गुमसुम वसंत

श्रीलंका में जारी विरोध प्रदर्शनों से गायब हैं अतीत और वर्तमान के अन्याय के अध्याय

31 मार्च को राष्ट्रपति के निजी आवास के बाहर होता विरोध प्रदर्शन. श्रीलंका पहले भी हिंसा के ऐसे कई खूनी दौरों का गवाह रहा है. युद्ध से पीड़ित और तमिलों और मुसलमानों की मांगों को पूरा करने में नाकामियाब इस देश में जातीय तनाव गहरा है.
चमिला करुणारथने/ईपीए
31 मार्च को राष्ट्रपति के निजी आवास के बाहर होता विरोध प्रदर्शन. श्रीलंका पहले भी हिंसा के ऐसे कई खूनी दौरों का गवाह रहा है. युद्ध से पीड़ित और तमिलों और मुसलमानों की मांगों को पूरा करने में नाकामियाब इस देश में जातीय तनाव गहरा है.
चमिला करुणारथने/ईपीए

4 मई को श्रीलंका के उत्तरी प्रांत के एक शहर वावुनिया में सड़क किनारे एक छोटे से तंबू में तमिलों की भीड़ जमा थी. उनके पीछे एक दीवार थी जिस पर परिवार के उन सदस्यों की तस्वीरें टंगी थीं जिन्हें आखिरी बार श्रीलंकाई सेना की हिरासत में देखा गया था. कई लोग हाथों में उनकी तस्वीरें थामे हुए थे जिन्हें जबरन गायब कर दिया गया था. यह भीड़ न केवल अपने प्रियजनों की याद में वहां थी बल्कि उनसे फिर से मिल पाने की उम्मीद भी रखती थी. यह एक सीधा-सरल प्रदर्शन था लेकिन थोड़ा सा अंतर्राष्ट्रीय कवरेज भी हासिल नहीं कर पाया. वे लगभग दो हजार दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन श्रीलंकाई सरकार ने इन लोगों की मांगों पर ध्यान बहुत कम दिया और तिरस्कार बहुत ज्यादा किया है.

इस बीच, कोलंबो में समंदर के किनारे एक शहरी पार्क गाले फेस पर एक बहुत ही अलग विरोध चल रहा था. रात में तुरही और ढोल की आवाज सुनाई दे रही थी और श्रीलंकाई जनता "गो होम गोटा" (गोटा घर जाओ) के नारे लगा रही थी. उन्होंने सिंहली शेर के चित्र वाला देश का झंडा फहराया. इनके लिए यह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है. द गार्जियन ने बताया कि लोग इस क्षण को "श्रीलंका के अरब स्प्रिंग" के रूप में देख रहे हैं. कोलंबो स्थित एक गैर सरकारी संगठन नेशनल पीस काउंसिल ऑफ श्रीलंका के कार्यकारी निदेशक जेहान परेरा ने अखबार को बताया कि "सभी समुदायों के लोग सड़कों पर निकल रहे हैं, मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा है." एक प्रदर्शनकारी ने बीबीसी को बताया, "देखिए, मुसलमान यहां हैं, हिंदू यहां हैं, कैथोलिक यहां हैं. सब एक ही खून हैं.” इसी रिपोर्ट में एक बौद्ध भिक्षु के हवाले से कहा गया है, "श्रीलंका एक संयुक्त राष्ट्र बन गया है."

गाले फेस का विरोध लगभग दो महीने के लंबे असंतोष के बाद 9 अप्रैल को शुरू हुआ था. यह बड़े पैमाने पर बेकाबू मुद्रास्फीति और विकराल होते आर्थिक संकट से प्रेरित विरोध था. महिंदा और गोटाबाया राजपक्षे भाइयों के शासन में आर्थिक संकट बढ़ गया था. दोनों भाई नवंबर 2019 से क्रमशः प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति थे. विभिन्न मंत्रालयों का नेतृत्व करने वाले चचेरे भाइयों और भतीजों के साथ राजपक्षे परिवार ने 2000 के दशक के मध्य से देश की चुनावी राजनीति में एक प्रभावशाली असर रखा है. विरोध प्रदर्शनों के बारे में अधिकांश अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग ने असफल अर्थव्यवस्था और देश के भ्रष्टाचार के इतिहास पर परिवार की पकड़ से भड़के आंदोलन की बात की. रिपोर्ट में श्रीलंका के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय कर्ज में चीन की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ-साथ करों में कटौती और जैविक खेती अपनाने के सरकार के फैसले पर अधिक जोर दिया गया है. हालांकि इनमें बढ़ते सैन्य बजट को वित्त पोषित करने के लिए खोखले होते सामाजिक कार्यक्रमों पर बहुत कम रिपोर्ट है.

अंतर्राष्ट्रीय कवरेज में “श्रीलंकाई एकता” की इस सरल धारणा को कई तमिल शक की निगाहों से देखते हैं. पूरे प्रदर्शनों के दौरान श्रीलंका के झंडे का प्रदर्शन उन लोगों के लिए बेहद असहज करने वाला था, जो इसे सिंहली वर्चस्व के प्रतीक के रूप में देखते हैं. हालांकि कुछ प्रदर्शनकारी तमिलों के साथ एकजुटता के मामूली प्रदर्शनों में लगे रहे लेकिन आंदोलन द्वारा व्यापक स्तर पर उठाई गई मांगों ने तमिलों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को नजरअंदाज ही किया है.

विरोध प्रदर्शनों- नागरिक-समाज के कार्यकर्ताओं से लेकर राजनेताओं तक- ने पूरे दक्षिण से विभिन्न प्रकार की हस्तियों ने भाग लिया लेकिन कुख्यात नस्लवादी शख्सियतों की परेशान करने वाली मौजूदगी भी आंदोलन में रही है. इनमें एक अति-राष्ट्रवादी राजनीतिक दल जाथिका हेला उरुमाया के चरमपंथी बौद्ध भिक्षु शामिल हैं. कई प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के पूर्व समर्थक होने की बात स्वीकार की. एक सिंहली प्रदर्शनकारी ने द गार्जियन को बताया, "मैंने यह सोच कर गोटा को वोट दिया कि वह शेर है. अब मैं देख सकता हूं कि वह कुत्ते से भी बदतर है."

विरुबेन नंदकुमार श्रीलंका और मानवाधिकारों पर केंद्रित तमिल गार्जियन के संपादक हैं.

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