“कश्मीर में चुनाव नहीं जंग की तैयारी जैसा माहौल”

अनंतनाग में केवल 8.76 प्रतिशत मतदान हुआ है. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां लोगों ने अपनी इच्छा से मतदान का बहिष्कार किया था.
तौसीफ मुस्तफा/एएफपी/गैटी इमेजिस
अनंतनाग में केवल 8.76 प्रतिशत मतदान हुआ है. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां लोगों ने अपनी इच्छा से मतदान का बहिष्कार किया था.
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जम्मू कश्मीर में पांच चरणों में कराए गए लोकसभा चुनावों के आखिरी चरण का मतदान 6 मई को हुआ. राज्य में 6 संसदीय सीटें हैं और इतिहास में पहली बार दक्षिण कश्मीर के चार जिलों को समेटने वाली अनंतनाग संसदीय सीट में सुरक्षा कारणों से 3 चरणों में मतदान कराए गए. इस संसदीय सीट में कुलगाम, पुलवामा, शोपियां और अनंतनाग जिले आते हैं. 2014 से ही दक्षिण कश्मीर में उग्रवाद की घटनाओं में भारी वृद्धि हुई है. सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच निरंतर गोलीबारी होती रहती हैं जिनमें एक खास किस्म की समानता दिखाई देती है. स्थानीय लोग भीड़ लगा कर सुरक्षाबलों को घेर लेते हैं और सुरक्षा घेरे में फंसे आतंकवादियों को भागने का रास्ता मिल जाता है. गोलीबारियोंं के समाप्त होने के बाद, जिन घरों में आतंकियों ने पनाह ली होती है, वे जला कर भस्म कर दिए जाते हैं और आम लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. इस पृष्ठभूमि में 22 अप्रैल और 13 मई के बीच मैंने मतदाताओं की प्रतिक्रिया को समझने के लिए पुलवामा और शोपियां का भ्रमण किया.

अनंतनाग में केवल 8.76 प्रतिशत मतदान हुआ है. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां लोगों ने अपनी इच्छा से मतदान का बहिष्कार किया था. दक्षिण कश्मीर क्षेत्र में लोगों को इस बात का डर है कि यदि भारतीय जनता पार्टी दोबारा सत्ता में आई तो यह क्षेत्र लंबे दौर के लिए हिंसा के चक्र में फंस जाएगा. 2014 में बीजेपी ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ मिलकर पहली बार राज्य में सरकार बनाई थी. केंद्र और राज्य में नियंत्रण के चलते बीजेपी के लिए प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के सुरक्षा सिद्धांत को लागू करने का मौका मिला. 2010 के एक लेक्चर में डोभाल ने अपनी सुरक्षा नीति का खुलासा किया था. यह एक कट्टर सुरक्षा नीति है जिसके बारे में डोभाल ने बताया था, “शक्ति के खेल में अंतिम न्याय उसके पास होता है जो शक्तिशाली होता है.” इस नीति का क्षेत्र में भयावह परिणाम दिखाई दिया. 2018, इस दशक का सबसे ज्यादा रक्तरंजित वर्ष था. दिल्ली के नीति शोध संस्थान के फेलो सिद्धिक वाहिद ने मुझे बताया, “मतदान में भाग लेने वालों की संख्या को देख कर कश्मीरियों के अंदर जबरदस्त अलगाव को समझा जा सकता है. लोगों ने स्पष्ट तौर पर बता दिया है कि उनके लिए चुनाव के कोई मायने नहीं हैं.” वाहिद ने यह भी कहा कि कश्मीरियों को नहीं पता कि चुनाव के बाद क्या होगा पर “वे लोग यह जरूर समझते हैं कि जो भी होगा अच्छा नहीं होगा.”

22 अप्रैल को मैं पुलवामा गया. उसके अगले दिन वहां मतदान होना था. मैं बख्तरबंद गाड़ी में बैठ कर सफर कर रहा था और जब मैंने चुनाव के बारे में अपने सहयात्री से जानना चाहा तो वह चुप हो गया. जब सभी यात्री गाड़ी से उतर गए तो ड्राइवर ने मुझे बताया, “हो सकता है वह आपको पुलिस वाला समझ रहा हो. इस इलाके में बहुत से जासूस हैं जो पुलिस और सेना को जानकारी पहुंचाते हैं”. ड्राइवर ने मुझे यह भी बताया कि यहां मुझे कोई नहीं बताएगा कि वह वोट कर रहा है या नहीं. टाउन बाजार में मोबाइल की दुकान चलाने वाला 22 साल का एक लड़का नाम न छापने की शर्त पर मुझसे बता करने को राजी हुआ. मैंने उससे पूछा कि क्या वह वोट देगा? उसका जवाब था, “कभी नहीं. मैं शहीदों के साथ धोखा नहीं कर सकता. शहीद से उसका मतलब सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए उग्रवादियों से था. उस लड़के ने मुझसे कहा, “दिया जाने वाला हर वोट हमारे ऊपर हिंदुस्तान की हुकूमत जायज बनाता है.”

इस साल 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए हमले के बाद दक्षिण कश्मीर के उसके आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षाबलों की सख्ती के निशान हर जगह मौजूद हैं. 19 फरवरी को केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने राज्य प्रशासन को “प्रतिरोध कला” की सूचना मुहैया कराने का निर्देश दिया था. उस आदेश में लिखा था, “पता चला है कि कश्मीर घाटी में भारत विरोधी भावना को आकार और प्रोत्साहन देने के लिए कला के विभिन्न स्वरूपों का इस्तेमाल हो रहा है”. इसके बाद अलगाववादी व्यक्तियों और समूहों को प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, जम्मू-कश्मीर पुलिस और आयकर विभाग ने मिलकर तंग करना शुरू कर दिया.

परवेज ने यह भी बताया कि कश्मीरियों को चुनाव से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि “किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया समावेशी होनी चाहिए. कश्मीर में यह प्रक्रिया सैन्यकरण और डर के वातावरण को पैदा करती है”.

शाकिर मीर श्रीनगर के स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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