पुलिसिया पाशविकता और राज्य की उदासीनता के बीच पिसते कानपुर के मुसलमान

08 जनवरी 2020
20 दिसंबर को, कानपुर पुलिस ने शहर के बाबू पुरवा इलाके में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला दीं. उस दिन कम से कम बारह लोगों को गोली लगी, जिनमें से चार की मौत हो गई.
एसटीआर/एएफपी/गेटी इमेजेज
20 दिसंबर को, कानपुर पुलिस ने शहर के बाबू पुरवा इलाके में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला दीं. उस दिन कम से कम बारह लोगों को गोली लगी, जिनमें से चार की मौत हो गई.
एसटीआर/एएफपी/गेटी इमेजेज

23 साल के मिस्त्री आफताब आलम कानपुर (उत्तर प्रदेश) के मुस्लिम बहुल इलाके मुंशी पुरवा में रहते थे. 20 दिसंबर को दोपहर 2 और शाम 4 के दरमियान जब आलम नागरिकता (संशोधन) कानून (2019) के खिलाफ जारी एक प्रदर्शन के करीब से गुजर रहे थे, कानपुर पुलिस ने उन्हें गोली मार दी. जिस वक्त आलम को गोली लगी, वह ईदगाह मैदान में बनी बड़ी मस्जिद से निकले ही थे. वह शुक्रवार की नमाज पढ़ने आए थे और फिर बाबू पुरवा की ओर चल पड़े थे. आलम ग्रेजुएट थे लेकिन पांच साल पहले अपने पिता की मृत्यु के बाद, पढ़ाई के साथ-साथ घरवालों की मदद करने के लिए काम करने लगे थे. नमाज के बाद, आलम पिछले दिन के काम की मजदूरी लेने जा रहे थे. मैदान के बाहर एक गली में पुलिस की गोली आकर उनके सीने में धंस गई. उनके परिवार के अनुसार, शाम को उनकी मौत हो गई.

पापड़ बेचकर गुजर-बसर करने वाले 30 साल के रईस खान मुस्लिम बहुल इलाके बेगम पुरवा में रहा करते थे. यह इलाका बाबू पुरवा से सटा है और मैदान से लगा है. उस दिन वह भी ईदगाह मैदान में थे. मैदान में उस दिन शादी थी और वह शाम को उस शादी में वेटरिंग करने वाले थे. वह शादी के लिए बने एक टेंट के अंदर थे जब उन्होंने पहली बार मैदान के बाहर हंगामा सुना. उस शुक्रवार को सीएए के विरोध में मुस्लिम इलाकों की सभी दुकानें बंद थीं. सुबह से ही ईदगाह के आसपास और हर इलाके के रास्तों पर पुलिस तैनात थी. दोपहर की नमाज के बाद मैदान और उसके आस-पास भीड़ जमा हो गई थी. मैंने जिन स्थानीय लोगों से यहां बात की उनका कहना था कि इलाके में स्थिति शांत थी तो भी पुलिस ने गोली चलाई. इसके बाद भगदड़ मच गई और रईस खान घर की दौड़ने लगे लेकिन मैदान से थोड़ी दूर उनके पेट में गोली लग गई. उनके परिवारवालों ने बताया कि छह लोगों के उनके परिवार में वही एकमात्र कमाने वाले थे. अगले दिन शाम को रईस खान की मौत हो गई.

25 साल के मजदूर मोहम्मद सैफ भी बाबू पुरवा में रहते थे. वह बड़े भाई मोहम्मद जाकी के साथ बेगम पुरवा के एक चमड़े के कारखाने में काम करते थे. उस दिन वहां पुलिस मौजूद  तो थी लेकिन बाकी सब आम शुक्रवार की तरह ही था. इन इलाकों में रहने वालों के लिए पुलिस की भारी मौजूदगी कोई नई बात नहीं है. यहां के लोग अपने हर त्योहार को पुलिस के साये में मनाने के आदी हैं. बड़े भाई जाकी के लिए दोपहर का भोजन लेने सैफ घर आए थे और लौटते वक्त नमाज के लिए मस्जिद में रुक गए. वह मस्जिद से इक्के की ओर जा रहे थे और बमुश्किल सड़क पार ही की थी कि उनको गोली लगी. जाकी के अनुसार, उनकी मौत शाम को हुई. गोलियों की चपेट में आए तीनों लोगों को सरकारी लाला लाजपत राय अस्पताल लाया गया. स्थानीय लोग इस अस्पताल को हल्लेट अस्पताल भी कहते. यह अस्पताल इलाके से लगभग सात किलोमीटर दूर है.

एक घंटे के अंदर तीनों परिवार हल्लेट अस्पताल पहुंच गए. तोनों परिवारों ने मुझे बताया कि उनके रिश्तेदारों की मौत बहुत पहले हो चुकी थी लेकिन अस्पताल प्रशासन इस बात को छुपाए रखी. आलम के भाई मोहम्मद सैफ ने बताया कि वह आखरी वक्त में आलम के साथ थे. "डॉक्टरों ने आलम को आईसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) में रखा था लेकिन उसके साथ कोई नहीं था. उसका ऑपरेशन भी नहीं किया.” उन्होंने मुझे बताया कि आलम ने 20 दिसंबर की शाम को ही दम तोड़ दिया था और उनका शरीर बिल्कुल ठंडा हो गया था. “उसने सांस छोड़ दी थी. मैंने डॉक्टरों को बताया कि वह मर चुका है लेकिन उन्होंने मुझे बाहर जाकर इंतजार करने को बोला.” डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि आलम का इलाज और जांच हो रही है. परिवार को अगले दिन आलम की मौत की सूचना दी गई.

जाकी ने मुझे बताया कि उन्हें अगले दिन स्थानीय अखबारों से अपने भाई की मौत का पता चला. जबकि डॉक्टर बता रहे थे कि उनके भाई का इलाज चल रहा है. कुछ इसी तरह की बात रईस के पिता शैरीफ खान ने भी बताई. "डॉक्टरों ने कुछ नहीं किया. बस रुई लग दी और टेप लागा दिया था लेकिन कोई इलाज नहीं किया.” रईस के भाई सईद खान ने मुझे बताया कि रईस शनिवार शाम को ही ठंडे पड़ गए थे लेकिन डॉक्टरों ने अगले चौबीस घंटों तक इसकी जानकारी नहीं दी.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

Keywords: CAA NRC police brutality Uttar Pradesh Police protest
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