“क्रिकेट का आकर्षण इस बात में है कि इसे न केवल नियमों में बंध कर खेलना होता है बल्कि क्रिकेट की भावना से भी खेला जाना चाहिए. खेल निष्पक्ष हो यह तय करने की मुख्य जिम्मेदारी कप्तानों की होती है लेकिन सभी खिलाड़ियों, मैच अधिकारियों से भी इसकी उम्मीद की जाती है.” यह बात लिखी है मैरीलबोन क्रिकेट क्लब के क्रिकेट नियमों की प्रस्तावना में. यह प्रस्तावना खेल की भावना को परिभाषित करती है. सभी खेल "निष्पक्ष" प्रतियोगिताओं की "भावना" पर आधारित हैं. भारत में चुनाव कोई खेल नहीं है लेकिन इस पर भी खेल के कुछ बुनियादी सिद्धांत लागू होते हैं. मसलन जो खेलना चाहते हैं उन सभी के लिए नियम और मैदान एक बराबर होने चाहिए. अगर नियमों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है या पिच को खोद दिया जाता है या अन्य तरह की रुकावटें डाली जाती हैं तो इसे ईमानदार मुकाबला नहीं माना जा सकता.
इस महीने आए पांचों विधानसभा चुनावों के नतीजों पर जो चर्चा देखने को मिली वह ज्यादातर मतदाताओं के व्यवहार और किस नेता ने चुनाव अभियान में क्या कहा इस पर केंद्रित रही. लेकिन जिस ऑपरेटिंग सिस्टम के भीतर जनता की राय तय की जाती है, जो संस्थान चुनाव के लिए जिम्मेदार है उसकी भी जांच की जानी चाहिए. चुनावी फंडिग का तंत्र और चुनाव आयोग और मीडिया की भूमिका को देखने से निराशाजनक निष्कर्ष निकलते हैं. सवाल उठता है कि क्या चुनाव "निष्पक्ष" रहे या कितनी सच्ची "भावना" से हुए.
यहां प्रतिस्पर्धी पार्टियों और उम्मीदवारों ने कितना खर्च किया इसी से शुरू करना बेहतर होगा. चुनावी बॉन्ड, जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं है कि किस तरह का पैसा है, किसके लिए और कहां से आ रहा है, पूर्व की तरह इस चुनाव में ईंधन की तरह था. ऐसा इसलिए हुए कि सुप्रीम कोर्ट ने बॉन्ड को चुनौती देने वाल मामले पर फैसला सुनाने से इनकार कर दिया था. इस मामले में 2017 से फैसला रुका हुआ है. इसलिए ही यह गुप्त वित्तीय साधन भारतीय लोकतंत्र को विकृत करना जारी रखे हुए है. हाल के चुनावों से पहले सरकार के स्वामित्व वाले भारतीय स्टेट बैंक ने 1213 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड बेचे. यह राज्य चुनावों में अब तक की सबसे ज्यादा बॉन्ड बिक्री है और 2019 में हुए आम चुनावों से पहले बेचे गए 3622 करोड़ रुपए के बॉन्ड के बाद दूसरे स्थान पर है.
सूचना अधिकार कार्यकर्ता लोकेश के. बत्रा ने बॉन्ड की बिक्री के बारे में एसबीआई से 19 चरणों में डेटा जुटाया है. उनके विश्लेषण से पता चला कि पिछले चार सालों में बेचे गए नब्बे फीसदी से ज्यादा चुनावी बांड 1 करोड़ रुपए मूल्य के थे. वित्तीय वर्ष 2019-2020 में बेचे गए बॉन्डों का कम से कम तीन-चौथाई सत्तारूढ़ बीजेपी के पास गया है. औसत भारतीय के लिए गंभीर आर्थिक परेशानी के बीच चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा बढ़ाकर खेल के मैदान को और गैरबराबार कर दिया है. विधानसभा क्षेत्रों के लिए जहां पहले 20 से 28 लाख रुपए तक खर्च करने की इजाजत थी वहीं अब इसे 28 से 40 लाख रुपए कर दिया गया है. इससे ज्यादा से ज्यादा खर्चा करने को लोग प्रेरित होते हैं. अगर चुनाव आयोग से किसी सुधार की जरूरत थी तो उनमें से एक यह हो सकता था कि आयोग इस बारे में जरा सोचे कि चुनावी मुकाबलों के लिए बढ़ता खर्च भारतीय लोकतंत्र के लिए किस कदर खतरनाक है. 2019 के आम चुनाव को आधिकारिक तौर पर दुनिया के सबसे महंगे चुनाव के रूप में दर्ज किया गया था. यहां तक कि इसने अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों को भी पीछे छोड़ दिया था. निश्चित रूप से, भारत जैसे बड़े देश के लिए जहां इस कदर गरीबी है आयोग को खर्च की सीमा बढ़ाने से अधिक इस बात पर जोर देना चाहिए था कि ऐसा होना देश के लिए खतरे ही घंटी है.
भारत में चुनाव जिस संस्थागत ढांचे के तहत होते हैं इसकी जांच करते वक्त चुनाव आयोग के कामकाज की पड़ताल भी आवश्यक है. 2021 में स्वीडन स्थित वी-डेम इंस्टीट्यूट ने भारत को "चुनावी निरंकुशता" की श्रेणी में रखा था. हमारे देश के चुनाव आयोग की स्वायत्तता में गिरावट के कारण भारत की रेटिंग गिरी है. 2019 में चुनाव आयोग की भूमिका पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ भी कहने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यह पुरानी रवायत है. 2020 में एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए आंतरिक बैठकों में मुखर रहने वाले एकमात्र चुनाव आयुक्त अशोक लवासा को अगला मुख्य चुनाव आयुक्त न बना कर मनीला के एशियाई विकास बैंक में भेज दिया गया. अब मुख्य चुनाव आयुक्त सतीश चंद्र हैं. ऐसा केवल दूसरी बार ऐसा हुआ है कि किसी गैर-आईएएस अधिकारी को इस शीर्ष पद नियुक्त किया गया है. पिछले साल जून में लवासा के स्थान को भरने के लिए चुने गए सेवानिवृत्त अरूप चंद्र पांडे 2019 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के मुख्य सचिव थे. यह भी एक संयोग ही है कि पांडे के कार्यभार संभालने के कुछ महीने बाद ही उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले थे.
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