कोविड महामारी के मद्देनजर कुंभ को सीमित रखना चाहते थे त्रिवेंद्र सिंह रावत, बीजेपी ने छीन ली मुख्यमंत्री की कुर्सी

2019 में एक बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से कहा कि महाकुंभ बिना किसी “विवाद” के होना चाहिए. भारत भर में कोविड-19 महामारी के मद्देनजर त्रिवेंद्र कुंभ को सीमित और प्रतीकात्मक रखना चाहते थे लेकिन इसके चलते उनके और अखाड़ों के बीच तनाव पैदा हुआ और अंततः उनको इस्तीफा देना पड़ा. पीआईबी
11 May, 2021

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (एबीएपी) के महंतों और हरिद्वार महाकुंभ से जुड़े अधिकारियों के हुई बातचीत से पता चलता है कि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को मार्च 2021 में इसलिए रातोंरात पद से हटाया दिया गया क्योंकि वह महाकुंभ का आयोजन सीमित स्तर पर करने के पक्षधर थे.

कम से कम पांच महंतों और बीजेपी के दो नेताओं ने पुष्टि की है कि एबीएपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उत्तराखंड के कुछ कैबिनेट मंत्री चाहते थे कि उत्तराखंड कोविड​​-19 प्रतिबंधों को ताक में रख कर महाकुंभ की "भाव्य" मेजबानी करे लेकिन त्रिवेंद्र का जोर त्योहार को "प्रतीकात्मक” रूप से मनाने पर था. महंतों के साथ बातचीत से यह भी पता चला है कि ज्योतिषों और तांत्रिकों द्वारा पंचाग की गणना के आधार पर कुंभ को 2021 में कराया गया वर्ना 12 साल में होने वाला यह कुंभ 2022 में होना तय था.

दो दशक से अधिक का राजनीतिक अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने मुझे बताया कि कोविड-19 महामारी के बीच में पूर्ण कुंभ की मेजबानी करना राजनीतिक और आर्थिक निर्णय था. वरिष्ठ नेता ने उस घटनाक्रम को भी उजागर किया जिसके कारण त्रिवेंद्र को हटाया गया. उन्होंने कहा, “कुंभ को इसलिए होने दिया गया क्योंकि अगले आठ महीने बाद उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं. चुनाव से ठीक एक साल पहले सहयोगियों को नाराज करने का कोई मतलब नहीं था.” सहयोगियों से वरिष्ठ नेता का तात्पर्य अखाड़ों से है जिनके उग्र साधुओं का हिंदी पट्टी के हिंदुओं पर व्यापक प्रभाव होता है. उन्होंने समझाया कि कुंभ को टालना अखाड़ों के महंतों के लिए कमाई और समर्थन का भारी नुकसान होता. इन महंतों की उत्तर प्रदेश की जनता के बीच भारी पहुंच है. उन्होंने कहा कि कुंभ का कुल कारोबार हजारों करोड़ रुपए का होता है.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि 2019 में हुई एक बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुख्यमंत्री रावत से कहा था कि महाकुंभ एक प्रतिष्ठित हिंदू त्योहार है और इसकी “तैयारियों को लेकर अखाड़ों को कोई परेशानी नहीं आनी चाहिए और बिना किसी “विवाद” के महाकुंभ का आयोजन होना चाहिए. बीजेपी के नेताओं और अखाड़ों के महंतों के साथ हुई बातचीत से पता चलता है कि रावत और अखाड़ों के बीच की तनातनी में रावत को अपनी गद्दी गंवानी पड़ी. बीजेपी के इन नेताओं और महंतों ने बीजेपी और आरएसएस के कोपभाजन बनने के डर से नाम न जाहिर करने की शर्त पर मुझसे बात की. जब मैंने उत्तराखंड बीजेपी के प्रवक्ता मुन्ना सिंह चौहान से पूछा कि क्या कुंभ के कारण पूर्व मुख्यमंत्री को किनारे कर दिया गया था, तो उन्होंने मुझसे कहा कि ऐसी आपकी "धारणा में दम हो सकता है", और हो सकता है कि अखाड़ों ने इसको लेकर शिकायत की हो.

सरकारी संस्था कुंभ मेला बल के अनुसार, 14 जनवरी को शुरू होने से लेकर 27 अप्रैल को समाप्ती के बीच गंगा में पवित्र स्नान के लिए कुल 91 लाख तीर्थयात्री हरिद्वार आए. रिपोर्टों के अनुसार, शामिल हुए तीर्थयात्रियों में कम से कम 60 लाख लोग अप्रैल में एकत्र हुए. कुंभ का प्रमुख कार्यक्रम शाही स्नान 11 मार्च से शुरू होकर, जब भारत कोविड 19 संक्रमण की दूसरी लहर की चपेट में था, 27 अप्रैल तक, जब संक्रमण के मामलों में बेहिसाब बढ़ोतरी हो रही थी, 48 दिनों तक चला. 27 अप्रैल तक भारत में 360927 नए कोविड-19 मामले दर्ज किए गए थे. 12 अप्रैल को दूसरे शाही स्नान के दिन 35 लाख लोग एक ही दिन शहर में दाखिल हुए, यह चौंकाने वाला आंकड़ा है. 

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि विशेषज्ञ और मीडिया कुंभ को सुपर-स्प्रेडर कह रहे हैं. पहले शाही स्नान के दिन 11 मार्च को उत्तराखंड में 69 मामले दर्ज किए गए थे. 27 अप्रैल तक कोविड-19 के नए मामले बढ़कर 5703 हो गए. 2 मई तक उत्तराखंड में भारत की कुल कोविड-19 मौतों का हिस्सा 2.73 प्रतिशत था जबकि यहां की आबादी देश की कुल आबादी का 0.8 प्रतिशत है. महाकुंभ ने उत्तराखंड में न केवल संक्रमण दर को बढ़ाया है बल्कि इसे देश के एक छोर से दूसरे छोर तक फैलाया भी है.

संक्रमण के फैलाव ने शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों दोनों को प्रभावित किया है. मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के ग्यारसपुर में कुंभ से लौटने वाले 61 में से 60 लोग यानी 99 प्रतिशत लोग कोविड-19 पॉजिटिव हो गए, जबकि ओडिशा के कटक शहर में कुंभ से लौटे 43 प्रतिशत लोग पॉजिटिव हुए. राज्य ने कुंभ से लौटने वाले कम से कम 11 अन्य पॉजिटिव मामले दर्ज किए. ओडिशा के एक छोटे से गांव ढालपुर में जब एक व्यक्ति महाकुंभ से बीमार होकर लौटा तो कोई भी उसका दाह संस्कार करने आगे नहीं आया. लेकिन दिल्ली सहित कई भारतीय राज्यों में कुंभ से संबंधित संक्रमणों का कोई डेटा नहीं है और इसलिए इसके प्रभाव को निर्धारित करने का कोई तरीका नहीं है.

वर्तमान मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत, जो आरएसएस के प्रचारक रहे हैं, ने लगातार इस बात से इनकार किया है कि कुंभ सुपर स्प्रेडर घटना थी. जब मैंने कुंभ मेला अधिकारी दीपक रावत से बात की, जो उत्सव के नोडल अधिकारी थे, तो उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि कोविड-19 की दूसरी लहर में उछाल लाने में महाकुंभ का हाथ है.  

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद या एबीएपी देश के सभी प्रमुख अखाड़ों का सर्वोच्च निकाय है. फिलहाल इसमें हिंदू संत, साधुओं और तांत्रिकों के 13 अखाड़े हैं. किन्नर अखाड़ा को अभी तक पूरी तरह से एबीएपी द्वारा मान्यता नहीं दी गई है. जूना अखाड़ा और निर्वाणी अखाड़ा दो सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली अखाड़े हैं. प्रत्येक अखाड़े का नेतृत्व एक महंत करता है, जिसे मोटे तौर पर मुख्य पुजारी या आध्यात्मिक सलाहकार कहा जाता है. निरंजनी अखाड़े के नरेंद्र गिरि एबीएपी के अध्यक्ष हैं, जबकि जूना अखाड़े के हरि गिरि इसके महामन्त्री. ऐसेटिक गेम्स : साधू, अकाड़ा एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू वोट पुस्तक के लेखक धीरेंद्र झा के अनुसार, एबीएपी की स्थापना ही कुंभ त्योहार को करवाने के लिए हुई है. इसमें सभी अखाड़ों के प्रतिनिधि हैं जो संबंधित राज्य सरकारों के साथ-साथ कुंभ को कैसे और कब आयोजित किया जाएगा इस पर विचार करते हैं.

हिंदू साधु और भक्त 11 मार्च को कुंभ के दौरान पहले शाही स्नान में भाग लेते हुए, जबकि देश में कोविड-19 की दूसरी लहर ने जोर पकड़ लिया था. अनुश्री फणनवीस/ रॉयटर्स

नरेंद्र ने मुझे बताया कि 2019 में उनकी अध्यक्षता में एक बैठक बुलाई गई थी जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत, सभी 13 अखाड़ों के महंतों, मेला अधिकारी और हिंदू ज्योतिषी मौजूद थे. नरेंद्र ने कहा कि उस बैठक में ज्योतिष विद्वानों ने पंचांग पढ़ा और यह निर्णय लिया गया कि 2022 के बजाय 2021 में महाकुंभ आयोजित किया जाएगा. जनवरी 2020 में भारत में नोवल कोरोनावायरस का पहला मामला दर्ज हुआ था और इसके कुछ ही दिनों बाद 10 फरवरी 2020 को उत्तराखंड सरकार ने शाही स्नानों की तारीखों की घोषणा कर दी.

महंतों ने मुझे बताया कि पिछले डेढ़ साल में कुंभ को लेकर 300 से अधिक बैठकें हुई हैं. 2020 की शुरुआत में हुई बैठकों में यह प्रस्ताव किया गया था कि कुंभ की तैयारी महामारी के भयानक खतरों के बावजूद आगे बढ़ती रहनी चाहिए. नरेंद्र ने कहा, "यह निष्कर्ष निकाला गया कि कुंभ मेले की तैयारी की जाएगी. अगर मामले बढ़ते हैं तब देखा जाएगा." जूना अखाड़े के प्रवक्ता नारायण गिरी ने बताया कि उन्होंने कुंभ की तैयारियों से संबंधित कम से कम 50 बैठकों में भाग लिया और उन्हें यह स्पष्ट हो गया था कि "सरकार कुंभ मेले को स्थगित करने की कोशिश कर रही थी." उन्होंने कहा, "कुछ विदधर्मी लोग जो धर्म में विश्वास नहीं करते और कम्युनिस्ट मानसिकता के हैं, वे कोविड-19 का बहाना बना रहे थे ... वे कुंभ मेले में बाधा डालना चाहते थे."

नारायण ने कहा, “अंत तक यह अनिश्चित था कि कुंभ होगा या नहीं. उत्तराखंड सरकार के इरादों से ऐसा लग रहा था कि वह कुंभ को रोकना चाहती है. नारायण ने कहा कि राज्य सरकार चाहती थी कि वह "दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी नियम" का पालन कराए. इसके बाद अधिकांश महंतों ने कार्यक्रम को छोटा करने पर विचार करना शुरू कर दिया. नारायण ने बताया, "लेकिन महामंक्त्री जी (जूना अखाड़े के हरि गिरी) ने कहा हमारी परंपराओं और संस्कृति का विधिवत पालन किया जाना चाहिए और कुंभ ठीक ढंग से होना चाहिए.”

इसके बाद दिसंबर 2020 में एबीएपी ने उत्तराखंड सरकार के रुख पर कड़ी आपत्ति जताते हुए एक बयान जारी किया. उन्होंने घोषणा की कि यदि उत्तराखंड सरकार सहयोग नहीं करती है, तो अखाड़े स्वयं कुंभ का आयोजन करेंगे. समाचार एजेंसी एएनआई ने दिसंबर 2020 में नरेंद्र के हवाले से कहा था कि व्यवस्था बनाना सरकार का कर्तव्य है. उन्होंने कहा था, “अभी तक कोई काम शुरू नहीं हुआ है. हम प्रशासन के रवैए से खुश नहीं हैं लेकिन महाकुंभ मेला 2021 उतना ही भव्य और दिव्य होगा, जितना कि 2010 में हुआ था फिर चाहे उत्तराखंड सरकार सहयोग करे या न करे.”

नारायण ने कहा कि बाद में, "दिसंबर 2020 और जनवरी 2021 में हुई बैठकों में हमें बताया गया कि कुंभ प्रतीकात्मक होगा." बीजेपी के वरिष्ठ नेता, जो इन चर्चाओं के बारे में जानते हैं, ने मुझे बताया कि त्रिवेंद्र ने जोर देकर कहा था कि कुंभ को सीमित रखा जाए. नेता ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ने सभी अखाड़ों को लिखित रूप में अपनी सहमति देने के लिए कहा था कि उन्हें उत्तराखंड सरकार द्वारा सीमित रूप में कुंभ की मेजबानी को लेकर कोई आपत्ति नहीं है ताकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारीे मानक संचालन प्रक्रिया का अनुपालन हो सके. कंभ मेला के इतिहास में पहली बार यह भी प्रस्तावित किया गया था कि प्रवेश करने वाले श्रद्धालुओं को कोविड-19 नेगेटिव रिपोर्ट के आधार पर एंट्री पास जारी किए जाएंगे. लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में आरएसएस और बीजेपी के ऊपर दौंस रखने वाले अखाड़ों की जीत हुई. नारायण ने कहा, "पिछले मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा था कि कुंभ मेले के दौरान कोरोनोवायरस नियमों का पालन किया जाना चाहिए लेकिन जब तक कुंभ शुरू होता तब तक मुख्यमंत्री को बदल दिया गया."

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त्रिवेंद्र का जन्म और पालन पोषण उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में हुआ. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ, राष्ट्रीय-सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और भारत के रक्षा प्रमुख बिपिन रावत एक ही जिले से हैं. त्रिवेंद्र 1979 से 2002 तक आरएसएस के सदस्य रहे और 2000 में राज्य गठन के बाद उत्तराखंड क्षेत्र और बाद में उत्तराखंड राज्य के संगठन सचिव पद पर रहे. त्रिवेंद्र के करियर से परिचित वरिष्ठ आरएसएस नेताओं ने मुझे बताया कि 2000 में जब नरेन्द्र मोदी उत्तराखंड के प्रभारी नियुक्त बने तो उन्होंने ने त्रिवेंद्र को उनकी इच्छा के विरुद्ध डोईवाला निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए कहा. इस सीट पर त्रिवेंद्र 2017 तक काबिज रहे. उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावें में त्रिवेंद्र ने वर्तमान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के डिप्टी के रूप में भी काम किया था.

त्रिवेंद्र का निष्कासन तीन दिनों तक चले बड़े राजनीतिक नाटक के रूप में देखा गया. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, 6 मार्च 2021 को बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमन सिंह और बीजेपी के उत्तराखंड प्रभारी महासचिव दुष्यंत सिंह गौतम बिना किसी पूर्व घोषणा के देहरादून आए. उन्होंने कहा कि जब गैरसैंड सदन में राज्य विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था त्रिवेंद्र को तत्काल वरिष्ठ नेताओं द्वारा देहरादून बुलाया गया. आमतौर पर सड़क मार्ग से गैरसैंड और देहरादून के बीच की 250 की किलोमीटर की दूरी को तय करने में कम से कम सात घंटे लगते हैं. इस घटना के चश्मदीद रहे बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने बताया, क्योंकि त्रिवेंद्र तलब किए थे इसलिए वह एक विशेष हेलिकॉप्टर पर सवार होकर आधे घंटे के भीतर अपने आवास पहुंचे.

बीजेपी नेता ने कहा कि आधे घंटे की बैठक में त्रिवेंद्र को बताया गया कि बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा उनसे मिलना चाहते हैं. बीजेपी नेता ने मुझे बताया, “मुख्यमंत्री निवास पर रमन सिंह और दुष्यंत गौतम को चाय पिलाते वक्त व्याकुल रावत को यह स्पष्ट हो गया था उनकी 'बदली' होने वाली है.” अगले दिन देर शाम त्रिवेंद्र दिल्ली आए और बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव नड्डा और बीएल संतोष से मिले, जो आरएसएस और बीजेपी के बीच सेतु की तरह हैं. बीजेपी नेता ने मुझे बताया कि यह मुलाकात दिल्ली स्थित नड्डा के आवास पर हुई थी. उन्होंने कहा कि नड्डा और संतोष ने त्रिवेंद्र को सूचित किया कि बीजेपी उनके नेतृत्व में 2022 में आगामी चुनावों में नहीं उतरेगी. यह इस्तीफा दे देने का इशारा था. “इस बारे में कोई चर्चा नहीं की गई थी कि कौन उनकी जगह लेगा.” नेता ने बताया कि त्रिवेंद्र से मिलने से पहले नड्डा ने शाह से मुलाकात की थी. न तो नड्डा और न ही संतोष ने कॉल या ईमेल का जवाब दिया.

9 मार्च को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में चार साल पूरे करने से कुछ दिन पहले त्रिवेंद्र ने इस्तीफा दे दिया. अचानक इस्तीफा देने के पीछे का कारण पूछे जाने पर उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “आपको यह जानने के लिए कि ऐसा क्यों हुआ, दिल्ली जाना होगा.”

बीजेपी के वरिष्ठ नेता, जो इन कदमों से अवगत थे, ने मुझसे कहा, “राष्ट्रीय दैनिकों ने उनके इस्तीफे की खबर को फ्रंट पेज पर छापा. कई ने उनकी जगह लेने वाले संभावितों का नाम भी लिया लेकिन उनमें से कोई भी न तो उनकी जगह लेने वाले और न ही उनके इस्तेफे के कारण का अंदाजा लगा पाया.” प्रिंट ने सुझाव दिया था कि "रावत की जगह पर रावत को लाया जाएगा?" लेकिन तीरथ के नाम का उल्लेख नहीं किया था. हिंदुस्तान टाइम्स ने धन सिंह रावत, अनिल बलूनी और अजय भट्ट को इस दौड़ में शामिल बताया, लेकिन उनमें से कोई नहीं बना. आखिरकार 11 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन निर्धारित पहले शाही स्नान से ठीक एक दिन पहले त्रिवेंद्र की जगह पर तीरथ को लाया गया.

10 मार्च को तीरथ के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते ही, उनका पहला आदेश महाशिवरात्रि के दिन एक हेलिकॉप्टर से कुंभ में आए संतों पर पर गुलाब की पंखुड़ियों की बौछार करने का था. उसी दिन बाद में उन्होंने घोषणा की कि कुंभ बिना किसी “रोक-टोक” के चलेगा और फिर उन्होंने अपने पूर्ववर्ती द्वारा कोविड-19 और कुंभ के संबंध में लिए गए निर्णयों को उलट दिया. तीरथ ने कहा, “कोविड-19 के नाम पर किसी को नहीं रोका जाएगा, क्योंकि हमें यकीन है कि भगवान में विश्वास वायरस के डर को दूर करेगा.”

12 अप्रैल को हुए दूसरे स्नान के अगले दिन आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दो दिवसीय कुंभ भ्रमण किया. समाचार रिपोर्टों के अनुसार, बाबा रामदेव, महामंडलेश्वर कैलाशानंद गिरि, महंत रविंद्र पुरी, महामंडलेश्वर बालानंद गिरि और महंत नरेंद्र गिरि सहित विभिन्न महंतों ने नए मुख्यमंत्री की प्रशंसा की और त्रिवेंद्र की आलोचना की. भागवत ने कथित तौर पर उन्हें आश्वासन दिया कि वह तीरथ से बात करके व्यवस्थाओं में और सुधार करेंगे.  

उत्तराखंड कैडर के एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी, जिन्होंने दो महाकुंभों की देखरेख की है, ने मुझे बताया कि कुंभ के बारे में सभी प्रमुख फैसले सीधे केंद्र द्वारा किए जाते हैं. संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय इसे फंड करता है और पीएमओ तैयारियों की देखरेख करता है. बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने भी उनसे सहमति जताई. उनमें से एक ने कहा, “कुंभ में करोड़ों रुपए आते हैं. पूरे भारत के साथ-साथ विदेशों से भी लोग कुंभ देखने आते हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम के साथ-साथ छवि भी कारक है. आरएसएस के वरिष्ठ सदस्य, साथ ही बीजेपी के नेता भी तैयारियों में सीधे तौर पर शामिल हैं.”

बीजेपी प्रवक्ता चौहान ने मुझे बताया कि यह मानना कि त्रिवेंद्र को कुंभ के कारण इस्तीफे के लिए कहा गया "आंशिक रूप से सही" है और ''कुंभ में शामिल होने की बात पर पवित्र संत बंटे हुए थे." उन्होंने कहा कि कुछ संत "उचित प्रतिबंध को ठीक मानते थे, जबकि कुछ चाहते थे कि तीर्थयात्रियों का आवागमन मुक्त हो. यह संभावना है कि उनमें से कुछ ने निवर्तमान सीएम के खिलाफ नाराजगी जताई हो.” उन्होंने सुझाव दिया कि जो कुछ सतह पर दिखाई दे रहा है मुझे उससे परे जाकर देखना चाहिए. “राजनीति वह नहीं है जो दीवार पर लिखी गई है. यह अंदरखाने की चीज है,” उन्होंने मुझसे कहा. चौहान ने कहा, "यह केंद्रीय नेतृत्व द्वारा सामूहिक रूप से लिया गया निर्णय है और निवर्तमान और मौजूदा मुख्यमंत्री, दोनों ही नेता, जमीनी स्तर से उठकर आए हैं. दोनों आरएसएस से जुड़े हैं लेकिन स्थानीय प्रशासन के लिए व्यक्तिगत दृष्टिकोण बहुत मायने रखता है. यह एक कारण हो सकता है कि पार्टी ने किसी अन्य नेता को प्रभारी बनाने का फैसला किया.”

बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने मुझे बताया कि कुंभ को पूरी तरह से धार्मिक आयोजन के रूप में देखना गलत है. "कुंभ बड़ा व्यवसाय है," उन्होंने कहा. ''इसे संतों, साधुओं या तांत्रिकों की धार्मिक मंडली के तौर पर समझने की गलती मत कीजिए. यह कई करोड़ रुपए का बाजार है.” दिगंबर नेगी को बीजेपी नेता और उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का करीबी विश्वासपात्र माना जाता है. नेगी ने बताया, "अगर एक करोड़ लोग भी इस कुंभ में भाग लेने आए हों और कम से कम 3000 रुपए खर्च किए हों, तो मोटामोटी अनुमान लगाएं तो यह 3000 करोड़ रुपए का कारोबार है." बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने मुझे बताया कि कुंभ को रोकने का मतलब उन करोड़ों तीर्थयात्रियों पर अंकुश लगाना है जो यह बड़ी रकम लाते हैं.

लेखक धीरेंद्र झा ने भी इस बात का समर्थन किया. उन्होंने कहा, “कुंभ के दौरान, साधु दान और अनुष्ठानों के नाम पर करोड़ों रुपए कमाते हैं. कुंभ सभी अखाड़ों की कमाई का प्रमुख जरिया है. सिर्फ बड़े महंत ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे साधु भी कुंभ में भंडारा, सत्संग, प्रवचन और प्रसाद से पैसा कमाते हैं.” बीजेपी नेता ने कहा, “अखाड़े 12 साल तक कुंभ का इंतजार करते हैं. वह इतनी आसानी से अपनी कमाई नहीं छोड़ेंगे.”

21 मार्च को अखबारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के कुंभ में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हुए पूरे पृष्ठ के विज्ञापन प्रकाशित किए.

तीर्थयात्रियों द्वारा लाया गया धन केंद्र सरकार द्वारा आवंटित कई सौ करोड़ के अलावा और बड़े निगमों से योगदान अगल होता है. मेला अधिकारी दीपक ने मुझे बताया कि केंद्र सरकार ने 2021 कुंभ के लिए लगभग 700 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. उत्तराखंड की राजनीति को कवर करने का एक दशक से अधिक का अनुभव रखने वाले पत्रकार सुधाकर भट्ट के अनुसार, राज्य सरकार के अनुदान के साथ कुंभ का बजट आसानी से 1000 करोड़ रुपए से अधिक हो जाएगा. बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने यह भी कहा कि उत्तराखंड में उपस्थिति रखने वाले निगमों ने अपने सीएसआर फंड से कई करोड़ रुपए का योगदान दिया. 21 मार्च को, कई राष्ट्रीय दैनिकों ने मोदी और तीरथ के पूरे पन्ने के विज्ञापन प्रकाशित किए जिसमें भक्तों का कुंभ में स्वागत किया गया था और उन्हें बताया गया था कि इसमें भाग लेना "साफ" और "सुरक्षित" है. कुंभ की देखरेख करने वाले अधिकारियों ने मुझे बताया कि आयोजन के प्रचार पर लगभग 15 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने यह भी सुझाव दिया कि महाराज सहित राज्य के कुछ कैबिनेट मंत्रियों ने संघ के समर्थन से पूर्ण कुंभ की पैरवी की. महाराज उत्तराखंड के प्रभावशाली स्वयंभू संत हैं. चुनाव के शपथपत्र के अनुसार, वह 2017 के विधानसभा चुनावों में सबसे अमीर उम्मीदवारों में से थे और पत्नी की संपत्ति सहित उनकी कुल संपत्ति 142 करोड़ रुपए थी. बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने मुझसे कहा, “ऐसी अफवाहें थी कि सतपाल महाराज हरिद्वार में ट्रेड यूनियनों और आरएसएस के साथ मिलकर कुंभ की पैरवी कर रहे थे. अक्सर ऐसी चर्चाएं थीं कि 2020 में लगाए गए लॉकडाउन ने उत्तराखंड में कई लोगों का रोजगार नष्ट कर दिया था और कुंभ उन्हें पुनर्जीवित करने का एक जरिया था.”

भट्ट ने मुझे बताया कि महाराज और त्रिवेंद्र के बीच तनाव था. महाराज ने मार्च 2014 को कांग्रेस छोड़ी थी और उसी वर्ष मई में हुए आम चुनावों से पहले वह बीजेपी में शामिल हो गए थे. दो साल बाद, मई 2016 में कांग्रेस के 9 बागी नेता उत्तराखंड विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी में शामिल हो गए. भट्ट और कई बीजेपी नेताओं ने मुझे बताया कि उत्तराखंड बीजेपी के भीतर "कांग्रेस की यह लॉबी" त्रिवेंद्र के खिलाफ थी. महाराज ने साक्षात्कार के लिए अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया और इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक ईमेल किए गए सवालों के जवाब नहीं दिए. 

त्रिवेंद्र के बर्खास्त होने के समय, कई अखबारों ने यह भी अनुमान लगाया था कि उन्हें इसलिए हटा दिया गया क्योंकि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को उत्तराखंड में उनके नेतृत्व में जीत हासिल करने का भरोसा नहीं था. भट्ट ने सुझाव दिया कि यह त्रिवेंद्र को हटाने का एक कारण हो सकता है. “मुझे लगता है कि त्रिवेंद्र को मजबूरी के बजाय राजनीतिक जोड़-तोड़ के चलते हटाया गया.” उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि कुंभ का फसाद 'ताबूत में आखिरी कील' हो, लेकिन अन्य कारकों ने भी योगदान दिया है. फिर सत्ता विरोध (एंटी इंकमबेंसी) था और उन्हें उत्तराखंड में विभिन्न विधायकों का सहयोग भी नहीं मिल रहा था.”

बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने इसके उलट बात कहते हुए मुझे बताया, “उत्तराखंड के सीएम को किनारे करने के फैसले का ज्यादा लेना-देना उत्तर प्रदेश से है. यह बुनियादी गणित है. 403 सीटों वाली यूपी 70 सीटों वाली उत्तराखंड की तुलना में बीजेपी के लिए अधिक मायने रखती है.” उन्होंने कहा, "उत्तर प्रदेश उत्तराखंड से ज्यादा मायने रखता है, खासकर ऐसे समय में जब बीजेपी के लिए यह जरूरी है कि वह उत्तर प्रदेश में किसी भी हालत में जीत हासिल करे."

22 मार्च को तीरथ सिंह रावत के यह कहने के दो दिन बाद कि "विश्वास वायरस के डर को दूर करेगा," वह कोविड-19 पॉजिटिव पाए गए. वह अगले दिन दिल्ली में मोदी और शाह से मिलने वाले थे.

9 अप्रैल को आरएसएस ने घोषणा की कि भागवत कोविड पॉजिटिव हैं. इससे कुछ दिन पहले ही भागवत ने कुंभ का दौरा किया था. एबीएपी के प्रमुख नरेंद्र को कोविड पॉजिटिव होने के बाद 13 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश यादव, जो नरेंद्र के संपर्क में थे, अगले दिन कोविड पॉजिटिव पाए गए. 15 अप्रैल को हरिद्वार में कोविड-19 के चलते हुई जटिलताओं के चलते निर्वाणी अखाड़ा के महामंडलेश्वर कपिल देव दास का निधन हो गया. नेपाल का पूर्व शाही परिवार यानी कोमल राज्य लक्ष्मी देवी और पूर्व राजा ज्ञानेंद्र भी कुंभ यात्रा के बाद कोविड पॉजिटिव हो गए. और इसी तरह विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार भी पॉजिटिव निकले.

मार्च के अंत तक उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भी बढ़ते संकट पर ध्यान दिया और राज्य सरकार को प्रति दिन पचास हजार परीक्षण करने का निर्देश दिया. 17 अप्रैल को कोविड1919 की विनाशकारी दूसरी लहर और महाकुंभ की बढ़ती आलोचना के बीच और तीन शाही स्नान हो जाने के बाद मोदी ने महंतों से अंतिम स्नान को प्रतीकात्मक रूप से आयोजित करने की अपील की. इसके तुरंत बाद, जूना अखाड़े ने कुंभ से लौटने की घोषणा की, लेकिन निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर अखाड़े, जिन्हें सामूहिक रूप से बैरागियों के रूप में जाना जाता है, ने इसे मानने से इनकार कर दिया. इस स्तर पर भी राज्य सरकार ने भीड़ इकट्ठा होने को सख्ती से प्रतिबंधित नहीं किया. अनुष्ठान के अनुसार, बैरागी अखाड़े ने अंतिम शाही स्नान के दौरान स्नान किया. निर्वाणी अखाड़े के महंत धर्म दास ने आजतक चैनल से कहा कि जूना अखाड़े को कुंभ को खत्म करने का कोई अधिकार नहीं है. उन्हें नेताओं को खुश करना बंद करना चाहिए.” 27 अप्रैल को "प्रतीकात्मक" अंतिम शाही स्नान में 25000 से अधिक लोगों ने भाग लिया.

कुंभ को लेकर हुई तकरार का एक और परिणाम निकला और शायद यह अनपेक्षित था. एबीएपी का विभाजन हो गया. बैरागी अखाड़ों ने साथ मिलकर अचानक अखिल भारतीय वैष्णव अखाड़ा नामक गुट का गठन किया. यह स्पष्ट नहीं है कि आगे होने वाले कुंभ के कार्यों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा. माना जाता है कि कुंभ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है. हरिद्वार, प्रयागराज, नाशिक और उज्जैन के चार हिंदू पवित्र स्थल प्रत्येक 12 साल में एक बार कुंभ की मेजबानी करते हैं.

हरिद्वार में पिछला कुंभ 2010 में हुआ था. महंतों ने मुझे बताया कि 2022 में इसकी मेजबानी करने के बजाय, एबीएपी ने जोर देकर कहा था कि इसे "ज्योतिष शास्त्र," के आधार पर एक वर्ष पहले किया जाना चाहिए. निर्वाणी अखाड़े के महंत रविंद्र पुरी ने बताया कि “बृहस्पति 12 महीनों तक सूर्य चक्र में रहता है. हरिद्वार में कुंभ की मेजबानी के लिए, बृहस्पति को कुंभ राशि में होना चाहिए, जबकि सूर्य को मेष राशि में होना चाहिए. यह केवल 2021 में संभव था, 10 अप्रैल के बाद 2022 में बृहस्पति कुंभ राशि को छोड़ देगा." जूना अखाड़े के नारायण ने कहा कि दिनों का यह अंतराल आदिक मास या अतिरिक्त माह के कारण होता है, जो 12 साल में एक बार आता है. महंतों में से एक के करीबी एक तांत्रिक ने समझाया, “हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने अपने एक अवतार, नरसिंह के रूप में हिरण्यकश्यप नामक एक राक्षस को मारने के लिए एक दिन में अतिरिक्त क्षणों का निर्माण किया था. इकट्ठा होकर वह क्षण मास बन जाते हैं, जिन्हें अक्सर फलेह मास या माश मास कहा जाता है, जिसके कारण कुंभ का आयोजन पहले किया गया."  

नारायण ने मुझे बताया कि पिछले डेढ़ वर्षों में हुई बैठकों में "कुछ खास लोग" थे जिन्होंने सवाल किया कि 12 के बजाय 11 साल में कुंभ क्यों हो रहा है. उन्होंने कहा, "कुछ अधिकारी बार-बार इस बात को उठा रहे थे. तब हरि गिरी महाराज जी ने पंचांग निकाला और पिछले 1000 वर्षों के इतिहास को प्रदर्शित किया.” उन्होंने बताया कि यह पहली बार नहीं है जब कुंभ 11वें वर्ष में हो रहा है. उन्होंने कहा, "एक मां का गर्भ अपने समय पर परिपक्व होता है. इसी तरह कुंभ भी अपने समय पर होता है.” पुरी ने इसकी पुष्टि की और कहा, “जबकि अन्य स्थानों पर कुंभ आमतौर पर 12 साल बाद होता है, यह हरिद्वार कुंभ है जहां हमने हर 83 साल में यह विसंगति देखी है. ऐसा आखिरी बार 1938 में हुआ था.”

लेकिन वाजपेयी सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे शांता कुमार ने कुंभ मेले की मेजबानी के तर्क पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा, "हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है, 'आपात काले, मर्यादा नास्ति,' जिसका अर्थ है कि जब खुद जीवन दांव पर लगा हो, तो सभी नियम टूट सकते हैं."

विदिशा और कटक में पॉजिटिव मामलों की उच्च दर, क्रमश: 99 प्रतिशत और 43 प्रतिशत, केवल एक ही दिन में इन क्षेत्रों में परीक्षण किए गए कुंभ से लौटने वालों पर आधारित थी. यह इन क्षेत्रों में कुंभ से लौटने वालों की कुल संख्या को नहीं दर्शाती है और देश भर से इस संख्या के बारे में कम ही जानकारी है. भारत में कोविड की दूसरी लहर को लाने में इसका कितना हाथ है, फिलहाल इसका कोई आकलन हमारे पास नहीं है.