सीबीआई का संकट मोदी सरकार की राजनीतिक नियुक्तियों का नतीजा

22 नवंबर 2018
उच्च ओहदों पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया गया है जो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के विवादास्पद इतिहास— इशरत जहां और अन्य तीन की फर्जी मुठभेड़ में हत्या सहित अन्य मामलों— को मिटाने के काम में शामिल हैं और सीबीआई में हाल के तख्तापलट के बाद इन नियुक्तियों पर सवाल उठाया जाना चाहिए.
विजयानंद गुप्ता/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस
उच्च ओहदों पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया गया है जो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के विवादास्पद इतिहास— इशरत जहां और अन्य तीन की फर्जी मुठभेड़ में हत्या सहित अन्य मामलों— को मिटाने के काम में शामिल हैं और सीबीआई में हाल के तख्तापलट के बाद इन नियुक्तियों पर सवाल उठाया जाना चाहिए.
विजयानंद गुप्ता/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा और उनके डिप्टी राकेश अस्थाना को रातोरात हटाए जाने और इस संस्थान के राजनीतिकरण के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. इस तख्तापलट पर जारी कानूनी उठापटक में चौंका देने वाले खुलासे हुए हैं. अभी हाल में सीबीआई के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल मनीष सिन्हा ने खुलासा किया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सहित अन्य लोगों ने अस्थाना के खिलाफ जांच में दखल दिया था. सीबीआई के अक्सर राजनीतिक प्रभाव में आकर काम करने की बात को स्वीकारते हुए 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे पिंजरे का तोता कहा था. लेकिन फिलहाल जो चल रहा है, वैसा विवाद सार्वजनिक रूप में शायद ही अब से पहले देखने को मिला है. मीडिया में प्रकाशित सीबीआई के निदेशक की जासूसी करने वाले चार अधिकारियों को गिरफ्तार करते सुरक्षाकर्मियों की फोटो, संस्थान में आई अभूतपूर्व गिरावट को दर्शाता है.

इस विवाद के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के पिछले कामों का साया है- दागदार छवि वाले उनके चहते अधिकारी, नौकरशाह और कानूनी अधिकारियों को दिल्ली के बड़े ओहदो पर रखा गया है. मोदी और अस्थाना का रिश्ता उस वक्त से है जब अस्थाना ने 2002 में गोधरा रेलवे स्टेशन में जलाई गई रेल की छानबीन की थी. उस हादसे में मारे गए 59 लोगों में ज्यादातर कारसेवक थे. अस्थाना ने पड़ताल के नतीजे में कहा था कि रेल को मुस्लिम भीड़ ने सुनियोजित षडयंत्र के तहत जलाया था. परिणामस्वरूप मार्च 2011 में आए एक फैसले में 31 लोगों को दोषी करार दिया गया. हालांकि कई मीडिया रिपोर्टों में इस आधिकारिक दावे पर प्रश्न चिन्ह लगाए गए हैं और रेल के जलने को दुर्घटना बताया गया है.

मोदी के करियर में ऐसे बहुत से राज़ हैं जो उनके विश्वस्त सहयोगियों की मदद से दफन कर दिए गए. राजनीतिक दखल का यह संकट अब व्यापक बन गया है. यह संकट, सीबीआई, गुप्तचर विभाग और सॉलिसिटर जनरल सहित अन्य संवैधानिक पदों में नियुक्तियों के जरिए कानून और न्यायिक संस्थाओं में फैल चुका है. खबरों के मुताबिक वर्मा को पद से हटाए जाने की वजह फ्रांस सरकार के साथ 36 राफेल विमानों की खरीद वाले विवादास्पद करार की पड़ताल करने की उनकी इच्छा को बताया जा रहा है. ऊंचे ओहदो में नियुक्त बहुत से लोग ने मोदी और अमित शाह के विवादास्पद इतिहास को छिपाने का काम किया है और इस लिहाज से ताज़ा विवाद के मद्देनजर इन नियुक्तियों पर सवाल उठाया जाना चाहिए.

2013 में, आम चुनावों के एक साल पहले, मोदी और शाह, गुजरात के आला पुलिस अधिकारी, नौकरशाहों, विधि अधिकारी और सरकार के मंत्रियों के साथ विवादों में फंसे हुए थे. एक चौंकाने वाले स्टिंग ऑपरेशन में गुजरात सरकार के वरिष्ठ अधिकारी और आला पुलिस अधिकारी - इशरत जहां, जावेद शेख, अमजद अली राणा और ज़ीशान जोहर - की कथित फर्जी मुठभेड़ के बारे में सीबीआई की पड़ताल को भटकाने की कोशिशों के बारे में चर्चा करते पाए गए थे. उस मीटिंग का मकसद, सीबीआई जांच को प्रभावित करना, अदालत को धोखे में रखना और आरोपी पुलिस अधिकारियों और मंत्रियों को कानून के शिकंजे से बचाना था.

15 जून 2004 को अहमदाबाद के बाहरी भाग में गुजरात पुलिस की अपराध शाखा के अफसरों ने इन चार लोगों की, यह कह कर हत्या कर दी थी कि ये लोग लश्कर-ए- तैयबा के सदस्य थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे. सितंबर 2009 में अहमदाबाद मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग, ने इस घटना को “फर्जी मुठभेड़” करार दिया था. दो साल बाद मुठभेड़ की जांच कर रही विशेष जांच टीम ने भी इस मुठभेड़ को “फर्जी” करार दिया था, जिसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2011 को यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया था.

राणा अय्यूब तहलका के साथ काम करने बाद एनडीटीवी और आउटलुक पत्रिका की स्वतंत्र स्तंभकार हैं.

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