इति भागवत कथा!

मोदी के साये में सरसंघचालक का घटता कद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत 17 अगस्त 2018 को दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम संस्कार में शामिल हुए. अदनान आबिदी / रॉयटर्स
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत 17 अगस्त 2018 को दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम संस्कार में शामिल हुए. अदनान आबिदी / रॉयटर्स
23 November, 2022

2014 के आम चुनाव से पहले के महीनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय प्रवक्ता राम माधव ने भारतीय जनता पार्टी के नेता अरुण शौरी से मिलने का समय मांगा. माधव का उनसे एक अनुरोध था. वह चाहते थे कि शौरी आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत की ओर से बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के साथ बात करें.

भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छठे सरसंघचालक हैं. 1925 में नागपुर के ब्राह्मण समुदाय के भीतर से संघ उभरा था. इसके संबद्ध संगठनों का नेटवर्क, जिसे सामूहिक रूप से संघ परिवार के कहा जाता है, भारतीय समाज के लगभग हर पहलू में घुसा हुआ है. हिंदुत्व परिवार के प्रमुख के रूप में आरएसएस अपने लगभग तीन दर्जन संबद्ध संगठनों के लिए वैचारिक ईंधन प्रदान करता है, जिसमें सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी, देश के सबसे बड़ी ट्रेड यूनियनों में से एक भारतीय मजदूर संघ, विभिन्न विश्वविद्यालयों में सक्रिय एक छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और हिंदू साधुओं के समूह और मठवासी प्रतिष्ठान शामिल हैं. सरसंघचालक इस विशाल बिना आकार वाली प्रणाली पर अंतिम मा​र्गदर्शक के रूप में शासन करता है.

"आप कृपया नरेन्द्रभाई से मोहनजी के बारे में बात करें," शौरी माधव की इस बात को याद करते हैं. माधव के पास शौरी और मोदी के बीच घनिष्ठता का अनुमान लगाने का अच्छा कारण था. 2013 में दोनों की कई बार मुलाकात हुई थी. उसी साल 18 अक्टूबर को मोदी ने शौरी की एक किताब का विमोचन किया था. शौरी को लगता है कि इसी वजह से यह बात फैल गई कि वह मोदी को अच्छी तरह से जानते हैं.

शौरी बताते हैं, "मैंने राम माधव से पूछा कि क्या हुआ." माधव ने बताया कि भागवत ने मोदी की भाषा और अशिष्ट व्यवहार से नाराजगी जताई थी. शौरी ने कहा, "मोदीजी को नागपुर में मोहनजी से मिलने और उनके साथ, आरएसएस चुनाव अभियान में कैसे योगदान दे सकता है, इस पर चर्चा करने के लिए कहा गया था, “लेकिन मोदीजी ने कहा कि वह नागपुर नहीं जाएंगे और (भागवत) को बैठक के लिए अहमदाबाद आना चाहिए. तब मोहनजी अपने दौरे की सारी योजना बदल कर उनसे मिलने अहमदाबाद पहुंचे.''

एक बार अहमदाबाद में, भागवत ने अनुरोध किया कि बैठक आरएसएस कार्यालय में आयोजित की जाए लेकिन मोदी ने इनकार कर दिया. उन्होंने जोर देकर कहा कि भागवत उनके आवास पर आएं. वे अंततः . आरएसएस के किसी संरक्षक के घर पर मिले. शौरी बताते हैं, "मोदी शायद उनके साथ बहुत रूखे थे. बैठक में भागवत ने मोदी को बताना शुरू किया कि चुनाव अभियान कैसे आयोजित किया जाए, क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए.” शौरी को माधव ने जो बताया उस के अनुसार, मोदी ने कहा, " मोहनजी एक बात याद रखना. अगर मैंने बीजेपी में जाने के आरएसएस के आदेश का पालन नहीं किया होता, तो शायद मैं उस पद पर बैठा होता जहां आप आज हैं.” मोदी ने संगठन में एक प्रचारक के रूप में कई साल बिताए थे.

माधव ने शौरी को बताया कि भागवत का अपमान हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि इसलिए मोदी चुनाव पर उनकी और आरएसएस की सलाह को सिरे से खारिज कर रहे हैं. लेकिन भागवत की शिकायत संस्थागत की अपेक्षा व्यक्तिगत तौर की थी. शौरी ने बताया, "माधव चाहते थे कि मैं मोदी को बताऊं कि उनका अपमान करने की कोई जरूरत नहीं है और वह यही बात अधिक विनम्र तरीके से कह सकते थे."

वास्तव में शौरी भागवत की मदद करने की स्थिति में नहीं थे. शौरी  बताते हैं कि मोदी के साथ मेरी निकटता इतनी नहीं है कि मैं उन्हें उनके व्यक्तिगत आचरण के बारे में कुछ भी सलाह दे सकूं. मैंने माधव को इस मुलाकात के बारे में पूछने के लिए संदेश भेजे, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. मैंने इंटरव्यू के लिए भागवत से कई बार अनुरोध किया और कई सवाल भी भेजे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

यह किस्सा भागवत के बारे में कुछ चौकने वाली बातें बताता है. एक आरएसएस प्रमुख का प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार से सम्मान प्राप्त करने के लिए एक जनसंपर्क रणनीति बनाना, संघ परिवार के पूर्व प्रमुखों की शक्ति और नियंत्रण की स्थिति से एक प्रकार का प्रस्थान है. यह उस कमजोरी को दर्शाता है जिसे आरएसएस के कई अन्य पदाधिकारियों ने भी भागवत में महसूस किया है यानी सरसंघचालक के पद के प्रति श्रद्धा जगाने में विफलता और कम आत्मविश्वास. संघ की स्थापना के बाद से, आरएसएस की आत्मकथाओं ने केबी हेडगेवार और एमएस गोलवलकर जैसे सरसंघचालकों को संघ परिवार पर उनके वैचारिक प्रभाव के लिए हिंदुत्व देवताओं के समान बड़ा स्थान दिया है.इसकी तुलना में, भागवत की स्थिति निराशाजनक है. उदाहरण के लिए शौरी बताते हैं, जब मैं पहली बार भागवत से मिला, "शायद यह उनके आरएसएस प्रमुख बनने से ठीक पहले या बाद की बात है, तो पाया कि उन्होंने मुझ पर कोई खास असर नहीं डाला."

शायद भागवत अंधे हो गए थे. आखिरकार, हाल ही में मोदी ने उनके और उनके पिता मधुकरराव की सार्वजनिक प्रशंसा की थी. भागवत ने प्रचारक के रूप में गुजरात में आरएसएस की गतिविधियों की नींव रखी थी. मोदी ने अपनी पुस्तक ज्योतिपुंज में लिखा है, "लोहा पारस पत्थर के संपर्क में आने पर सोना बन सकता है लेकिन वह पारस पत्थर नहीं बन सकता है. लेकिन पारस पत्थर मधुकरराव ने अपने बेटे को दूसरे पारस पत्थर में ढाला."

किसी भी कीमत पर भागवत का यह सोचना गलत होता कि मोदी की सद्भावना संघ के नेता के रूप में उनके कार्यकाल के सुचारु रूप से चलने की गारंटी देगा. मोदी के साथ, संघ परिवार भी बदल रहा था. सरसंघचालक परंपरागत रूप से संघ में एक उच्च स्थान का आनंद लेते रहे हैं लेकिन भागवत आत्मसंतुष्ट हो गए. वे राजनीति का एक बुनियादी नियम भूल गए: शीर्ष पर दोस्ती के लिए कोई जगह नहीं होती. वो किसी सामान्य व्यक्ति के साथ बात नहीं कर रहे थे. मोदी ने खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया है जो संघ की लंबे समय से प्रतीक्षित हिंदू राष्ट्र परियोजना को पूरा कर सकता था. मीडिया ने उनके व्यक्तित्व को धर्म की तरह बढ़ावा दिया और बहस की शर्तों को उनके पक्ष में निर्धारित कर दिया. इसके अलावा, उनकी सरकार आजादी के बाद पहली ऐसी सरकार है जो ठीक उसी तरह विश्वास करती है जैसा आरएसएस मानता है: कि अकेले हिंदुओं को देश के लिए नियमों को निर्धारित करने का अधिकार है.

नाम न छापने की शर्त पर आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, "2014 से आरएसएस की शाखाएं कई गुना बढ़ गई हैं, संघ की कार्यकारी टीम का विस्तार हुआ है और समाज में इसका प्रभाव बढ़ा है. लेकिन इन सबके साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आया है: कि क्या यह अभी भी जहाज का मालिक है?" जिस तरह से संघ ने खुद को  बीजेपी के अधीन होने दिया, उससे वह नाराज थे. हालांकि आरएसएस और बीजेपी के बीच सहजीवी संबंध रहे हैं लेकिन सत्ता संघर्ष ने इस गतिशीलता को तनाव से भर दिया है.

आरएसएस के सदस्य नाथूराम गोडसे द्वारा एमके गांधी की हत्या के बाद सरकार ने संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था. इससे बाहर निकलने के लिए बेताब आरएसएस ने जल्द ही प्रतिज्ञा की कि वह केवल एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करेगा. सौजन्य : इंडियन एक्सप्रेस आर्काइव

सार्वजनिक रूप से, आरएसएस कभी स्वीकार नहीं करता कि उसका राजनीति से कोई लेना-देना है. 1949 में, इसने प्रतिज्ञा की कि यह पूरी तरह से एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करेगा. उस समय, आरएसएस सदस्य द्वारा एमके गांधी की हत्या के तुरंत बाद, संघ सरकारी प्रतिबंध से बाहर निकलने के लिए बेताब था. प्रतिबंध हटाए जाने से पहले अपनाए गए इसके संविधान में कहा गया है कि संगठन  इस तरह कि कोई राजनीति नहीं करता है और ''विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक कार्यों के लिए समर्पित है."

हालांकि, यह स्पष्ट है कि आरएसएस राजनीति से प्रेरित है. वास्तव में, आरएसएस द्वारा निभाई जाने वाली राजनीतिक भूमिका के बारे में बहुत कुछ भयानक है, विशेष रूप से जिस तरह से यह खुद को एक विशाल चुनाव मशीन में बदलने में सक्षम है - इसका अनुशासित और कट्टर कैडर बीजेपी के लिए सहायक की भूमिका निभा रहा है. संघ आरएसएस के वरिष्ठ लोगों के एक नेटवर्क के माध्यम से अपने चुनावी संगठन पर नियंत्रण रखता है, जो प्रमुख मुद्दों के साथ-साथ नेताओं और चुनावी उम्मीदवारों के चयन के लिए पार्टी के दृष्टिकोण की निगरानी, निर्देश और मार्गदर्शन करते हैं. संगठन ने एतिहासिक प्रेरणा नाजियों और इतालवी फासीवादियों से ली है, जो आर्य वर्चस्व के समान हिंदू वर्चस्व की दृष्टि को बढ़ावा देता है. दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर, ने वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड में लिखा है, "जर्मनी ने यह दिखाया है कि जातियों और संस्कृतियों की जड़ें गहराई तक जाती हैं, इन्हें एक में एकीकृत कर के आत्मसात करना कितना असंभव है, ये हिंदुस्तान में हमें एक अच्छा सबक सिखाता है और हमें इसका लाभ उठाना है."

आज की तरह हिंदू राष्ट्र के विचार को मुख्यधारा की स्वीकृति नहीं थी. बहुत समय तक आरएसएस से जुड़े राजनीतिक संगठनों ने इसे आत्मीयता से छुपाए रखने की कोशिश की थी. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में जो नाटकीय बदलाव हुए हैं, उसने संघ परिवार के बहुत से भूमिगत विचारों को सतह पर ला दिया है. मोदी सरकार ने अपने हिंदू-राष्ट्रवादी दृष्टिकोण पर तेजी से काम किया है. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे कानूनों ने गहरे संवैधानिक संकट को जन्म दिया. मीडिया से लेकर शिक्षा निकायों और न्यायपालिका जैसे लोकतांत्रिक संस्थानों के अधिग्रहण ने यह सुनिश्चित किया है कि ऐतिहासिक रूप से एक महान संशोधन लागू किया जा रहा है और सार्वजनिक बहस को मौलिक रूप से बदला जा रहा है. गांधी के हत्यारे जैसी शख्सियतों का पुनर्वास किया जा रहा है, जबकि हिंदुत्व के जनक विनायक दामोदर सावरकर को राष्ट्रवादी नायक के रूप में खुले तौर पर सम्मान दिया जा रहा है.

मोदी अपने नियमों से खेलते हैं और यह संभावना नहीं कि वे संघ परिवार कि प्रथाओं का पालन करने जा रहे हैं. उनके प्रधानमंत्री रहने के दौरान आरएसएस निर्देश जारी करने के बजाए उन पर अमल करता रहा है. आरएसएस के वरिष्ठ नेता ने बताया, ''अब समय बदल गया है. मोदी के पक्ष में संघ के कैडरों के बीच बड़े जनाधार ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिसमें बीजेपी और संघ की पुरानी परंपरा खत्म हो गई है. नई स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक राजनीतिक चतुराई दिखाने के बजाए, ऐसा लगता है कि मोहनजी ने मैदान खाली छोड़ दिया है. अब आदेश बीजेपी की ओर से आता है और संघ के कार्यकर्ता उसका पालन करते हैं. मोहनजी ने खुद को व्यर्थ कर लिया है.''

परिवर्तन सुचारु रूप से हुआ है. वोटों के ध्रुवीकरण के उद्देश्य से निरंतर चलती रहने वाली गतिविधियों द्वारा यहां तक कि कभी-कभी चुनाव प्रचार और बूथ प्रबंधन में प्रत्यक्ष भागीदारी के जरिए मोदी ने पूरे संघ परिवार को एक सतत चुनावी मोड में डाल दिया है. सख्त अधीनता और समर्पण के आदी आरएसएस कैडर की मदद से, मोदी अपने शासन को एक मजबूत आंतरिक संरचना प्रदान करने में सफल रहे हैं.लेकिन नई व्यवस्था का ढांचा जो एक अधिनायकवादी हिंदू राज्य के लिए आरएसएस की लालसा को पूरा कर सकता था, भागवत और सरसंघचालक के कार्यालय को एक अजीब स्थिति में ला देता है.

मोदी के साथ भागवत के संबंधों में एक अजीबीयत सी झलकती है. आरएसएस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, दोनों ने 2014 के बाद से कोई व्यक्तिगत बैठक नहीं की है - कुछ सार्वजनिक अवसरों को छोड़कर, जैसे कि 5 अगस्त 2020 को, जब मोदी और भागवत अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखने के लिए साथ-साथ बैठे थे. इस दौरान आरएसएस में मोदी के आदमी माने जाने वाले दत्तात्रेय होसबोले को 2021 में महासचिव के पद पर पदोन्नत कर दिया गया. पहले होसबोले को आगे बढ़ाने की उम्मीद का आरएसएस के एक वर्ग द्वारा विरोध किया गया था. पर जब 2019 में मोदी बहुत बड़े जनादेश के साथ फिर से सत्ता में आए, तो होसबोले के चुनाव का विरोध शांत हो गया. होसबोले अब आरएसएस के भीतर मोदी के फरमान को अधिक आसानी से लागू करने के लिए तैयार हैं.

"इस बारे में कोई सवाल नहीं है कि प्रभारी कौन है," पूर्व प्रचारक और भागवत के समकालीन रमेश शिलेदार ने बताया. चुनावों के दौरान अपने कैडर का उपयोग कैसे किया जाएगा, साथ ही साथ बीजेपी के प्रमुख संगठनात्मक निर्णयों पर आरएसएस नेतृत्व की राय मुख्य होती थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है. शिलेदार ने बताया, “जब राजनीतिक मामलों की बात आती है तो संघ के पदाधिकारी शायद ही कभी खुद निर्णय लेते हैं. यह परिवर्तन संघ के वर्तमान सरसंघचालक के अधीन कमजोर और अदूरदर्शी नेतृत्व के कारण हुआ है.'' आरएसएस के वरिष्ठ नेता के अनुसार, “यह नरेंद्र मोदी या अमित शाह नहीं है जिन्हें दोष दिया जाए. बात बस इतनी है कि संघ की नियामक शक्ति निष्क्रिय हो गई है. मोहनजी को इसका विरोध करना चाहिए था. लेकिन वे इतने बेसुध हैं कि उन्होंने खुशी-खुशी इस बदलाव को होने दिया है.''

भागवत ने अपने सार्वजनिक भाषणों का उपयोग बीजेपी सरकार की प्रशंसा करने और उसके संदेशों को बढ़ाने के लिए किया है. नागपुर में विजयादशमी कार्यक्रम एक ऐसा समारोह होता है जो आरएसएस के गठन के बाद से प्रतिवर्ष होता रहा है. हर साल इस मौके पर आरएसएस प्रमुख देश के लिए संघ के विचार को सामने रखते हैं. आम तौर पर सरसंघचालक से उम्मीद की जाती है कि वह पिछले साल का आलोचनात्मक मूल्यांकन करेंगे. हालांकि, 2014 के बाद से, भागवत ने केवल प्रधान मंत्री की सराहना ही कि है यह मोदी के दूसरे कार्यकाल के दौरान और बढ़ा है. उन्होंने 2019 के अपने भाषण में घोषणा की, “अनुच्छेद 370 को रद्द करने के लिए फिर से निर्वाचित शासन के कदम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनमें देश हित की अपेक्षाओं को पूरा करने और लोगों की भावनाओं और इच्छाओं का सम्मान करने का साहस है.”

आरएसएस के वरिष्ठ नेता के अनुसार इस स्थिति से भागवत की सहमति का एक कारण प्रचारकों तक अधिक भौतिक विशेषाधिकारों की पहुंच हो सकता है. मोदी के नेतृत्व में संघ के पास पहले से कहीं अधिक संसाधन हैं. वे बताते हैं, "2014 के बाद मोहनजी की भाषा बदल गई है. अब वह अक्सर कहते हैं कि हमें पहले जैसी तंगी में नहीं रहना है. हर जिले में वातानुकूलित कमरों और होटल जैसी सुविधाओं के साथ संघ कार्यालय बन चुके हैं या बन रहे हैं. प्रचारक अब कारों, ब्रांडेड कपड़ों और महंगे मोबाइल फोन के आदी हो गए हैं.” आरएसएस नेता के अनुसार, मोदी खुद आरएसएस के कार्यकर्ता रहे हैं, "प्रचारकों की ताकत और कमजोरियों दोनों को समझते हैं और उन्होंने इनका उपयोग अपने प्रतिरोध की क्षमता को खत्म करने के लिए किया है और खुद को संघ से भी ऊपर कर लिया है." लेकिन आरएसएस नेता इस बात से हैरान हैं कि सत्ता संतुलन में हुए इस बदलाव से भागवत खुद इतने स्थिर क्यों हैं. ''ऐसा लगता है कि मोहनजी को संघ की सत्ता मोदी के हाथों में जाने देने में कोई दिक्कत नहीं है.''

इसका कारण यह हो सकता है कि भागवत किसी बड़ी परेशानी में हैं. इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान देश को हिलाकर रख देने वाले सिलसिलेवार बम विस्फोटों की जांच में आरएसएस के कई सदस्यों के शामिल होने के आरोप लगे थे. बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद इन जांचों में आश्चर्यजनक मोड़ आया. जिसे जून 2015 में सार्वजनिक किया गया, जब विस्फोट के एक मामले में विशेष लोक अभियोजक रोहिणी सालियान ने दावा किया कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उन्हें आरोपियों पर "नरमी बरतने" के लिए कहा है. परिणामस्वरूप बाद के वर्षों में एक के बाद एक कई मामलों में आरएसएस से जुड़े संदिग्ध आतंकवादियों को बरी किया गया. हिंदू आतंकवाद के मामले में मोदी सरकार के रुख से भागवत को कुछ राहत मिली होगी. हालांकि, समस्या अभी खत्म नहीं हुई है क्योंकि कई मामले अभी भी लंबित हैं. भागवत के सिर पर अब भी तलवार लटकी हुई है.

मोदी ने संघ के भीतर सत्ता के संतुलन को बीजेपी के पक्ष में झुका दिया और साथ ही हिंदुत्व के विचार को एक उछाल भी दिया है जिसका आरएसएस कार्यकर्ताओं ने हमेशा सपना देखा है. इसलिए, मोदी को खुश करने की भागवत की उत्सुकता का एक अन्य कारण 2025 में आरएसएस के शताब्दी समारोह को सुचारु रूप से करने और इसकी अध्यक्षता करने की अनुमति प्राप्त करना भी हो सकता है.

मोहन भागवत आरएसएस के प्रमुख कार्यकर्ताओं के वंश से आते हैं. उनके पिता, मधुकरराव, एक प्रचारक थे, जिन्होंने 1940 के दशक में बॉम्बे प्रांत के गुजराती भाषी जिलों में बड़े पैमाने पर काम किया था. वह 1942 में प्रचारकों के पहले बैच में से थे, जिन्होंने ब्रह्मचारी रहने और संगठन के विस्तार के लिए अपना जीवन समर्पित करने की कसम खाई थी. उस समय गोलवलकर सरसंघचालक थे. इस समय भारत का स्वतंत्रता संघर्ष अपने शीर्ष पर था, आरएसएस ने निश्चित रूप से खुद को इस आंदोलन से दूर रखा था और इसलिए, इसमें कोई भूमिका नहीं थी. गोलवलकर ने उस समय कहा था "हिंदुओं, अंग्रेजों से लड़ने में अपनी ऊर्जा बर्बाद मत करो, मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट जैसे हमारे आंतरिक दुश्मनों से लड़ने के लिए अपनी ऊर्जा बचाओ." यह उग्र दर्शन 30 जनवरी 1948 को उस समय चरम पर पहुंच गया जब एक आरएसएस नेता नाथूराम गोडसे, ने अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के दर्शन के लिए गांधी की हत्या कर दी.

गांधी की हत्या के मद्देनजर भूमिगत हो गए आरएसएस कार्यकर्ताओं के बारे में 27 मार्च 1948 की एक पुलिस खुफिया रिपोर्ट, मधुकरराव का वर्णन करती है:

एक दक्खनी ब्राह्मण उम्र 35, चौड़ा माथा, धंसे हुए गाल, कद 5' 5'', मूल रूप से नागपुर का है. उसने बीएससी तक पढ़ाई की है. संघ का मुख्य संगठनकर्ता है. संघ के सदस्यों पर उसकी अच्छी पकड़ है और उसकी संगठन क्षमता अच्छी है. वह वर्ष 1941 में अहमदाबाद शहर पहुंचा. व​ह गुजरात और काठियावाड़ में आरएसएस की गतिविधियों का मुख्य आयोजक है.

आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया और इसके हजारों नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. मधुकरराव ने शादी कर ली, एक लॉ कॉलेज में दाखिला लिया और नागपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दक्षिण में एक छोटे से शहर चंद्रपुर में अपने पैतृक घर में रहने लगे. हालांकि उन्होंने आरएसएस नहीं छोड़ा. बाद में, वकालत करते हुए भी, उन्होंने संगठन के चंद्रपुर जिला प्रमुख के रूप में काम करना जारी रखा, एक ऐसा पद जो उनके पिता, नारायणराव भागवत ने उनके लिए रखा था. इन्हें नानासाहेब के नाम से भी जाना जाता है ये  आरएसएस संस्थापक केबी हेडगेवार के सहयोगी थे.

8 फरवरी 1940 को गोलवलकर- जो उस समय आरएसएस के महासचिव थे और कुछ समय तक सरसंघचालक बनने से हिचकिचा रहे थे- का हेडगेवार को लिखा एक पत्र इंगित करता है कि कैसे नारायणराव और मधुकरराव दोनों संगठन के कुलीन वर्ग का हिस्सा थे. हेडगेवार उस समय बिहार के राजगीर में ठहरे हुए थे. “माननीय बाबासाहेब आप्टे व श्री मधु भागवत शुक्रवार 9 फरवरी को ग्रैंड ट्रंक एक्सप्रेस से चंदा के लिए रवाना होंगे," गोलवलकर ने हेडगेवार को चंद्रपुर में होने वाले आरएसएस शिविर के बारे में सूचित करते हुए लिखा. “परसों, मुझे उनका एक पत्र मिला श्री नानासाहेब भागवत ने लिखा है कि बंपर तैयारी शुरू हो चुकी है.''

लगता है मोहन आरएसएस के ही स्वयंसेवक के रूप में पैदा हुए थे उनका जीवन पथ ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि उनका सरसंघचालक बनना तय था. वह 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के सांगली में मां मालतीबाई की पहली संतान थे. उनके दो छोटे भाई और एक बहन थी. साधारण होते हुए भी मोहन को ठीक से शिक्षित होने का मौका मिला था जो उन दिनों बहुसंख्यकों को नहीं मिलता था. उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा चंद्रपुर में पूरी की और 1964 में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की.

शिलेदार, जो नागपुर के एक पुराने आरएसएस परिवार से ताल्लुक रखते हैं और लंबे समय से भागवतों के संपर्क में हैं, ने बताया कि वह पहली बार 1965 में मोहन से मिले थे. आरएसएस के वरिष्ठ कैडर के लिए तीन साल के अधिकारी प्रशिक्षण शिविर का जिक्र करते हुए बताते हैं  "उन्होंने शायद अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की थी और ओटीसी के पहले वर्ष में भाग लेने के लिए नागपुर आए थे. मैं युवा स्वयंसेवकों की एक टीम का हिस्सा था, जिन्हें ओटीसी के लिए स्वयंसेवा का काम करने के लिए कहा गया था."

शिलेदार बताते हैं कि भागवत के माता-पिता चाहते थे कि वह एक चिकित्सक बनें. उन दिनों बीएससी पार्ट वन परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर छात्रों को मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश मिलता था. भागवत मेडिकल कॉलेज में सीट पाने के लिए पर्याप्त अंक प्राप्त नहीं कर सके. अतः उन्होंने नागपुर के पशु चिकित्सा महाविद्यालय में प्रवेश लिया और उसके छात्रावास में रहने लगे. उसी समय, एक समर्पित स्वयंसेवक के रूप में, उन्होंने संघ की एक स्थानीय शाखा में भाग लेना शुरू किया.

भागवत ने 1971 में चार साल का पशु चिकित्सा विज्ञान कार्यक्रम पूरा किया. अब वे एक पशु चिकित्सक के रूप में करियर बनाने और आरएसएस में जीवन बिताने के बीच झूल रहे थे. राज्य सरकार के पशुपालन विभाग में एक पशु चिकित्सक के रूप में काम करते हुए एक साल से भी कम समय बिताने के बाद, वह आरएसएस में विस्तारक के रूप में शामिल हो गए.

एक दो साल के भीतर, उन्होंने नागपुर में विस्तारक का जीवन त्याग दिया और पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के लिए अकोला चले गए. लेकिन उन्होंने आरएसएस के साथ अपना संबंध बनाए रखा. 1975 की शुरुआत में, शिलेदार ने इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम के लिए अंतिम परीक्षा पूरी की जिस मे उनका दाखिला था और फिर वे भागवत से मिले. शिलेदार बताते हैं, "मैंने उनसे कहा कि मैंने प्रचारक बनने का फैसला कर लिया है, हालांकि अभी यह तय होना बाकी है कि मैं देश के किस हिस्से में काम करूंगा." जहां तक मुझे याद है, मैंने उनसे उनके भविष्य की योजनाओं के बारे में भी पूछा था लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा.''

उस वर्ष 25 जून को, राष्ट्रीय घटनाओं के उथल-पुथल वाला मोड़ लेने के साथ ही आपातकाल लगा दिया गया. इसके नौ दिन बाद एक बार फिर आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. जैसे ही पुलिस ने प्रचारकों और प्रमुख कार्यकर्ताओं को उठाना शुरू किया, भागवत ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और छिप गए. आरएसएस के नेताओं ने बताया कि, आपातकाल के दौरान, जो 1977 तक चला, भागवत गिरफ्तारी के डर में ही रहते थे, वे अनजान जगहों में शरण लेते और कुछ ही दिनों मे अपनी जगह बदल देते. 1975 के अंत में, समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में “लोक संघर्ष समिति" नाम के एक संयुक्त मंच ने आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन चलाया. आरएसएस इसका हिस्सा था और जो स्वयंसेवक जेल से बाहर थे, उन्होंने बड़ी संख्या में गिरफ्तारी दी थी पर भागवत उनमें नहीं थे.

श्याम पंढरीपांडे, भागवत के समकालीन और आरएसएस के एक पुराने सदस्य के पुत्र, ने बताया कि देशव्यापी सत्याग्रह आंदोलन 14 नवंबर 1975  को शुरू हुआ. "मैंने नागपुर में सत्याग्रहियों के दूसरे जत्थे का नेतृत्व किया और अन्य सत्याग्रहियों के साथ मुझे हिरासत में ले लिया गया. वे बताते हैं, "दो दिन बाद मुझ पर विवादास्पद आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत आरोप लगाया गया और मुझे नागपुर जेल के एक बैरक में अन्य बंदियों के साथ डाल दिया गया. दूसरे बैरक में, मेरे पिता, मधुकरराव भागवत और आरएसएस के अन्य पच्चीस से तीस  वरिष्ठ लोग थे जिन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर के रखा गया था. लगभग हर दिन मैं अपने पिता से मिलने उनके बैरक में जाता जहां मैं नियमित रूप से मधुकरराव भागवत से और आरएसएस के अन्य वरिष्ठ लोगों से मिलता था.”

पंढ़रीपांडे बताते हैं कि छोटे भागवत कहीं नजर नहीं आ रहे थे. "अगर मोहन भागवत ने किसी सत्याग्रह में हिस्सा लिया होता तो उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया होता और अगर उन्हें महाराष्ट्र में कहीं भी हिरासत में लिया गया होता, तो वे भी अंततः नागपुर जेल में पहुंच गए होते. ऐसा इसलिए क्योंकि नागपुर और विदर्भ क्षेत्र के सभी मीसा बंदियों को इसी जेल में रखा गया था. यहां तक कि इस क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले जिन लोगों को शुरुआत में नासिक, यरवदा या कुछ अन्य जेलों में रखा गया था, अंततः उन्हें भी उनकी दलील पर नागपुर जेल में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां ऐसे बंदियों के लिए नए बैरकों का निर्माण किया गया था. अगर वह जेल में होते, तो मुझे निश्चित रूप से इसके बारे में पता होता.”

सरसंघचालक की सहानुभूतिपूर्ण जीवनी लिखने वाले किंगशुक नाग के अनुसार, भागवत आपातकाल के बाद आरएसएस में ऊपर उठे थे. मोहन भागवत : इन्फ्लुएंसर-इन-चीफ में नाग लिखते हैं, "जब आपातकाल हटा लिया गया और आरएसएस से भी प्रतिबंध हटा दिया गया था तब भागवत को अकोला में प्रचारक नियुक्त किया गया था. कुछ साल वह नागपुर में प्रचारक के रूप में रहे और जल्द ही विदर्भ जोन के प्रभारी बन गए. बिहार प्रांत प्रचारक (क्षेत्रीय संगठक) के रूप में उनका कार्यकाल संक्षिप्त था. थोड़े समय बाद ही वे नागपुर वापस आ गए. यह 1987 के आसपास की बात है. उसके बाद वह आरएसएस की केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल हो गए.” 

उन्होंने एक दशक के भीतर संगठन में जो प्रगति की, वह आश्चर्यजनक थी. नाग लिखते हैं कि भागवत 1991 में आरएसएस के अखिल भारतीय पदाधिकारियों की श्रेणी में शामिल हुए थे जब उन्हें शारीरिक प्रशिक्षण का अखिल भारतीय प्रभारी नियुक्त किया गया. संगठन में उनका कद बढ़ गया.

भागवत तब चालीस वर्ष से अधिक के थे. उनके व्यक्तित्व में आत्मविश्वास और अदम्य आकर्षण झलक रहा था. "युवा स्वयंसेवकों ने उनके साथ निर्विवाद सम्मान के साथ व्यवहार किया," जर्मनी में रहने वाले एक अकादमिक और फिल्म निर्माता, ललित वाचानी, जिन्होंने 1993 में आरएसएस पर बनी अपनी डाक्यूमेंट्री के लिए भागवत का इंटरव्यू लिया था, ने बताया ''यह लगभग नायक पूजा जैसा था." वाचानी की फिल्म में भागवत उद्यमी और बहिर्मुखी के रूप में सामने आते हैं. उनके चेहरे पर एक तैयार मुस्कान है. उनके सफेद बाल पतले होने लगे थे लेकिन उसकी मूँछें घनी थीं. उनकी गोल उभरी हुई आंखें चमकीली और बोलती हुई थीं. उनका व्यवहार संयमित था.

वाचानी और उनकी प्रोडक्शन टीम ने अक्टूबर 1992 तक नागपुर में अपनी शूटिंग पूरी की. उन्होंने अपना अधिकांश समय आशा सदन में बिताया, यह एक किराए की इमारत थी जिसका प्रयोग स्वयंसेवकों के लिए एक छात्रावास के रूप में किया जाता था. "पूरी शूटिंग के दौरान मोहन भागवत ने, हालांकि औपचारिक रूप से नहीं, आशा सदन में एक मुख्य व्यक्ति के रूप में काम किया," वाचानी बताते हैं. "इसका उल्लेख नहीं किया गया लेकिन वह वहीं थे- जैसे, जब हम आशा सदन में लड़कों की शूटिंग कर रहे थे, तो वह शूट देखने के लिए आते." वाचानी याद करते हुए बताते हैं, "मोहन भागवत की उपस्थिति से मैं प्रभावित हुआ तब भी जब मैंने उनसे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं की थी."

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने से कुछ समय पहले बाबरी मस्जिद के ऊपर चढ़े कारसेवक. संजय शर्मा/हिंदुस्तान टाइम्स

भागवत आरएसएस के उन नेताओं में से एक थे, जिनके साथ वाचानी ने इंटरव्यू करने का फैसला किया. वाचानी कहते हैं, "शाखा के लड़कों को फिल्माना, मैं यही तो करना चाहता था. भागवत पसंदीदा व्यक्ति बन गए क्योंकि वह बहुत मुखर और काफी मिलनसार थे." वह अलग ही रूप में थे वह अधिक सुलभ और मित्रवत थे और हमेशा आसपास दिखाई देते थे.

भागवत इस बात को लेकर उत्सुक थे कि वाचानी स्वयंसेवकों से क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. वाचानी बताते हैं, "कई बार लड़के हमें बताते कि पिछली शूटिंग के बाद कैसे भागवत उनसे पूछते कि आपने क्या पूछा और हमने क्या जवाब दिया. वह उन्हें यह भी सिखाते कि इंटरव्यू के दौरान क्या कहना है और क्या नहीं कहना है.” भागवत के प्रति कैडर की भक्ति स्पष्ट थी. वे उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें बांसुरी बजाने के लिए कहते, जबकि वह इसमें बहुत ही खराब थे. भागवत आरएसएस के अन्य नेताओं से अलग थे. उनका सामान्य स्वयंसेवकों से गहरा संबंध था. वह एक युवा नेता थे जिन्होंने इन लड़कों के साथ काफी समय बिताया था. आरएसएस के युवा स्वयंसेवकों के साथ उनका सहज परिचय उल्लेखनीय था.”

इंटरव्यू में, भागवत ने आरएसएस को सांप्रदायिक फासीवादी संगठन बताने के प्रयासों की निंदा की. वह आत्मविश्वास से कहते हैं, "जिस संगठन के पास सत्ता या पैसा नहीं है केवल प्यार है, वह कभी भी फासीवादी नहीं हो सकता है. फासीवाद को लाठियों से थोपा जाता है.हमारे पास कुछ नहीं है. हमारे पास स्वयंसेवकों को शाखा में आने के लिए मजबूर करने का कोई कानून नहीं है. हम फासीवादी नहीं हो सकते क्योंकि फासीवाद शक्ति के आधार पर जीवित रहता है और हम केवल एक दूसरे के प्रति स्नेह और राष्ट्र की समस्याओं के प्रति सहानुभूति रखते हैं.'' भागवत ने कहा कि "हिंदू कभी सांप्रदायिक नहीं हो सकता."

इस के दो महीने से भी कम समय बाद, आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों के सदस्यों और समर्थकों ने दिन के उजाले में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया.

राम जन्मभूमि आंदोलन संघ का सबसे महत्वपूर्ण अभियान था. अयोध्या में सोलहवीं शताब्दी की एक मस्जिद, बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने के आंदोलन ने दशकों से बहुसंख्यकवाद की राजनीति करने वाली ताकतों को खाद-पानी दिया है. यह मुद्दा 1949 से एक स्थानीय कानूनी लड़ाई का विषय रहा था जब हिंदू कट्टरपंथियों के एक समूह ने दावा किया कि यह स्थल देवता का जन्मस्थान है और उसने चुपके से मस्जिद में राम की एक मूर्ति रख दी.

आंदोलन के लिए प्रारंभिक जमीनी कार्य विश्व हिंदू परिषद द्वारा किया गया था जो आरएसएस से जुड़ा है. इसने साधुओं और हिंदू धार्मिक समूहों का समर्थन जुटाया था. उस समय के बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने एक टोयोटा ट्रक में जिसे एक रथ के समान बनाया गया था देश भर के हिंदुओं के लिए रथ यात्रा की. यात्रा 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ में शुरू हुई, जहां ग्यारहवीं शताब्दी में मध्य एशियाई आक्रमणकारी महमूद गजनी द्वारा एक मंदिर को तोड़ा गया था.

यात्रा को अयोध्या पहुंचने से पहले गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश के सैकड़ों गांवों और शहरों से गुजारने की योजना थी. 23 अक्टूबर 1992  को आडवाणी को उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन तब तक उनकी यात्रा ने हिंदुत्व के समर्थकों और कैडर की उग्रवादी भावनाओं भड़का दिया था जिससे इसके रास्ते में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे. संघ के सहयोगियों द्वारा अंजाम दी गई घटनाओं की कड़ी 6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद के विध्वंश के साथ समाप्त हुई. इसने देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया और बीजेपी के उत्थान के लिए जमीन तैयार कर दी.

इस पूरे समय आरएसएस अपने मुख्य नेताओं और प्रचारकों के अयोध्या के आसपास कहीं भी दिखाई नहीं देने के लिए सतर्क रहा. “प्रचारकों को निर्देश दिया गया था कि वे अयोध्या न जाएं.” शिलेदार, उस समय नागपुर के प्रचारक थे, उन्होंने बताया, “उन्हें अपने निर्धारित स्थानों पर रहने और नतीजों से निपटने के लिए तैयार रहने के लिए कहा गया. संघ ने प्रचारकों को अयोध्या में कारसेवा के लिए गए लोगों के परिवारों के साथ लगातार संपर्क में रहने का काम भी दिया था. यह एक सोची-समझी रणनीति थी और इसने अच्छी तरह से काम किया था."

वाचानी बताते हैं कि उस समय भागवत शाखाओं के और उन्हें चलाने वाले स्वयंसेवकों के प्रशिक्षण प्रभारी थे. यह विश्वास करना कठिन है कि वह नागपुर में बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले की गतिविधियों से अनभिज्ञ थे या इसमें उन्होंने भाग नहीं लिया था. आशा सदन में दस से बारह स्वयंसेवक रहते थे, ''मुझे यकीन है कि उन सभी ने अलग-अलग क्षमताओं में राम जन्मभूमि आंदोलन में भाग लिया होगा जैसे कि धन जुटाना, कारसेवा के लिए स्वयंसेवकों को लाना और यहां तक कि उन्हें अयोध्या तक ले जाना भी.''

वाचानी की 2002 की अनुवर्ती डॉक्यूमेंट्री दी मैन इन द ट्री में, तीन मुख्य पात्र, संदीप पाथे, श्रीपाद बोरिकर और पुरुषोत्तम, बाबरी मस्जिद विध्वंस में आरएसएस की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर खुलेआम शेखी बघारते हैं. पाथे कहते हैं, "प्रचारकों और विस्तारकों की रणनीति लागू करने की जिम्मेदारी थी. एक साधारण स्वयंसेवक, जिसे हम जिम्मेदार मानते, उसे उसके इलाके के कारसेवकों के समूह का प्रभारी बना देते. इस तरह हमने समूह बनाए और उन्हें अयोध्या भेजा.

संदीप के अनुसार, आरएसएस ने कारसेवा के हर विवरण की योजना बनाई थी. "तैयारी इतनी सावधानीपूर्वक की गई थी कि सब कुछ दर्ज किया गया था : प्रत्येक लड़के की उम्र, उसके ट्रेन आरक्षण का विवरण, उस समूह का नेता जिसका वह हिस्सा था. प्रत्येक समूह में पांच लड़के और एक नेता शामिल था. यहां तक कि स्वतंत्र रूप से अयोध्या जाने वालों को भी आरएसएस कार्यकर्ताओं के पास पंजीकरण कराना पड़ता था. किसी के लिए भी वहां एक कारसेवक के रूप में जाना संभव नहीं था.”

पुरुषोत्तम कहते हैं कि वह अपने क्षेत्र के समूह के नेता थे और उन्होंने मस्जिद को तोड़ने में और बाद में मलबा साफ करने में भाग लिया था. "मैं गुंबद पर था," श्रीपाद ने इसे "जीवन भर की उपलब्धि" कहा. उन्होंने इस मिशन के लिए आरएसएस द्वारा चुने जाने पर गर्व व्यक्त किया. "हम किसी भी चीज का मुकाबला कर सकते थे. हमने गुंबद पर चोट की जो कुछ भी हम अपने हाथों पर रख सकते थे - छड़ें, लाठी, कभी-कभी सिर्फ पत्थर. हमारे दिमाग में एक ही बात थी: ढांचे को गिरा दो.''

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आरएसएस पर फिर से कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया. लेकिन एक बार जब इसका संतुलन बहाल हो गया, तो संघ और उसके सहयोगी भारतीय राजनीति के केंद्र पर दिखने लगे. शुरुआत में धीमे लेकिन जल्द ही तेजी से बढ़ने लगे.

1990 के दशक के अंत तक बीजेपी केंद्र में एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही थी जबकि भागवत को आरएसएस में सबसे होनहार उभरते सितारे के रूप में देखा जा रहा था. 1999 में, उन्हें प्रचारकों के अखिल भारतीय नेटवर्क का प्रभारी बनाया गया. कुछ महीने बाद मार्च 2000 में उन्हें आरएसएस में दूसरा सबसे बड़ा पद सरकार्यवाह नामित किया गया. तेज-तर्रार के सुदर्शन सरसंघचालक बने.

भागवत ने बीजेपी नेतृत्व और आरएसएस के शीर्ष नेताओं के बीच तनाव के समय सरकार्यवाह का पद ग्रहण किया. पीढ़ियों से आरएसएस के नेताओं ने पूर्ण सत्ता पर कब्जा करने का सपना देखा था लेकिन इसके  चुनावी संगठन ने कभी केंद्र सरकार का नेतृत्व नहीं किया था. 1998  में बीजेपी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आया. (बीजेपी ने 1996 में भी सरकार बनाई थी लेकिन वह अल्पकालिक थी).अब संघ परिवार के आंतरिक विरोधाभास तेजी से उभर रहे थे.

एक प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ असली मालिक कौन होगा, यह सवाल पेचीदा हो गया. अतीत में यह कभी भी मुद्दा नहीं रहा था : आरएसएस निर्णय लेता था और बीजेपी आज्ञाकारिता के साथ काम करती थी. लेकिन अब बीजेपी को अपने गठबंधन सहयोगियों पर बहुत अधिक निर्भर रहना था जो आरएसएस के फरमान को मानने के लिए बाध्य नहीं थे. इसका मतलब था कि हिंदुत्ववादी संगठन अब नेतृत्व करने वाली मातृशक्ति नहीं था. आरएसएस शिकायत करने लगा कि वाजपेयी उसकी इच्छाओं और सलाह को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

मीडिया में कई लोगों का कहना था कि भागवत को उनकी अपनी योग्यता के कारण सरकार्यवाह के रूप में नियुक्त नहीं किया गया बल्कि इसलिए किया गया क्योंकि वाजपेयी आरएसएस के भीतर कुछ दबदबा बनाना चाहते थे. संघ के कट्टरपंथियों पर लगाम लगाने के भागवत के लगातार प्रयास से वाजपेयी को राहत मिली थी क्योंकि उन्होंने मतभेदों को कभी भी टकराव की स्थिति तक नहीं पहुंचने दिया- ऐसा डर जिसने सुदर्शन के सरसंघचालक बनने के बाद से संघ परिवार में कई लोगों को परेशान किया हुआ था. “सुदर्शन जी हर बात में वाजपेयी का विरोध करते थे चाहे वह आर्थिक नीति हो या विनिवेश या कोई और बात."

13  मार्च 2000  को, टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि भागवत की नियुक्ति वाजपेयी सरकार के लिए "अच्छी खबर" थी, "जिन्हें  स्वदेशी कट्टरपंथी के एस सुदर्शन की नए आरएसएस प्रमुख के रूप में नियुक्ति से घबराहट होती थी." भागवत को माना जाता है कि वह उदारवादी हैं जो आरएसएस में कट्टरपंथियों पर लगाम लगा सकते हैं. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि आरएसएस में कई लोगों ने भागवत के राजनीतिक दृष्टिकोण में उस व्यावहारिक दृष्टिकोण की झलक देखी थी जो पूर्व सरसंघचालक एमडी देवरस में थी. हालांकि इसमें कहा गया, "अपेक्षाकृत कुछ कम अनुभवी, भागवत का इस पद पर जाना, जो पहले वयोवृद्ध एचवी शेषाद्री के पास था, आरएसएस में वाजपेयी गुट के लिए शुभ संकेत था."

भागवत के उदारवादी राजनीतिक रुख ने उन्हें बीजेपी के साथ बढ़त दिला दी. सरकार्यवाहक बनने के लगभग एक महीने बाद उन्होंने मुंबई का दौरा किया जहां आरएसएस कार्यकर्ताओं और इसके विभिन्न सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने वाजपेयी और संघ नेतृत्व के बीच किसी भी "गंभीर मतभेद" को खारिज कर दिया. ऐसी सभी बातों को विचारों का अंतर बताया. टाइम्स ऑफ इंडिया ने 15 अप्रैल 2000 को बताया, "भागवत ने इसके पर्याप्त संकेत दिए हैं कि संघ परिवार विभिन्न महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को शर्मिंदा नहीं करेगा, भले ही एनडीए सरकार और आरएसएस नेतृत्व के बीच मामूली मतभेद सामने आए हों."

टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि मार्च 2003 में, कट्टरपंथी एचवी शेषाद्रि अपने गिरते स्वास्थ्य के कारण, सह-सरकार्यवाह के पद से हट गए और उनकी जगह एक अन्य नरमपंथी सुरेश सोनी ने ले ली. " भागवत, बीजेपी के करीबी होने के कारण वाजपेयी सरकार पर लगातार हमला करने वाले कट्टरपंथियों के खिलाफ एक संतुलन कारक बन गए." आडवाणी के करीबी सहयोगी सुधींद्र कुलकर्णी के मुताबिक, आरएसएस के पदाधिकारी वाजपेयी के शासन से नाखुश थे, विशेष रूप से उन मुद्दों पर उनके उदारवादी रुख के लिए जिन्हें संघ परिवार अपना मानता था.

आरएसएस के अंदर भागवत खुद को अलग तरीके से पेश कर रहे थे. उन्होंने कार्यकर्ताओं को ये बता कर प्रभावित किया कि वे संघ की परंपराओं के प्रति समर्पित हैं. कुछ लोगों के लिए यह 2001 में गणतंत्र दिवस पर हुई एक घटना से स्पष्ट था. नागपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता बाबा मेंधे और लगभग तीन अन्य कार्यकर्ता चुपचाप नागपुर में संघ मुख्यालय में घुस गए. मेंधे ने कहा, "हम आरएसएस के संस्थापक केबी हेडगेवार को श्रद्धांजलि देने के बहाने आरएसएस कार्यालय में घुसे." वे अंदर गए और नारे लगाने लगे जैसे “पहले राष्ट्रध्वज, फिर सभी ध्वज” फिर उन्होंने फहराने के लिए राष्ट्रीय ध्वज निकाला. मेंधे ने कहा, "परिसर के प्रभारी सुनील कथले और उनके लोगों ने हमें राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने की कोशिश की." लेकिन जब हम तिरंगा फहराने में सफल रहे तो उन्होंने हम पर हमला कर दिया. इस दौरान आरएसएस के लोग 'हर हर महादेव' के नारे लगाते रहे, जबकि हम  'वंदे मातरम’ और 'भारत माता की जय' के नारे लगा रहे थे. जल्द ही, बड़ी संख्या में आरएसएस के लोग इकट्ठा हो गए और हमें पीटना शुरू कर दिया जिससे हम भागने पर मजबूर हो गए.”

आरएसएस के लोग अवाक रह गये. एक ऐसे संगठन के लिए जिसने इस बात पर जोर देते हुए तिरंगे का व्यावहारिक रूप से बहिष्कार किया था, कि भारत को इसके बजाय भगवा ध्वज अपनाना चाहिए था. इस घटना को नजरअंदाज करना बहुत अपमानजनक माना गया. इस घटना से पूरे देश में आरएसएस के लोगों में आक्रोश फैल गया. कथले ने मेंधे और उनके सहयोगियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की जिसमें गैरकानूनी सभा, दंगा, जानबूझ कर चोट पहुंचाना, अतिक्रमण, जानबूझकर अपमान और आपराधिक धमकी शामिल है.

मेंधे ने बताया, "गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना कोई अपराध नहीं था. हम शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे और जब आरएसएस के लोगों ने हम पर हिंसक हमला करना शुरू किया तो हम चुपचाप वहां से चले गए. इसलिए मामला अदालत में खड़ा नहीं हो सका.’’ हालांकि नागपुर के प्रभारी आरएसएस नेता दिलीप गुप्ता की "तगड़ी पैरवी" ने सुनिश्चित किया कि मामला बारह साल से अधिक समय तक खींचा. "अगर मोहन भागवत, जो सरकार्यवाहक के रूप में आरएसएस के दिन-प्रतिदिन के कामकाज देखते थे, उन्होंने गुप्ता का समर्थन नहीं किया होता तो मामला इतनी गंभीरता से आगे नहीं बढ़ा होता और न ही इतनी लंबी अवधि तक खिंचता." अगस्त 2013 में, नागपुर की एक अदालत ने कार्यकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया.

2001 की घटना ने आरएसएस के लिए अपने मुख्यालय में राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराने की अपनी पुरानी प्रथा को जारी रखना मुश्किल बना दिया.खुद को और शर्मिंदगी से बचाने के लिए, 2002 में गणतंत्र दिवस पर आरएसएस को अपने नागपुर कार्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह प्रथा तब से चल रही है. भागवत ने अपनी ओर से राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में आरएसएस के असुविधाजनक इतिहास को मिटाने का प्रयास किया था.

आरएसएस लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि भारत को तिरंगे के बजाए अपने भगवा झंडे को अपनाना चाहिए था। रितेश शुक्ला/नूर फोटो/गैटी इमेजिस

17 सितंबर 2018 को विज्ञान भवन में दिए गए राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारित भाषण में, भागवत ने 1930 में हेडगेवार द्वारा तिरंगे के साथ आरएसएस के जुड़ाव को स्थापित करने के लिए जारी एक परिपत्र के बारे में झूठ बोला था. भागवत ने बताया "जब कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज के लिए प्रस्ताव पारित किया तब हेडगेवार ने "एक परिपत्र जारी किया जिसमें सभी शाखाओं को तिरंगे के साथ मार्च पास्ट करने और कांग्रेस के पूर्ण स्वराज प्रस्ताव का स्वागत करने के लिए कहा गया था.” भागवत 19 दिसंबर 1929 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रस्ताव का जिक्र कर रहे थे, जिसमें भारतीयों को पूर्ण स्वतंत्रता के लिए लड़ने के लिए कहा गया था और भारतीयों से तिरंगा फहराकर 26 जनवरी 1930 को "स्वतंत्रता दिवस" के रूप में मनाने का आग्रह किया था. वास्तव में 21 जनवरी 1930 को हेडगेवार के सर्कुलर में आरएसएस की सभी शाखाओं पर 26  जनवरी को बैठकें करने और "राष्ट्रीय ध्वज यानी भगवा ध्वज की पूजा करने" के लिए कहा गया था.

भागवत द्वारा इस इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के बारे में कारवां के पिछले लेखों में बताया गया है. न तो भागवत ने और न ही आरएसएस में किसी और ने इसका जवाब दिया और न ही कोई सार्वजनिक माफी मांगी.

भागवत की पहली पुस्तक यशस्वी भारत, 2021 में प्रकाशित हुई थी. आरएसएस के दिवंगत विचारक एमजी वैद्य द्वारा लिखित इसकी प्रस्तावना में कहा गया है कि यह पुस्तक भागवत के पिछले भाषणों से बहुत मिलती है जिसमें विज्ञान भवन में दिया गया वह भाषण भी शामिल है. इस पुस्तक में हेडगेवार द्वारा तिरंगा फहराए जाने के उनके झूठ को चुपचाप छोड़ दिया गया है. भागवत यहां कहते हैं, स्वयंसेवक तिरंगे को पहली बार फहराए जाने के समय से ही इसका सम्मान करते आ रहे हैं "जब कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पहली बार पूर्ण स्वराज के लिए प्रस्ताव पारित किया, तो डॉ. साहिब ने एक परिपत्र जारी कर सभी शाखाओं को कांग्रेस का स्वागत करने वाले प्रस्तावों को पारित करने के लिए बैठकें करने और उन्हें कांग्रेस कमेटी को भेजने के लिए कहा."

मेंधे व्यथित हैं. वे कहते हैं, तिरंगे का सार्थन करने की आज भागवत की कोई भी कोशिश यह नहीं छुपा सकती कि दो दशक पहले जब हमने आरएसएस मुख्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था, तब उन्होंने और उनके आदमियों ने हमारे साथ क्या किया था."

वाजपेयी सरकार का कार्यकाल 2004 में समाप्त हुआ. एक साल बाद आडवाणी, जो उस समय बीजेपी अध्यक्ष थे, ने पाकिस्तान का दौरा किया. कराची में मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना के मकबरे पर अतिथि रजिस्टर में लिखते हुए, आडवाणी ने 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्ना के भाषण की सराहना करते हुए इसे "एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का एक सशक्त समर्थन" बताया था.

सुधींद्र कुलकर्णी कराची में आडवाणी के साथ थे. वे बताते हैं कि जब भारत में आडवाणी की टिप्पणी की खबरें आईं तो बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने उन्हें फोन किया. उन्होंने याद करते हुए मुझसे पूछा, ''आडवाणीजी ने क्या कहा? उन्होंने जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कहा?”  मैंने स्वराज के साथ बात करने की कोशिश की “लेकिन वह गुस्से में थीं. उन्होंने मुझसे सिर्फ इतना कहा कि मैं आडवाणीजी को उस बयान को वापस लेने के लिए कहूं. मैंने यह बात आडवाणी जी को बता दी थी. वे बहुत परेशान हुए लेकिन उन्होंने इसे वापस नहीं लिया. जब वे दिल्ली लौटे तो संगठन के बीजेपी महासचिव संजय जोशी ने उनसे हवाई अड्डे पर मुलाकात की और आडवाणी से कहा कि "संघ जिन्ना पर उनकी टिप्पणी से खुश नहीं है." इस घटना के तुरंत बाद, एक साक्षात्कार में सुदर्शन ने कहा कि यह अटलजी और आडवाणीजी दोनों के सेवानिवृत्त होने का समय है. जब यह हुआ तब मैं आडवाणी जी के साथ था और वे बहुत, बहुत उत्तेजित थे. उन्होंने वास्तव में [सुदर्शन] से बात की और अपनी नाराजगी व्यक्त की.”

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, आडवाणी और सुदर्शन के बीच गतिरोध ने भागवत को आरएसएस में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर प्रदान किया. अगर आडवाणीजी और सुदर्शनजी के बीच यह टकराव नहीं होता, तो मोहनजी सरसंघचालक बनने से पहले संघ में इतनी ताकत कभी नहीं पा सकते थे. एनडीए सरकार के दौरान, सुदर्शनजी और आडवाणी जी ने मिलकर काम किया था. जब सुदर्शनजी ने अटलजी पर निशाना साधा, तब आडवाणीजी ने दूसरी ओर देखकर, इस अफवाह को बल दिया था कि अटलजी को कमजोर करने में उनका भी हाथ है. लेकिन, एक बार जब वे अलग हो गए तो मोहनजी, जो इतने लंबे समय से अटलजी के समर्थन का आनंद ले रहे थे, इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए तेजी से आगे बढ़े. पहले उन्होंने बीजेपी में आडवाणीजी को कमजोर करने के लिए सुदर्शनजी के साथ गठबंधन किया और फिर उन्होंने संघ में सुदर्शनजी को कमजोर करने के लिए आडवाणीजी के साथ गठबंधन किया.

भागवत ने खुद को आरएसएस के प्रमुख लड़ाके के रूप में पेश किया. जब आडवाणी और सुदर्शन के बीच की खाई गहरी हुई और संघ परिवार पर संकट छा गया, तब भागवत ने सुदर्शन की आडवाणी को बीजेपी प्रमुख के पद से इस्तीफा दिलवाने में मदद की. 12 जुलाई 2005 को, टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार भागवत ने वरिष्ठ आरएसएस नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया, जिसमें मदन दास देवी और सुरेश सोनी शामिल थे, जो आडवाणी को ''स्पष्ट संदेश" देने के लिए मिले थे कि उन्हें अब पद छोड़ देना चाहिए. रिपोर्ट में कहा गया कि प्रतिनिधिमंडल ने वाजपेयी,जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज, एम वेंकैया नायडू और राजनाथ सिंह, जैसे वरिष्ठ बीजेपी नेताओं से भी मुलाकात की जिन्होंने अनुरोध किया कि आडवाणी को "शर्मिंदगी से बचने के लिए कम से कम दिसंबर तक पद पर बने रहने दिया जाए."

अपनी शुरुआती अवहेलना के बावजूद, आडवाणी एक सप्ताह के भीतर झुक गए. 18 जुलाई को, टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि, सुदर्शन को यह बताने के बाद कि वह पद छोड़ देंगे, उन्होंने भागवत और सोनी से "छोड़ने की योजना के तौर-तरीकों पर और विशेष रूप से समय पर चर्चा करने के लिए" मुलाकात की. उसी साल दिसंबर में उन्होंने राजनाथ सिंह को अध्यक्ष पद सौंप दिया.

बीजेपी में संघ की प्रधानता को फिर से लागू करने के प्रयासों की अगुवाई करके, भागवत संघ के कट्टरपंथियों के बीच कुछ लोकप्रियता हासिल करने में सफल रहे. आरएसएस की मूल विचारधारा से विचलित होने के लिए बीजेपी के संस्थापक सदस्य की जांच करके उन्होंने खुद को सबसे बड़े आंतरिक व्यवधान का सामना करने में सक्षम साबित किया था. भागवत के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था. आडवाणी की जिन्ना पर टिप्पणी के बाद उन्होंने आरएसएस के भीतर जो व्यक्तिगत प्रगति की वह उल्लेखनीय थी. लेकिन वह अभी भी संघ के वर्चस्व से बहुत दूर थे, जिसका नेतृत्व अभी भी सुदर्शन के अनुभवी हाथों में था.आगे अभी बहुत अनपेक्षित मोड़ थे.

2004 में सत्ता गंवाने के बाद बीजेपी के कभी न खत्म होने वाले संकटों से संघ परिवार बौखला गया था. मई 2006 में पार्टी के उभरते हुए सितारे प्रमोद महाजन की मृत्यु के साथ स्थिति और भी बदतर हो गई. साथ ही, वाजपेयी का भी स्वास्थ्य गिर रहा था. जिन्ना विवाद के बावजूद, आडवाणी ही बीजेपी को सत्ता में वापस लाने के लिए सबसे सक्षम नेता लग रहे थे. अब भी सुदर्शन सहित आरएसएस के लोग ही आडवाणी को एक अजीबोगरीब कठोरता से निर्देशित कर रह थे.

संघ परिवार के भीतर बदलाव को भांपते हुए, भागवत ने सरसंघचालक की इच्छा के विरुद्ध जाने का निश्चय किया. उन्होंने एक साहसिक और उत्तेजक भाव में अपना विचार व्यक्त किया. उन्होंने अगस्त 2006 में आडवाणी के आवास पर एक जन्माष्टमी सभा में यह स्पष्ट संदेश दिया कि संघ जिन्ना विवाद को भूल गया है. आरएसएस के वरिष्ठ नेता के अनुसार, "हालांकि वह आडवाणीजी के प्रति अपने रवैये के कुछ संदिग्ध पहलुओं से अवगत थे लेकिन उनकी रणनीतिक समझ ने उन्हें बताया कि उन्हें संघ में अल्पसंख्यकों के साथ खड़े नहीं होना चाहिए. इस से संघ में भागवत की अपने भविष्य की संभावनाएं कम हो जातीं."

1977 में एक रैली के दौरान संगठन के संस्थापक केबी हेडगेवार और दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर के चित्रों के सामने प्रदर्शन करता आरएसएस बैंड. सोनदीप शंकर / गैटी इमेजिस

भागवत के कदम की आरएसएस में व्यापक रूप से सराहना की गई थी. केवल सुदर्शन और एक छोटा सा अल्पसंख्यक समहू, जो अभी भी आडवाणी के खिलाफ था वही इसके आलोचक थे. लेकिन वे भागवत को रोकने के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सके, क्योंकि यह सभी के लिए स्पष्ट था कि उनका रुख बीजेपी के हित में था और यही कारण था कि 10 दिसंबर 2007 को, अगले आम चुनाव से डेढ़ साल पहले, भागवत ने बीजेपी से यह घोषणा करवाई कि चुनाव में पार्टी का नेतृत्व आडवाणी करेंगे. सभी अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए वह और सुरेश सोनी उसी दिन आडवाणी से मिले. टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया, "इसका इरादा स्पष्ट रूप से संघ में विभाजन की खबरों से पर्दा उठाने का था."

भागवत के फैसले ने आरएसएस के अंदर सुदर्शन की अलोकप्रियता का पर्दाफाश किया. सुदर्शन की विवाद खड़े करने की आदत की पहले से ही आलोचना होनी शुरू हो गई थी. उन्हें बहुत अधिक वाचाल व्यक्ति के रूप में देखा जाता था इसलिए मीडिया के साथ उनकी बातचीत कम हो गई. भागवत के फैसले ने इस अफवाह को बल दिया कि सुदर्शन का खुद पर पूरा नियंत्रण नहीं था और वह अपनी कमजोर याददाश्त के कारण उचित निर्णय नहीं ले पा रहे थे. इस अफवाह को आरएसएस के पदाधिकारियों द्वारा भी गंभीरता से लिया गया. जो महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण समुदाय से संबंधित थे. समुदाय ने परंपरागत रूप से संगठन के शीर्ष पदों को अपने संरक्षण में रखा था जबकि सुदर्शन का परिवार कर्नाटक से था और उनके पूर्ववर्ती राजेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश के थे.

भागवत ने अपनी नयी स्थति को अपने करियर के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक के रूप में देखा. वह सुदर्शन को कमजोर करने मात्र से ही नहीं रुके. वे अपने लाभांश को अधिकतम करने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे थे. मार्च 2008 में, भागवत ने एक तख्तापलट किया, संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से कई कट्टरपंथियों को हटा दिया और व्यावहारिक रूप से सुदर्शन को अलग-थलग कर दिया. सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था से हटाए जाने वालों में एमजी वैद्य, के सूर्यनारायण राव, रंगा हरि और श्रीपति शास्त्री थे. टाइम्स ऑफ इंडिया ने कहा , "आमतौर पर आरएसएस के शीर्ष अधिकारी अपने संगठन में बदलाव की घोषणा नहीं करते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भागवत ने सभी को संदेश दिया है कि कट्टरपंथी बाहर के रास्ते में हैं."

आगे जो हुआ वह शायद ही कोई आश्चर्य था. रमेश शिलेदार बताते हैं “लोग सुदर्शनजी से तंग आ चुके थे. वह बूढ़े और अस्थिर हो गए थे और संघ का उस तरह से नेतृत्व करने में सक्षम नहीं थे जैसा कि लोगों ने सोचा था जब उन्हें सरसंघचालक बनाया गया था. खुद उन्होंने ही लोगों से कहना शुरू कर दिया था कि अब उन्हें रिटायर हो जाना चाहिए. उनके दो पूर्ववर्तियों, बालासाहेब देवरस और रज्जू भैया ने पहले ही यह मिसाल कायम कर दी थी, जिन्होंने तबीयत खराब होने पर पद छोड़​ दिया था.

यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि सुदर्शन, जो उस समय 78 वर्ष के थे, वास्तव में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रहे थे या सिर्फ इसे एक मुद्दा बनाया गया था ताकि उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सके. हालांकि, यह बात तय है कि लगभग एक साल से उन पर रिटायर होने और आरएसएस की बागडोर अधिक ऊर्जावान एक युवा व्यक्ति को सौंपने का दबाव हर तरफ से बढ़ रहा था. चूंकि वह पहले ही आरएसएस में अलग-थलग पड़ चुके थे  इसलिए उनके पास इसका विरोध करने का कोई तरीका नहीं था.

इसलिए, जब मार्च 2009 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा नागपुर में शुरू हुई, तब से ही सत्ता परिवर्तन का अनुमान लगाया जा रहा था. शिलेदार के अनुसार, जैसे ही बैठक शुरू हुई, सुदर्शन ने दबाव के आगे घुटने टेक दिए और एकता का प्रदर्शन करते हुए, अपनी सेवानिवृत्त और भागवत को अपने उत्तराधिकारी के रूप में नामित करने के अपने फैसले की घोषणा की। “सुदर्शन की घोषणा ने सभी को चौंका दिया; भागवत सबसे ज्यादा हैरान ​थे," किंगशुक नाग अपनी जीवनी में लिखते हैं। "प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वह घोषणा से अभिभूत थे और उन्हें खुद को संभालने में कुछ क्षण लगे."

इस घोषणा ने निश्चित रूप से 58 वर्षीय भागवत को आराम दिया लेकिन इसका कारण अलग था. यह एक राहत थी कि जिस व्यक्ति को उसने पिछले वर्षों से बेदखल करने की कोशिश की थी, वह स्वेच्छा से अपना पद छोड़ रहा था. सत्ता हस्तांतरण के लिए कोई आखिरी मिनट की परेशानी नहीं हुई और वह वास्तव में आरएसएस प्रमुख के पद से कानूनी रूप से चले गए. शिलेदार बताते हैं कि सम्मेलन से पहले के महीनों के दौरान, भागवत को चिंता थी कि वे घटनाओं पर नियंत्रण खो सकते हैं. क्योंकि सरसंघचालक निर्वाचित नहीं होता; वह बस अपने पूर्ववर्ती द्वारा नामित होता है.

महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण समुदाय से संबंधित आरएसएस के प्रमुख पदाधिकारी इस से संतुष्ट थे. भागवत का शांत व्यवहार सभी को पसंद था और उनकी मोटी सफेद मूंछें, हेडगेवार के ऊपरी होंठ की याद दिलाती थीं, जिससे संगठन के भीतर उनकी लोकप्रियता बढ़ी थी. युवाओं के लिए भी, यह विजय का क्षण था उन्होंने सुदर्शन के विपरीत, भागवत को अपने ही आदमी के रूप में देखा, जिसका सम्मान किया जाना था लेकिन जो बहुत दूर था. 2016 में, जब वाचानी आरएसएस के स्वयंसेवकों से फिर मिले, जिनका उन्होंने 1992 में साक्षात्कार किया था, तो उन्होंने भागवत पर अपना गर्व व्यक्त किया. वाचानी बताते हैं "भावना लगभग ऐसी थी, 'यह हमारा आदमी है हम उसके साथ बड़े हुए हैं." एक व्यक्ति ने तो यहां तक कहा कि वह ''उस व्यक्ति की गोद में खेला था जो अब आरएसएस का सर्वोच्च नेता है."

भागवत ने जल्द ही बीजेपी के मामलों में प्रमुख मध्यस्थ बनना शुरू कर दिया. वह क्षेत्र जिससे वह अच्छी तरह से परिचित थे और जिसने आरएसएस के नेतृत्व में उनके उत्थान के लिए स्प्रिंगबोर्ड के रूप में काम किया था. एक बार जब वह सरसंघचालक बन गए, तो उन्होंने अपने विचारों को बीजेपी तक पहुंचाना शुरू कर दिया. उस वर्ष के आम चुनाव में बीजेपी के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी ने सरसंघचालक बनने के तुरंत बाद नागपुर में भागवत से मुलाकात की.

2009 के चुनाव में बीजेपी की हार ने पार्टी के भीतर और अधिक झगड़ों को जन्म दिया. इसने भागवत को दखल देने और बीजेपी पर अपनी और आरएसएस की शक्ति को मजबूत करने में सक्षम बनाया. उन्हें सरकार्यवाहक के रूप में अपने कार्यकाल का अनुभव था.

19 अगस्त 2009 को शिमला में शुरू होने वाली बीजेपी की तीन दिवसीय चिंतन बैठक की पूर्व संध्या पर भागवत ने एक शक्तिशाली कदम उठाया. उस समय आडवाणी लोकसभा में विपक्ष के नेता थे. टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक साक्षात्कार में, जो शिमला बैठक के उद्घाटन के दिन प्रकाशित हुआ था, भागवत ने सुझाव दिया कि आडवाणी को अलग हटकर विचार करना चाहिए और युवा नेतृत्व को पार्टी का नेतृत्व करने में मदद करनी चाहिए. भागवत ने कहा, ''हम 2003 से आडवाणीजी से कह रहे हैं कि आपके पास पर्याप्त युवा कार्यकर्ता हैं, उन्हें धीरे-धीरे आगे बढ़ाएं.''

भागवत ने कहा कि बीजेपी में उग्र गुटीय झगड़े “तुरंत बंद होने चाहिए. अब बहुत हो गया.” उन्होंने "संतुलन प्रक्रिया, कानून की कमी" को इन झगड़ों के लिए जिम्मेदार ठहराया. इस सवाल पर कि क्या अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज और नरेंद्र मोदी ही अगले पार्टी अध्यक्ष के एकमात्र विकल्प थे, उन्होंने कहा, “बीजेपी को इन चारों से अलग भी देखना चाहिए. … मुझे लगता है कि बीजेपी में कई अच्छे नेता हैं जो संगठन की बागडोर संभालने में सक्षम हैं.”

संदेश स्पष्ट था. इसने चिंतन बैठक को एक अर्थहीन कवायद में बदल दिया और पार्टी में नेतृत्व के एक पीढ़ीगत बदलाव के लिए बातचीत और विचार-विमर्श की एक श्रृंखला शुरू कर दी. दिसंबर 2009 में, सुषमा स्वराज ने विपक्ष के नेता के रूप में आडवाणी से पदभार संभाला. आडवाणी के लिए एक शानदार निकास सुनिश्चित करने के लिए, बीजेपी ने अपने संविधान में संशोधन किया और उनके लिए संसदीय विंग के अध्यक्ष का पद सृजित किया. अगले दिन, बीजेपी संसदीय बोर्ड ने पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के प्रमुख नितिन गडकरी को पार्टी के अगले अध्यक्ष के रूप में चुना, जो नागपुर के ब्राह्मण थे और भागवत के बेहद करीबी माने जाते थे.  

हालांकि सत्ता परिवर्तन के बाद आडवाणी ने घोषणा की कि वे राजनीति से संन्यास नहीं ले रहे हैं, फिर भी किसी के मन में शायद ही कोई संदेह था कि भागवत ने व्यावहारिक रूप से उन्हें इतिहास में समर्पित कर दिया गया था. हालांकि, भागवत बीजेपी में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे थे उसके बावजूद पार्टी का एक नेता था, जिसकी अपनी योजना थी.

जब भागवत बीजेपी को नियंत्रित करने की अपनी इच्छा में महत्वाकांक्षी हो रहे थे, मोदी संघ परिवार में अपने प्रभाव का विस्तार करने के लिए उत्साह से काम कर रहे थे. 2002 का गुजरात नरसंहार, हाल के दिनों में देश के सबसे भयानक सांप्रदायिक नरसंहारों में से एक,जो मोदी की निगरानी में हुआ था उसने मोदी की ताकत को बड़ा दिय था. मोदी ने हिंदू राष्ट्र के वादे को उस तरह से बुलंद किया जैसा पहले कभी किसी ने नहीं किया था.

2009 के आम चुनाव के दौरान संघ परिवार में मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखने की इच्छा सर उठाने लगी थी. जबकि आडवाणी पहले से ही बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे और चुनाव अभी खत्म नहीं हुए थे, मोदी के लिए बढ़ते शोर ने पार्टी प्रबंधकों और आरएसएस नेतृत्व को भ्रमित कर दिया. 26 अप्रैल 2009 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया, "इस चुनाव पर ध्यान केंद्रित करने के बजाए पार्टी प्रबंधकों से अगले चुनावों के लिए उम्मीदवार मोदी पर उनके विचार मांगे जा रहे थे “मोदी-फॉर-पीएम मंत्र ने चुनाव के बाद के परिदृश्य में बीजेपी के आंतरिक समीकरणों पर ध्यान केंद्रित किया. अपने साथियों के बीच मोदी का उभरना अन्य नेताओं को परेशान करने वाला था, इनमें वे भी शामिल थे जो इस गुट के प्रति वफादार माने जाते थे.

6 सितंबर 2009 को गुजरात में आरएसएस की एक सभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी. प्रधानमंत्री के रूप में, मोदी ने हिंदुत्व में उछाल लाया है जिसका आरएसएस कार्यकर्ताओं ने हमेशा सपना देखा है. सैम पंथकी/एएफपी/गैटी इमेजिस

पूर्व प्रचारक के रूप में मोदी आने वाले दिनों की बाधाओं से पूरी तरह वाकिफ थे. इसलिए उन्होंने दिल्ली की अपनी यात्रा के विरोध को कम करने के लिए सोची समझी चाल चली. 2008 की अपनी पुस्तक ज्योतिपुंज में, उन्होंने हेडगेवार, गोलवलकर और भागवत के पिता मधुकरराव सहित एक दर्जन से अधिक आरएसएस नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्हें उन्होंने गुजरात में आरएसएस का स्तंभ कहा था. इसी में उन्होंने अपने पिता की तरह प्रचारक बनने के लिए मोहन भागवत की भी प्रशंसा की. इस पुस्तक के प्रकाशन के समय भागवत सरकार्यवाह थे और उनका सरसंघचालक बनना तय लग रहा था.

शौरी कहते हैं, ''हालांकि संघ के बारे में मोदी की राय अलग थी" मोदी ने आरएसएस को एक ऐसे संगठन के रूप में देखा था जिसका पालन करना बहुत आसान था. “उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि आरएसएस के लोग भोले होते हैं. हां, उन्होंने उनके लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया वह भोला था, निर्दोष नहीं. यह मोदी का दृष्टिकोण था जो मोहनजी के और उस संगठन के अनुकूल था जिसमें वे जोड़-तोड़ कर सकते थे.”

2009 और 2013 के बीच का समय बीजेपी के भीतर बहुत हंगामे और उथल-पुथल का समय था. तमाम बाधाओं के बावजूद आडवाणी इस बात पर जोर दे रहे थे कि उन्होंने अभी तक राजनीति से संन्यास नहीं लिया है. सुधींद्र कुलकर्णी बताते हैं, “तभी संघ परिवार का पारिस्थितिकी तंत्र मोदी के लिए जड़ जमाने लगा था. मुझे आश्चर्य नहीं, हालांकि मेरे पास ठोस सबूत नहीं है कि मोदी ने वास्तव में इसे प्रबंधित किया और आरएसएस के पारिस्थितिकी तंत्र ने यह कहना शुरू कर दिया कि मोदी ही वह हैं जो पार्टी को सत्ता में वापस ला सकते हैं." गडकरी को दूसरा कार्यकाल दिलाने के भागवत के सभी प्रयास बुरी तरह विफल रहे. 2012 में पूर्ति घोटाले में गडकरी का नाम सामने आने के बाद- जिसमें जांच में पाया गया कि पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड शेल कंपनियों से धन प्राप्त कर रहा था- बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता उनके खिलाफ खुलकर सामने आए और उन्हें पद से हटाने की मांग की. उन्होंने इस्तीफा दे दिया और राजनाथ सिंह जनवरी 2013 में पार्टी अध्यक्ष बने.

कुलकर्णी बताते हैं, राजनाथ सिंह ने शुरुआत से ही मोदी का प्रचार करना शुरू कर दिया था. “जहां तक मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में मंजूरी देने का सवाल था इस पर मोहन भागवत के हाथ बंधे हुए थे. संघ परिवार और बीजेपी दोनों के भीतर एक तरह से हेरफेर किया गया था. जिस तरह से यह सब हो रहा था, उससे आडवाणीजी बहुत परेशान थे. पहली बार चीजें पारदर्शी तरीके से नहीं हो रही थीं.”

वास्तव में, जिस तरह से मोदी ने सुर्खियां बटोरी, आडवाणी कभी उसकी बराबरी नहीं कर सके. कुलकर्णी बताते हैं, कि आडवाणीजी इस बात से दुखी थे कि उन्होंने पार्टी में जिन लोगों को तैयार किया था वे किस तरह की ओछी राजनीति कर रहे थे. इस समय में मोदी का खुद का खुलकर प्रचार करना भी उन्हें रास नहीं आ रहा था, हालांकि जब भी पत्रकार उनसे पूछते तो कहते कि बेटा जब पिता से अच्छा करने लगता है तो पिता के लिए गर्व की बात होती है. इसी तरह वह इस तथ्य को समझाते थे कि मोदी सुर्खियां बटोर रहे हैं. लेकिन वह यह भी देख सकते थे कि यह सब बनाया गया था. यह स्वाभाविक नहीं था, सहज नहीं था बल्कि प्रबंधित था. वास्तव में, वह यह पहचानने वाले पहले व्यक्तियों में से एक थे कि मोदी इवेंट मैनेजमेंट में बहुत अच्छे थे.

आडवाणी की तरह, भागवत भी अब बीजेपी में कुछ कर पाने के बजाय किनारे से घटनाक्रमों को देख रहे थे. मोदी ने अपनी जनप्रिया छवि से और षड़यंत्रों से संघ को प्रभावित कर दिया था. भागवत, जिनकी अब तक बीजेपी की घटनाओं को प्रभावित करने में भूमिका थी, शांत हो गए थे.

संघ परिवार द्वारा मोदी की जीत का समर्थन करके भागवत की इच्छा निश्चित रूप से बीजेपी के निर्णयों में आरएसएस के वर्चस्व को स्थापित करने का एक प्रयास था पर जो उनके द्वारा पूर्व प्रदर्शित आक्रामक तरीके से उल्लेखनीय रूप से भिन्न थी. आरएसएस के वरिष्ठ नेता बताते हैं कि "इस बदलाव का एक कारण मोहनजी की चिंता में निहित था क्योंकि 2010 के बाद से हिंदू आतंकवाद की जांच शुरू हो गई थी जो उन तक भी पहुंच सकती थी."

इस साल सितंबर में कारवां को दिए एक इंटरव्यू में आरएसएस के पूर्व प्रचारक यशवंत शिंदे ने दावा किया कि भागवत को सूचित किया गया था कि उनके कैडर बमबारी करने वाले थे. शिंदे ने कहा, "यह संभव नहीं कि मोहन भागवत को पता नहीं था." जब संघ के किसी व्यक्ति ने शिंदे से पूछा कि क्या वह भागवत से बात करना चाहते हैं तो वह बताते हैं कि उन्होंने इस तरह जवाब दिया:

मैंने उनसे कहा, “आप ही बताइए अब उनकी सुनता कौन है? बीजेपी उनकी नहीं सुनती. अगर आपको लगता है कि वे ऐसा कर सकते हैं अगर आप में दम है तो पहले दो लोगों को बाहर निकाल दें, हरे नारायण. हरे नारायण से मेरा मतलब मोदी और अमित शाह से था. मराठी में नारायण का मतलब गुंडे होता है. फिर वे चुप हो गए, मानो बीजेपी के कार्यकर्ता इन्हीं दोनों की सेवा कर रहे हों.''

उन दिनों मोहनजी की मानसिक स्थिति को अशोक बेरी और अशोक वार्ष्णेय जैसे संघ के पदाधिकारियों के साथ क्या हो रहा था, इस दृष्टिकोण से देखें. बेरी आरएसएस की केंद्रीय कार्यकारी समिति के सदस्य होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के आधे हिस्से में संघ संचालन के प्रभारी प्रचारक थे. जबकि वार्ष्णेय कानपुर प्रांत -प्रशासनिक क्षेत्र के प्रभारी प्रचारक थे. 10 जुलाई 2010 को इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार "सीबीआई का दावा है कि अशोक वार्ष्णेय और अशोक बेरी उत्तर प्रदेश में आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी, जिनसे मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ में विस्फोटों के सिलसिले में पूछताछ की गई थी,उन दोनों ने स्वीकार किया है कि वे अजमेर विस्फोट के एक आरोपी देवेंद्र गुप्ता के संपर्क में थे. द हिंदू कि एक रिपोर्ट ने कानपुर में एक अन्य मामले में वार्ष्णेय की संभावित संलिप्तता का संकेत दिया था," जहां कुछ समय पहले कथित तौर पर बम बनाते हुए गलती से एक बम फटने से कुछ लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

2006 और 2008 के बीच भगवा आतंक के सात मामलों की जांच की जा रही थी, इसमें 2006 और 2008 के बीच बम विस्फोटों की एक श्रृंखला शामिल थी, जिसमें सौ से अधिक लोग मारे गए थे. इन मामलों में प्रमुख थे 8 सितंबर 2006 को मालेगांव विस्फोट, 18 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रेस विस्फोट, 18 मई 2007 को मक्का मस्जिद विस्फोट और 11 अक्टूबर 2007 को अजमेर शरीफ विस्फोट.

24 फरवरी 2007 को पानीपत के बाहर महराणा गांव में समझौता एक्सप्रेस ट्रेन विस्फोटों के पीड़ितों के ताबूतों के बगल में बैठ मुस्लिम निवासी. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में सिलसिलेवार हुए बम विस्फोटों ने देश को हिलाकर रख दिया था. इसमें आरएसएस के कई सदस्यों के शामिल होने का आरोप था. मनन वात्स्यायन/एएफपी/गैटी इमेजिस

दिसंबर 2010 में आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार से मक्का मस्जिद बम विस्फोट के सिलसिले में केंद्रीय जांच ब्यूरो की पूछताछ ने जांच को नागपुर तक पहुंचा दिया. लंबे समय तक आरएसएस के सदस्य रहे असीमानंद से सीबीआई की पूछताछ के दौरान यह बात सामने आई थी. असीमानंद को नवंबर 2010 में भगवा आतंकवाद के कई मामलों की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

असीमानंद ने बाद में कारवां को बताया कि भागवत को आतंकवादी हमलों की जानकारी थी:

सूरत में आरएसएस के एक सम्मेलन के बाद भागवत और इंद्रेश कुमार सहित संघ के वरिष्ठ नेता, जो अब संगठन की सात-सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद में हैं. इन्होंने गुजरात के डांग में दो घंटे की ड्राइव कर एक मंदिर की यात्रा की जहां असीमानंद रह रहे थे, मंदिर से कई किलोमीटर दूर नदी के किनारे लगे एक तंबू में भागवत और कुमार की मुलाकात असीमानंद और उसके साथी सुनील जोशी से हुई. जोशी ने भागवत को भारत के आसपास कई मुस्लिम ठिकानों पर बमबारी करने की योजना की जानकारी दी. असीमानंद के मुताबिक, आरएसएस के दोनों नेताओं ने मंजूरी दे दी और भागवत ने उनसे कहा, "आप इस पर काम कर सकते हैं."

ठीक इसी समय मोदी ने संघ परिवार को जीतने के लिए अपना ऑपरेशन शुरू कर दिया और उन्हें भविष्य के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया था, जबकि भागवत की स्थिति तेजी से निराशाजनक होती जा रही थी. ऐसा लग रहा था कि भगवा आतंकवाद के मामलों की जांच देर-सबेर उन तक पहुंच ही जाएगी. आरएसएस के वरिष्ठ नेता याद करते हुए बताते हैं, “संघ के सभी पदाधिकारी डरे हुए थे. चारों ओर दहशत का माहौल था. उस समय जीतने की क्षमता ही एकमात्र ऐसी चीज थी जिसके बारे में हर कोई चिंतित था. व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की कोई गुंजाइश नहीं थी. जब मोदी का रथ गुजरात में आगे बढ़ा तो संघ परिवार में 2014  के चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीद जगी. अब मोहनजी के पास उनको समर्थन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

इसलिए, जब 13 सितंबर 2013 को आगामी आम चुनाव के लिए पार्टी के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार पर अंतिम निर्णय लेने के लिए बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक हुई, तो सभी को यह पता लग गया था कि सब कुछ पूरी तरह से उस व्यक्ति पर निर्भर करता है जो उन्हें कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से सत्ता हासिल करने में मदद करेगा. मोदी में चुनाव जीतने के सारे गुण थे: कार्य करने की इच्छा, आकस्मिकताओं से निपटने की क्षमता, चुनावी लड़ाई जीतने के लिए आवश्यक संसाधनों को जुटाने की क्षमता और समाज में गहरा ध्रुवीकरण पैदा करने की क्षमता. उनकी सरकार अब तक आतंकी मामलों में आरोपी आरएसएस कार्यकर्ताओं के लिए वरदान रही है. अप्रैल 2018 में, एक विशेष एनआईए अदालत ने सभी आरोपी आरएसएस के लोगों को बरी कर दिया-असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता और लोकेश शर्मा को कुछ गवाहों के मुकर जाने के बाद ठोस सबूत के अभाव में मक्का मस्जिद मामले में आरोप से बरी कर दिया गया. मार्च 2019 में, हरियाणा की एक विशेष एनआईए अदालत ने एक बार फिर सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए समझौता ब्लास्ट मामले में आरोपियों को बरी कर दिया. और 2006 के नांदेड़ विस्फोट मामले में, सीबीआई ने अदालत से शिंदे के गवाह के रूप में पेश होने के आवेदन को खारिज करने के लिए कहा.

जब मोदी ने एक उत्प्रेरक,बाध्यकारी एजेंट बनने का वादा किया, जो संघ परिवार के अलग-अलग घटकों को एक साथ रखेगा उन्हें एकजुट करेगा, तो यह स्वाभाविक ही था कि बोर्ड आडवाणी की आपत्तियों को खारिज करते हुए, मोदी का पार्टी के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में अभिषेक करता. 2004 और 2009 में लगातार चुनावी हार के बाद वह सत्ता हासिल करने की तलाश में निकल पड़ा.

भागवत के नेतृत्व की कमजोरी इसी समय स्पष्ट हो गई. आरएसएस प्रमुख ने अभी भी भविष्य की कार्रवाई के लिए कोई दृष्टि विकसित नहीं की और यह मान लिया कि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नामांकित होने के बाद से ही नागपुर में उन्हें प्रणाम करेंगे, जैसा कि अतीत में प्रथा थी. लेकिन अभियान की शुरुआत से ठीक पहले मोदी की उपेक्षा ने उन्हें पागलों की तरह रास्ते खोजने को मजबूर कर दिया, जैसे कि अपने गौरव को बहाल करने के लिए अरुण शौरी से मदद मांगना. लेकिन इससे उनकी स्थिति और भी खराब हो गई; एक निजी उपेक्षा सार्वजनिक अपमान बन गयी. ऐसा लगता है कि यहां से घटनाओं की दिशा पूरी तरह से भागवत के हाथों से फिसल गई.

2014 में मोदी ने खूब ज़ोर-शोर से चुनाव अभियान चलाया. पूरा संघ परिवार एक विशाल चुनाव मशीन में बदल गया, जिसकी देखरेख उनके सबसे भरोसेमंद सिपहसालार कर रहे थे. स्वयंसेवकों एवं प्रचारकों ने पूरे जोश-खरोश से इसमें भाग लिया. बीजेपी के इतिहास में पहली बार उसे लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला है. एक ऐसा तथ्य जिसने संघ परिवार में मोदी के कद को बहुत ऊंचा बना दिया.

इस नए मिजाज को भांपते हुए और आतंकी जांचों के तले दबे हुए भागवत ने बीजेपी को नियंत्रित करने की अपनी इच्छा को चुपचाप छोड़ दिया. इसके बजाए उन्होंने एक ऐसी भूमिका में कदम रखा है जिसे एक गौरवशाली स्वयंसेवक के रूप में वर्णित किया जा सकता है. इस बीच, संघ परिवार के नेता के रूप में मोदी ने हिंदू राष्ट्र की स्थापना के अपने पोषित लक्ष्य को पहले से कहीं अधिक करीब ला दिया है. फिर भी, भागवत का इस नई व्यवस्था में फिट होना एक ऐतिहासिक समझौता है. सरसंघचालक की स्थिति पहले इतनी हाशिए पर कभी नहीं रही, जितनी मोदी के भारत में हो गई है.

संघ परिवार में परंपरागत रूप से सरसंघचालक का स्थान ऊंचा रहा है, लेकिन भागवत संतुष्ट हो गए. सोनाली पाल चौधरी/नूर फोटो/गैटी इमेजिस

भागवत के बयान और भाषण केवल एक ही उद्देश्य पूरा करते हैं : मोदी को बढ़ाना. इस वर्ष दिए गए विजयदशमी के भाषण में, उन्होंने मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण को ही दोहराया जो अन्य बातों के अलावा, महिलाओं के सम्मान के बारे में था. भागवत ने कहा, "महिलाओं को काम करने की आजादी और सभी क्षेत्रों में समान अधिकार देना अनिवार्य है. इसलिए, अपने परिवारों के भीतर परिवर्तन की शुरुआत करते हुए, हमें इसे संगठन के माध्यम से समाज तक ले जाना होगा. जब तक महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक देश की प्रगति के लिए किए गए प्रयास सफल नहीं होंगे.” इसी समय मोदी और भागवत के भाषण के बीच बिलकिस बानो के बलात्कारियों को रिहा कर दिया गया. भागवत ने इसी तरह हाशिए पर पड़े पसमांदा मुसलमान लोगों के उत्थान के लिए मोदी के आह्वान का पालन किया है. भागवत ने तुरंत ही अगस्त में मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ एक बैठक की और 22 सितंबर को एक मस्जिद का दौरा किया.

2019 में मोदी की शानदार जीत ने भागवत के खोए हुए रुतबे को फिर से हासिल करने की क्षीण संभावना को भी खत्म कर दिया. शौरी कहते हैं, "अब भागवत आरएसएस के लिए एक अलग पहचान भी नहीं रख सकते. आज आरएसएस चुनाव उद्देश्यों के लिए बीजेपी का सहायक बन गया है. धन की प्रधानता हो गई है. एक मित्र ने आरएसएस के बारे में बताया : सूचना आई, सोचना बंद.” 

यह वाक्य उस परिवर्तन को बताता है जिससे आरएसएस भागवत के रहते गुजर रहा है. प्रचारकों के लिए मुआवजा, उनके स्पष्ट वित्तीय सुधार और जिला स्तर तक आरएसएस के विशाल कार्यालयों के निर्माण देखने लायक हैं. शौरी बताते हैं, "जो लोग हाशिए पर हैं वे बहुत आसानी से खुश हो जाते हैं कि राज्य उन्हें क्या तवज्जो दे रहा है. वे वे अब शासक हैं."

मोहन भागवत ने एक बार राम जन्मभूमि मुद्दे के कभी भी हल होने के विचार की खिल्ली उड़ाई थी और जोर देकर कहा था कि यह वीएचपी की एक सतही व्यस्तता है. मंदिर बनाने के पक्ष में 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मोदी के संघ के सपनों को पूरा करने के विचार को और आगे बढ़ाया. 5 अगस्त 2020 को मोदी ने मंदिर की नींव रखते समय भागवत को अपने पास बैठने की अनुमति देकर इस सपने में आरएसएस प्रमुख को शामिल होने दिया. भागवत ने कहा, "आज पूरे देश में खुशी की लहर है. सदियों से चली आ रही उम्मीदों के पूरा होने पर खुशी है. सबसे बड़ा आनंद उस आत्मविश्वास की स्थापना से है जो  भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कम पड़ रहा था.''

शिलेदार बताते हैं, "जब भागवत सरसंघचालक बने, तो संघ और बीजेपी के कई लोगों ने मुझसे पूछा कि वह किस तरह का नेतृत्व प्रदान करेंगे. मैंने तब उन्हें जो बताया था, वह अब सही साबित होता दिख रहा है : कि वह एक औसत गुणों वाले व्यक्ति हैं और वह थोड़े से दबाव के आगे ही झुक जाएंगे."

 (अनुवाद : दीप्ति)