पाकिस्तान की पुनर्कल्पना की जरूरत : हुसैन हक्कानी

13 फ़रवरी 2019
जोशुआ रॉबर्ट्स / ब्लूमबर्ग / गैटी इमेजिस
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जनवरी 2019 में पाकिस्तान सरकार ने अमेरिका से हुसैन हक्कानी के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया कथित तौर पर शुरू की. हक्कानी पूर्व राजनयिक हैं जो 1992 से 1993 तक श्रीलंका और 2008 से 2011 तक अमेरिका के राजदूत रह चुके हैं. हक्कानी ने पाकिस्तान के चार प्रधानमंत्रियों के साथ भी काम किया है.

राजनयिक के रूप में हक्कानी का करियर विवादों से दूर नहीं रहा. 2012 में एक न्यायिक आयोग ने उन पर देश के सुरक्षा हितों को हानि पहुंचाने का आरोप लगाया. इसके बाद वे देश छोड़ कर अमेरिका चले गए. 2018 मार्च में पाकिस्तान की संघीय जांच एजेंसी ने हक्कानी के खिलाफ ‘‘अमेरिका में पाकिस्तानी दूतावास में अपने कार्यकाल में आपराधिक विश्वासघात, प्राधिकार का दुरुपयोग और गबन’’ के आरोप में मामला दर्ज किया. माना जा रहा है कि गबन के मामले को प्रत्यर्पण का आधार बनाया गया है.

हक्कानी पाकिस्तानी सेना के मुखर आलोचक हैं और बार-बार ‘‘राज्य की बागडोर डीप स्टेट (अदृश्य ताकत) के हाथों में होने’’ का आरोप लगाते रहे हैं. पाकिस्तान में मिलीटेंसी और विदेशी संबंध पर पाकिस्तान : बिटवीन मॉस्क एंड मिलिट्री और मेगनिफिशंट डिल्यूजन : पाकिस्तान और द यूनाइटेड स्टेट्स एंड एन इपिक हिस्ट्र ऑफ मिसअंडरस्टेंडिंग नाम से दो किताबें लिख चुके हैं. हाल में वे अमेरिका की थिंक टेंक संस्था हडसन के दक्षिण और मध्य एशिया विभाग के निदेशक हैं. पत्रकार हनन जफर के साथ साक्षत्कार में हक्कानी ने आतंकवाद, इस्लामिक चरमपंथ और पाकिस्तान की पुनर्कल्पना की आवश्यकता पर चर्चा की. पाकिस्तान लौटने की संभावना पर हक्कानी कहते हैं, ‘‘जिंदा रह कर राज्य के नैरेटिव (भाष्य) पर सवाल उठाना, लौट कर राज्य के भाष्य का शिकार हो जाने से अधिक समझदारी का काम है.’’

हनन जफर- अपने छात्र जीवन में आप इस्लामिक राजनीतिक संगठन ‘जमात ए इस्लामी’ के युवाओं के संगठन से जुड़े थे. लेकिन हाल के दिनों में आपने सार्वजनिक रूप में चरमपंथी इस्लाम, पाकिस्तान के डीप स्टेट और सेना की अलोचना की है.

हुसैन हक्कानी- मैं, जमात-ए-इस्लामी से कभी नहीं जुड़ा था. हां, मैं करांची विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन ‘इस्लामिक जमात-ए-तलबा’ से जरूर जुड़ा था. (इस्लामिक जमात-ए-तलबा पाकिस्तानी राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी की छात्र शाखा है.) वह चालीस साल पहले छात्र राजनीति का दौर था. जरूरी यह है कि आज मैं क्या सोचता हूं.

हनन जफर मुस्लिम मिरर के सहयोगी संपादक और क्रिकस्वॉर्म के संपादक हैं.

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