तबाही का तमाशा

बुलडोजर : भारत में हिंदू राष्ट्रवादी शब्दावली का नया शब्द

13 मई 2022 को नई दिल्ली के श्याम नगर में इमारतों को ढहाता एक बुलडोजर.
संचित खन्ना/हिंदुस्तान टाइम्स
13 मई 2022 को नई दिल्ली के श्याम नगर में इमारतों को ढहाता एक बुलडोजर.
संचित खन्ना/हिंदुस्तान टाइम्स

12 जून 2022 की सुबह, प्रयागराज की एक सामाजिक कार्यकर्ता आफरीन फातिमा ने उस घर को बुलडोज़र से ढहते देखा, जिसमें वह बीस साल से भी ज्यादा समय से रह रही थी. "मैंने इसे यूट्यूब पर लाइव देखा," उन्होंने मुझसे कहा. उनकी मां ने पास ही एक चटाई पर नमाज अदा की.

उनके घर को बुलडोज किए जाने को स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया द्वारा पूरे देश में प्रसारित किया गया था. उत्तर प्रदेश प्रशासन ने दावा किया कि घर अवैध रूप से बनाया गया था, लेकिन फातिमा ने कहा कि विध्वंस राजनीति से प्रेरित था. "यह बदले की कार्रवाई थी," उन्होंने कहा. फातिमा और उनके पिता जावेद मोहम्मद दोनों नरेन्द्र मोदी सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं.

दो दिन पहले ही एक प्रसिद्ध नागरिक अधिकार कार्यकर्ता मोहम्मद को राज्य पुलिस ने गिरफ्तार किया था. पिछले कुछ हफ्तों से, प्रयागराज भारतीय जनता पार्टी की एक राष्ट्रीय प्रवक्ता सहित नेताओं द्वारा पैगंबर मुहम्मद के बारे में अपमानजनक टिप्पणी के बाद विरोध प्रदर्शनों की चपेट में आ गया था. कुछ विरोध हिंसक हो गए थे. पुलिस ने दावा किया कि जावेद दंगों में शामिल था और आंदोलन का "मास्टरमाइंड" था. अपनी गिरफ्तारी के एक दिन बाद, 11 जून की रात लगभग 10 बजे, फातिमा ने कहा कि पुलिस ने परिवार के दरवाजे पर एक पुरानी तारीख का नोटिस चिपका दिया, जिसमें कहा गया कि उनका घर अवैध है और उसे गिरा दिया जाएगा. अगली सुबह बुलडोजर आ गया.

फातिमा ने जोर देकर कहा कि परिवार पिछले 20 सालों से अपने सभी गृह करों का भुगतान कर रहा था और उन्हें किसी भी अवैधता की चेतावनी नहीं दी गई थी. "मेरे पिता को बलि का बकरा बनाया गया था," उन्होंने कहा. "वह विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं थे." फातिमा ने कहा, कई मायनों में, उनके घर को गिराने का मकसद शासन का विरोध करने वाले सभी लोगों को चेतावनी देना था. "यह साफ तौर से मुसलमानों को सबक सिखाने के लिए था."

पिछले साल, विरोध या सांप्रदायिक हिंसा के बाद, भारत ने एक भयानक उपकरण, बुलडोजर तैनात किया है. इसका इस्तेमाल नागरिकों के घरों और संपत्ति को मटियामेट करने के लिए किया जाता है. ज्यादातर मुसलमानों, दंगों या हिंसक विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के आरोपियों के खिलाफ इसका इस्तेमाल होता है. हालांकि अदालत द्वारा उन्हें दोषी ठहराए जाने से पहले ही यह कार्रवाई हो चुकी होती है. यह पैटर्न उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और दिल्ली में देखा गया है. अक्सर, आधिकारिक स्पष्टीकरण यह होता है कि ढहाई गई इमारत राज्य की भूमि पर "अतिक्रमण" या "अवैध निर्माण" है. मानवाधिकार अधिवक्ताओं का कहना है कि यह केवल प्रदर्शनकारियों को डराने और पूरे समुदायों को दबाकर रखकर चुप कराने का एक बहाना है. कानूनी विशेषज्ञों ने इन विध्वंसों को दंडात्मक बताया है. जून में, 12 प्रतिष्ठित भारतीय न्यायविदों ने उस वक्त भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना को लिखते हुए उत्तर प्रदेश में विध्वंस को "सामूहिक अतिरिक्त-न्यायिक दंड" का एक रूप बताया, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है.

तुशा मित्तल कोडा-कारवां फेलो हैं. आपने राजनीति, विकास, महिला और सामाजिक न्याय पर लिखा है. आब का काम तहलका, अल जज़ीरा और वॉशिंगटन पोस्ट सहित अन्य प्रकाशनों में प्रकाशित है.

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