हैदराबाद नगर निगम चुनावों में बीजेपी को मिली बढ़त सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से ज्यादा टीआरस के कुप्रबंधन और सत्ता के केंद्रीकरण का नतीजा

30 नवंबर को हैदराबाद में जीएचएमसी चुनाव के लिए निजाम कॉलेज मैदान में मतदान सामग्री और मतपेटियां संबंधित अधिकारियों को सौंपते हुए. चुनाव में बीजेपी को मिला फायदा बीजेपी के खुद के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अभियान की तुलना में टीआरएस के नागरिक-कुप्रबंधन और केंद्रीकरण से अधिक हो सकता है. एएनआई फोटो
24 December, 2020

18 दिसंबर को, डेक्कन क्रॉनिकल ने बताया कि तेलंगाना राष्ट्र समिति ने हैदराबाद के मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव अखिल भारतीय मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के समर्थन के बिना चुना था. 1 दिसंबर को हुए ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन या जीएचएमसी के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी बढ़त मिली और टीआरएस को काफी नुकसान हुआ. 150 वार्डों में से, बीजेपी, जो पहले केवल चार वार्डों में जीती थी उसे 48 सीटें मिलीं. सत्तारूढ़ टीआरएस पिछले निकाय चुनावों में 99 सीटों पर जीती थी जो इस बार घटकर 56 हो गई, जबकि एआईएमआईएम ने 44 वार्डों में जीत दर्ज कर अपना पिछला रिकॉर्ड बरकरार रखा. कभी शहर और राज्य की प्रमुख ताकत रही कांग्रेस दो सीटों पर सिमट गई.

टीआरएस के वरिष्ठ अधिकारियों ने कई साक्षात्कारों में दावा किया है कि बीजेपी द्वारा चलाए गए अत्यधिक सांप्रदायिक अभियान के कारण उनका नुकसान हुआ. महापौर चुनाव के लिए उसने यह कहते हुए एआईएमआईएम का समर्थन नहीं लिया कि वह भी सांप्रदायिक पार्टी है. कई विशेषज्ञों ने मुझे बताया कि टीआरएस इसलिए एआईएमआईएम का समर्थन नहीं चाहती है क्योंकि इससे बीजेपी को सांप्रदायिक आधार पर आगे के ध्रुवीकरण के लिए मौका मिल जाएगा. हालांकि, मैंने जिन विश्लेषकों और निवासियों से बात की उनमें से कई लोगों ने कहा कि सामाजिक मुद्दों को उठाने में टीआरएस की विफलता साथ-साथ पार्टी के भीतर सत्ता के केंद्रीकरण के चलते भी उसे नुकासन उठाना पड़ा. इसने स्थानीय सरकार की कार्यक्षमता को प्रभावित किया और बीजेपी को मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरने के लिए प्रेरित किया, यहां तक ​​कि टीआरएस ने भी भारी पैमाने पर दलबदल कर मौजूदा विपक्ष को निष्प्रभावी कर दिया था.

हैदराबाद के 2020 के शहरी निकाय चुनाव अपने इतिहास में सबसे अधिक सांप्रदायिक थे. बीजेपी का अभियान बेइंतहा इस्लामोफोबिक था. बीजेपी के राज्यीय और राष्ट्रीय नेताओं ने कई ऐसे भाषण दिए जो खुलेआम हैदराबाद की बड़ी मुस्लिम आबादी के खिलाफ हिंसा को उकसाते थे. अभियान के दौरान, तेलंगाना के बीजेपी प्रमुख, बंदी संजय ने पुराने शहर पर "सर्जिकल स्ट्राइक" करने का आह्वान किया, ताकि रोहिंग्या शरणार्थियों को जड़ से उखाड़ फेंका जाए जिनमें से कुछ यहां बसते हैं. हैदराबाद के मुस्लिम बहुल इलाके को पुराने शहर के नाम से जाना जाता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ट जिन्हें आमतौर पर योगी आदित्यनाथ के रूप में जाना जाता है उन्होंने भी शहर में प्रचार किया और हैदराबाद का नाम बदलकर "भाग्यनगर" रखने को कहा.

शहर के कई हिस्सों के निवासियों, विशेष रूप से बड़े पैमाने पर मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र के निवासियों ने मुझे बताया कि बीजेपी ने विशुद्ध रूप से सांप्रदायिक आधार पर प्रचार किया था. उत्तरी हैदराबाद के भोलकपुर इलाके के निवासी मोहम्मद मुन्नवर चंद ने बताया, ''बहुत खुलकर तो नहीं, लेकिन युवाओं के बीच सांप्रदायिक भावना बढ़ी है. असदुद्दीन ओवैसी ने मुसलमानों को यह कह कर डरा दिया कि बीजेपी आ रही है और बीजेपी ने भी हिंदुओं के एक वर्ग का ध्रुवीकरण कर दिया है. जिसके चलते टीआरएस की सीटें घट गईं.” लेकिन अकेले सांप्रदायिक तनाव का बढ़ना टीआरएस के नुकसान के पैमाने को स्पष्ट नहीं करता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां चुनाव प्रचार का सांप्रदायिक पहलू बहुत कम था.

जीएचएमसी तेलंगाना में सबसे बड़ा शहरी स्थानीय निकाय है. तेलंगाना के गठन के बाद 2016 में हुए पहले चुनावों में पूर्ण विजय पाने के लिए टीआरएस ने अपना अभियान तेज कर दिया था जिसका उद्देश्य इस सवाल का जवाब देना था कि "हैदराबाद किसका है?" ऐसा इसलिए था क्योंकि भौगोलिक और सामाजिक रूप से शहर का अच्छा-खासा वर्ग तेलंगाना राज्य की मांग का समर्थन नहीं करता था. शहर के मुस्लिम, जिनका प्रतिनिधित्व बड़े पैमाने पर एआईएमआईएम करती है, एकजुट आंध्र प्रदेश के पक्ष में थे.

शहर के निवासी रायलसीमा और तटीय आंध्र को अपना पुश्तैनी निवास बताते हैं. राज्य विभाजन के बाद ये दोनों क्षेत्र आंध्र प्रदेश में आते हैं. तेलंगाना आंदोलन और इससे उभरी टीआरस इन्हें बाहरी लोगों के रूप में देखती थी. तेलंगाना आंदोलन बमुश्किल ही इस हाइटेक शहर, आईटी और वित्तीय सेवा वाले जिले में सेंध लगा पाया. 2016 में 150 में से 99 सीटें जीतकर, टीआरएस ने इस सवाल को सुलझा लिया कि हैदराबाद निर्णायक रूप से किसका था. तेलुगु देशम पार्टी के प्रस्थान का भी राजनीतिक प्रभाव था, जो अब मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश तक सीमित है.

2016 में टीआरएस की जीत के पीछे सस्ते घरों के निर्माण सहित कई लोकलुभावन वादों ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. 2020 में स्थिति अलग थी. शहर के विभिन्न हिस्सों के कार्यकर्ताओं और निवासियों ने मुझे बताया कि सत्ता विरोधी लहर दिखाई दे रही है क्योंकि टीआरएस अपनी कई कल्याणकारी योजनों को अमली जामा पहनाने में नाकाम रही. यहां तक सस्ते घर उपलब्ध कराने की मुख्य योजना भी असफल रही. हैदराबाद के एक संगठन, हाउसिंग एंड टेनुरियल राइट्स के निदेशक मोहम्मद अशफाक ने कहा, "2016 में, टीआरएस ने कम लागत वाले 2बीएचके आवास बनाने के अपने वादे के आधार पर जीएचएमसी में भारी जीत हासिल की थी. हालांकि उसने अपने वादों को पूरा नहीं किया. सरकार ने 2,000 आवास इकाइयों का निर्माण किया है, लेकिन इन्हें अभी तक नहीं सौंपा गया है. यह उन कारकों में से एक है जो इस बार टीआरएस के खिलाफ गए.”

पिछले पांच सालों में अन्य नागरिक मुद्दों ने भी टीआरएस को प्रभावित किया है. मुशीराबाद हैदराबाद का औद्योगिक क्षेत्र है, जहां वजीर सुल्तान तंबाकू और प्रगा टूल लिमिटेड जैसी बड़ी औद्योगिक इकाइयां और धातु और चमड़े की रंगाई की छोटी इकाइयां, कपड़ा व्यापारी और बिस्किट कारखाने हुआ करते थे. मुशीराबाद की कई फैक्ट्रियां कई दीर्घकालिक कारणों से बंद हो गई हैं, हालांकि मजदूर उसी इलाके में रहते हैं. अगस्त में, सरकार ने तेलंगाना अनियंत्रित और अवैध लेआउट नियमितिकरण नियम 2020 जारी किया, जिसे आमतौर पर लेआउट नियमितिकरण योजना (एलआरएस) के रूप में जाना जाता है. इसके तहत, जुर्माने के भुगतान के बाद अनधिकृत भूखंडों और लेआउट को नियमित करने के लिए एक समय सीमा दी गई थी.

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की हैदराबाद समिति के सचिव एम श्रीनिवास रेड्डी ने मुझे बताया कि, "आमतौर पर भी एलआरएस विवादास्पद रहा है, लेकिन महामारी के दौरान और खासकर बाढ़ में जब शहर को भारी नुकसान हुआ था, इसने गुस्से को भड़का दिया. ” इसके अलावा, संपत्ति बेचने या इस पर बैंक ऋण लेने के लिए एलआरएस प्रमाणपत्र अनिवार्य किया गया था. श्रीनिवास ने कहा, "लोगों को अपनी जमीनें नियमित करने के लिए लाखों रुपए की लागत आ रही थी और आर्थिक मंदी के कारण लोगों के पास पैसा नहीं था." उन्होंने कहा, "टीआरएस के खिलाफ बहुत गुस्सा था क्योंकि पार्टी कई मोर्चों पर विफल रही."

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने मुझे बताया कि टीआरएस को नागरिक समस्याओं का जवाब देना भारी पड़ रहा था क्योंकि पार्टी बहुत ज्यादा केंद्रीकृत हो गई थी. श्रीनिवास ने कहा कि हैदराबाद में नागरिक मुद्दों के बारे में ज्यादातर फैसले सीधे मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और उनके बेटे के तारक राम राव द्वारा लिए गए, जो तेलंगाना के शहरी मामलों के मंत्री भी हैं. श्रीनिवास ने कहा, "जीएचएमसी अपनी प्रासंगिकता खो चुकी थी क्योंकि फैसले केटीआर लेते थे." उन्होंने कहा, "टीआरएस के वार्ड सदस्यों के पास अपने वार्ड में कुछ भी करने के लिए कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी." टीआरएस ने मुशीराबाद सर्कल में छह में से पांच वार्डों में अपने पिछले वार्ड सदस्यों को ही मनोनीत किया और पांचों में उसे बीजेपी से हार का सामना करना पड़ा. श्रीनिवास ने कहा, "उनके खिलाफ बहुत गुस्सा था."

यूनाइटेड फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों के महासचिव बीटी श्रीनिवासन, जो बृहद हैदराबाद में आरडब्ल्यूए का प्रतिनिधित्व करने वाला एक निकाय है, ने कहा कि सत्ता के इस केंद्रीकरण का प्रभाव पूरे शहर में दिखाई दे रहा था. उन्होंने कहा कि इस केंद्रीकरण ने टीआरएस को प्रभावी ढंग से कोविड-19 महामारी से लड़ने, मध्य अक्टूबर में आई बाढ़ जिसने शहर को प्रभावित किया और रोजमर्रे के नागरिक मुद्दों को हल करने में विफल कर दिया. श्रीनिवासन ने मुझसे कहा, "यह टीआरएस विरोधी वोट था." उन्होंने कहा कि टीआरएस विरोधी भावनाओं का लाभ बीजेपी को मिला. उत्तर तेलंगाना के दुब्बाक निर्वाचन क्षेत्र में एक लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी की हाल की जीत का उल्लेख करते हुए श्रीनिवासन ने कहा, "दुब्बाक में हुए नुकसान के बाद, लोगों ने विश्वास जताया कि बीजेपी एक प्रभावी विपक्षी पार्टी हो सकती है." मुशीराबाद सर्कल में राम नगर वार्ड से हारने वाले टीआरएस कॉर्पोरेटर विपा श्रीनिवास रेड्डी ने किसी भी कॉल का जवाब नहीं दिया.

रियल एस्टेट एजेंट अंजैया, एलबी नगर वार्ड में रहते हैं, जहां बीजेपी ने जीत दर्ज की है. उन्होंने मुझे बताया कि बाढ़ के दौरान टीआरएस कॉर्पोरेटर अपने निवासियों को राहत प्रदान करने में पूरी तरह से विफल रहे. एलबी नगर मुसी नदी के दक्षिणी किनारे पर है और बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में से एक था. 13 अक्टूबर को मुसी नदी अपने तट को तोड़कर बहने लगी. अंजैया ने कहा, "लगातार बारिश हुई, पूरे इलाके में बाढ़ आ गई, सड़कें टूट गईं और सरकारी अधिकारियों ने कुछ नहीं किया. यहां बहुत गुस्सा था." उन्होंने मुझे बताया कि एलबी नगर में चुनावों में कोई सांप्रदायिक प्रचार नहीं हुआ. "बीजेपी को स्थानीय लोगों ने सबसे विश्वसनीय विपक्षी पार्टी के रूप में देखा." कांग्रेस से लेकर टीआरएस तक के कड़े तेवरों का जिक्र करते हुए उन्होंने मुझसे कहा, “विपक्षी दल या तो खोखले हो गए हैं या केसीआर ने उन्हें खत्म कर दिया. जाहिर है किसी को तो उस जगह को भरने के लिए आना ही था और यह कोई बीजेपी थी.”

अंजैया की तरह, हैदराबाद के कई स्थानीय लोगों ने कहा कि मतदाताओं ने कांग्रेस और टीडीपी को विश्वसनीय विपक्षी दलों के रूप में देखना बंद कर दिया है. "एलबी नगर में मुख्यत: दक्षिणी महबूबनगर, पूर्ववर्ती महबूबनगर, नलगोंडा और रंगा रेड्डी जिलों के लोग रहते हैं. वे ज्यादातर उच्च जाति के रेड्डी और मुन्नूर कापुस, यादव और गौड जैसे ओबीसी समूह से हैं. उनमें से ज्यादातर ने बीजेपी को वोट दिया. लोगों के दिमाग में बीजेपी मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई है,'' एलबी नगर के रहने वाले और एक निजी कॉलेज में प्रवक्ता पुलाकेसी ने मुझे बताया.

मुशीराबाद का वह एकमात्र वार्ड जहां बीजेपी नहीं जीत पाई, वह मुस्लिम बहुल क्षेत्र भोलकपुर है. भोलकपुर में चमड़े की रंगाई, लोहे और प्लास्टिक के काम की कई इकाइयां हैं. भोलकपुर के निवासी चांद ने मुझे बताया कि वह 25 साल से टीडीपी के एक राजनीतिक कार्यकर्ता हुआ करते थे. 2012 में तेलंगाना आंदोलन की ऊंचाई पर, उन्होंने टीआरएस के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की. चांद ने मुझसे कहा, "तेलंगाना में कांग्रेस और टीडीपी खत्म हो रही हैं, जबकि टीआरएस नीचे जा रही है. इसमें कैडर तो हैं, लेकिन सत्ता के केंद्रीकरण का मतलब है कि जमीन पर उसके कार्यकर्ता कुछ नहीं कर सकते."

एनएएलएसआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के राजनीति विज्ञान के एक प्रोफेसर हरथी वागेशान ने मुझे बताया कि बीजेपी ने उन शहरी परिधि वाले वार्डों में बड़े पैमाने पर जीत हासिल की जहां तेलंगाना की ओबीसी और प्रमुख-जाति समुदायों की भारी आबादी है. यही वे समुदाय थे जिन्होंने तेलंगाना आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर टीआरएस का समर्थन किया था. "तेलंगाना के रेड्डियों ने टीआरएस को एक संदेश भेजा कि हनीमून खत्म हो गया है," वागेशन ने मुझे बताया. “वे केसीआर को बता रहे हैं कि उनका गठबंधन अब आगे की ओर बढ़ती तेलंगाना की ओबीसी और मध्यवर्गीय ताकतों के साथ में हैं. यह बीजेपी के पक्ष में काम करने वाला सामाजिक गठबंधन है. ”

हैदराबाद के चुनावी नजारे का अध्ययन वागेशन के मूल्यांकन का समर्थन करता है. शहर की परिधि पर बसे शहर के दक्षिण-पूर्वी वार्ड, जिनमें एलबी नगर, हयात नगर और सरूरनगर, और मुशीराबाद में उत्तर-मध्य वार्ड शामिल हैं, पर बीजेपी ने एकतरफा जीत दर्ज की. मुशीराबाद के निवासी बड़े पैमाने पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और उत्तरी तेलंगाना के ओबीसी समुदाय से हैं. विडंबना यह है कि चुनावी मानचित्र यह भी दर्शाता है कि टीआरएस ने रायलसीमा और तटीय आंध्र के लोगों की एक बड़ी आबादी वाले वार्डों में अच्छा प्रदर्शन किया. शहर के उत्तर-पश्चिमी भाग में, जिनमें कुकटपल्ली भी शामिल है, मुख्य रूप से रायलसीमा और तटीय आंध्र के तेलुगु लोगों के घर हैं. वागेशन ने बताया, "कुकटपल्ली बेल्ट में तटीय आंध्र से तेलुगु लोगों की सघनता 60 प्रतिशत तक है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है. इस क्षेत्र ने टीआरएस को बचा लिया. कुकटपल्ली बेल्ट उन क्षेत्रों में से एक है जो अपनी जनसांख्यिकीय बनावट में काफी हद तक समरूप हैं. जिन क्षेत्रों में विविधता नहीं है, उनमें समुदायों के बीच तनाव भी नहीं है. इन समरूप क्षेत्रों में टीआरएस जीती है.

टीआरएस के प्रतिनिधियों ने इस बात पर असहमति जताई कि उनकी पार्टी के नुकसानों का नागरिक कुप्रबंधन से कोई लेना-देना नहीं है. टीआरएस के सोशल मीडिया सेल के संयोजक मन्ने कृष्णक ने कहा, "हमें लगता है कि बीजेपी का नेरेटिव सांप्रदायिक था और इसी वजह से उन्हें जीत हासिल हुई. बीजेपी और एआईएमआईएम की विचारधाराएं प्रबल हुईं और उन्हें अपने वोट शेयर उसी के अनुसार मिले. एआईएमआईएम ने अपनी सीटें बरकरार रखीं, बीजेपी को फायदा हुआ और जिस पार्टी का सांप्रदायिक कोण से कोई लेना-देना नहीं था, वह हार गई.” कृष्णक ने इस आकलन के बारे में सीधे टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि तेलंगाना के समुदायों ने बड़े पैमाने पर बीजेपी को वोट दिया, जबकि उन लोगों के एक हिस्से, जिनके पुरखे रायलसीमा और तटीय आंध्र से थे, ने टीआरएस को वोट दिया. कृष्णक ने कहा, "ईमानदारी से कहें तो आंध्र के तेलुगु लोगों ने टीआरएस के छह साल के शासन को देखा और खतरा महसूस नहीं किया. उनके व्यवसाय में कोई अड़चन नहीं आई. तेलंगाना आंदोलन एक अलग बात थी, लेकिन उन्हें बाहरी लोगों या बसने वालों के रूप में नहीं देखा जाता है और यह मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया आश्वासन था.”

एआईएमआईएम के प्रतिनिधियों ने यह भी दावा किया कि यह काफी हद तक सांप्रदायिक बयानबाजी थी जिसने चुनाव को आकार दिया था. एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर मुझे बताया, "बीजेपी ने खुलकर सांप्रदायिक कार्ड खेला और उसे इसका इनाम मिला." रायलसीमा और तटीय आंध्र के मतदाताओं के बारे में बोलते हुए, जिन्होंने पहले टीडीपी का समर्थन किया था, उन्होंने कहा, "टीडीपी मतदाताओं ने इस बार बीजेपी को वोट दिया और टीआरएस मतदाताओं के एक वर्ग ने भी भगवा पार्टी को वोट दिया." उन्होंने यह भी दावा किया कि एआईएमआईएम बीजेपी के सांप्रदायिक अभियान को सीधे संबोधित करने की कोशिश कर रहा है. "जब आप राजनीति में हों तो उकसाए जाने पर पलटवार करते हैं," उन्होंने मुझसे कहा. "एमआईएम ने अपने से कुछ नहीं किया, बल्कि बीजेपी की सांप्रदायिकता के जवाब के रूप में करना पड़ा."


तुषार धारा कारवां में रिपोर्टिंग फेलो हैं. तुषार ने ब्लूमबर्ग न्यूज, इंडियन एक्सप्रेस और फर्स्टपोस्ट के साथ काम किया है और राजस्थान में मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ रहे हैं.