे बाद भूपेश सिंह बघेल ने इस माओवादी हमले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल का गठन करने की घोषणा की. उन्होंने घटना को "आपराधिक राजनीतिक साजिश" बताते हुए कहा, "साजिशकर्ताओं को बेनकाब नहीं किया गया है. राजनेताओं का ऐसा नरसंहार इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. दोषियों को पकड़ने के लिए एसआईटी का गठन किया गया है.”

लेकिन केंद्र सरकार ने इस मामले को राज्य सरकार को सौंपने से इनकार कर दिया. 8 फरवरी 2019 को छत्तीसगढ़ सरकार को लिखे एक पत्र में गृह मंत्रालय ने कहा है कि एनआईए ने पहले ही आरोपपत्र दायर कर दिया है और जांच चल रही है. इस साल अगस्त में, हमले में बच गए दो लोगों, विवेक वाजपेयी और दौलत रोहरा ने जांच को स्थानांतरित करने से इनकार करने के केंद्र के फैसले के खिलाफ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की. वाजपेयी कांग्रेस की राज्य इकाई के सचिव हैं. वाजपेयी और रोहरा ने अदालत से मामले के पूरे रिकॉर्ड की जांच कराने का अनुरोध किया. सितंबर में उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और एनआईए को नोटिस जारी कर याचिका का जवाब देने के लिए कहा है.

माओवादी हमला 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के जगदलपुर-सुकमा राजमार्ग से सटे दरभा घाटी की झीरम घाटी में हुआ था. कांग्रेस के लगभग 200 नेताओं और कार्यकर्ताओं को ले जाने वाले बीस से ज्यादा गाड़ियों का काफिला परिवर्तन यात्रा में शामिल होने के लिए जा रहा था. यह क्षेत्र "लाल गलियारे" में पड़ता है. लाल गलियारा देश के मध्य, पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों को समेटे वह क्षेत्र है जहां माओवादियों की भारी गतिविधियां होती हैं. 150 माओवादियों के एक दल ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर काफिले को रोका और फिर गोलाबारी शुरू कर दी. पूर्व विदेश मंत्री विद्या चरण शुक्ल, राज्य में विपक्ष के पूर्व नेता महेंद्र कर्मा, छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रदेश कमिटी के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश कुमार पटेल तथा अन्य कांग्रेसी नेताओं के साथ मरने वाले लोगों में उदय मुदलियार और गोपी माधवानी भी शामिल थे.

छत्तीसगढ़ पुलिस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अज्ञात सदस्यों के खिलाफ शस्त्र अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया. अगले दिन, माओवादी पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर हमले की जिम्मेदारी ली. इस विज्ञप्ति ने स्पष्ट कर दिया कि महेंद्र कर्मा उनका प्राथमिक लक्ष्य था. कर्मा माओवादी विद्रोह का मुकाबला करने के लिए 2005 में शुरू किए गए राज्य प्रायोजित सलवा जुडूम के संस्थापक थे. माओवादियों ने दावा किया कि सरकार ने सलवा जुडूम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर बस्तर क्षेत्र में कई आदिवासियों को यातनाएं दीं और मार डाला. ऑपरेशन ग्रीन हंट को कांग्रेस-नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की केंद्र सरकार की अगुवाई में एक बहु-राज्य काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन के रूप में शुरू किया गया था.

निलीना एम एस करवां की रिपोर्टिंग फेलो हैं.

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