“हर चीज में दरार है, लेकिन रोशनी वहीं से आती है,” सरेंडर से पहले गौतम नवलखा का पत्र

16 मार्च 2020
कारवां के लिए शाहिद तांत्रे
कारवां के लिए शाहिद तांत्रे

भीमा कोरेगांव हिंसा केस में सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा और प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बडे की अग्रिम जमानत को खारिज करते हुए दोनों आरोपितों को तीन सप्ताह के भीतर एनआइए के सामने आत्मसमर्पण करने को कहा है. इससे पहले कोर्ट ने 6 मार्च को दोनों को गिरफ्तारी से 16 मार्च तक की राहत दी थी. इस मौके पर गौतम नवलखा ने सरेंडर के लिए तीन हफ्ते का वक्त दिए जाने के लिए अदालत को धन्यवाद देते हुए एक पत्र जारी किया है.

अंग्रेजी में लिखे इस पत्र का हिंदी अनुवाद उपरोक्त टिप्पणी के साथ मीडिया विजिल ने प्रकाशित किया है.

मैं जस्टिस अरुण मिश्रा और एमआर शाह को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने एनआइए के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए मुझे तीन हफ्ते का वक्त दिया है. मैं वरिष्ठ अधिवक्ताओं अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल का आभारी हूं कि उन्होंने हमारा बचाव किया. अपने प्रिय वकील मित्रों का धन्यवाद देने को मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं हैं जिन्होंने मेरी पैरवी में अपना बहुमूल्य समय लगाया.

अब जबकि मुझे तीन हफ्ते में सरेंडर करना है तो मैं खुद से सवाल करता हूं− मेरा मुकदमा, जो षडयंत्रकारी मुकदमों की फेहरिस्त में मुझे एक और कड़ी जान पड़ता है, क्या उसके आरोप के बोझ से मुक्त होने की उम्मीद पालने की गुस्ताखी मैं कर सकता हूं? क्या सह-आरोपित और उनकी तरह के दूसरे अपनी आज़ादी वापस पा सकेंगे? ये सवाल मेरे मन में इसलिए आते हैं क्योंकि हम एक ऐसे वक्त में रह रहे हैं, जब तमाम किस्म की नागरिक स्वतंत्रताओं को धीरे-धीरे संकुचित किया जा रहा है, जहां केवल एक ही आख्यान का प्रभुत्व है, जबकि सार्वजनिक जीवन मूर्खताओं से परिपूर्ण है.

यूएपीए जैसा खतरनाक कानून किसी संगठन को प्रतिबंधित करने और उसकी विचारधारा को अवैध ठहराने की मंजूरी देता है. नतीजतन, सबसे अहानिकर और वैध संलग्नता व संवाद भी राज्य की नजरों में आपराधिक हो सकता है. यह एक ऐसा कानून है जो खुद प्रक्रिया को ही दंड के औजार में तब्दील कर देता है, सुनवाई और उसके फैसले तक की प्रतीक्षा नहीं करता.

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