बजट 2020 : आंकड़ों का खेल

वार्षिक बजट की बढ़ती अप्रासंगिकता

04 मार्च 2020
प्रदीप गौड़/मिंट/गैटी इमेजिस
प्रदीप गौड़/मिंट/गैटी इमेजिस

हर साल भारत के बहुप्रतीक्षित सरकारी दस्तावेजों में से एक होता है वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला वार्षिक बजट. यह राष्ट्र का आर्थिक लेखा-जोखा है. यह बताता है कि सरकार किस तरह से संसाधनों को जुटाने और सार्वजनिक धन को खर्च करने का इरादा रखती है. यह दस्तावेज आर्थिक प्राथमिकताओं और सरकार के एजेंडे को दर्शाता है. कई अन्य सरकारी दस्तावेजों के उलट, बजट को संसद में पेश किया जाता है, उस पर बहस की जाती है और फिर मतदान किया जाता है और इस तरह बजट दस्तावेज में की गई प्रतिबद्धता एक निश्चित पवित्रता ग्रहण कर लेती है.

हालांकि 2014 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के सत्ता में आने के बाद से यह पवित्रता तेजी से लुप्त होने लगी और आज तो लगभग विलुप्त ही हो गई है. सरकार ने बार-बार ऐसे फैसले लिए हैं जो बजट में की गई प्रतिबद्धताओं के उलट हैं और बजट के लिए अनिवार्य संसदीय स्वीकृति को एक स्वांग बना दिया है. पिछले कुछ वर्षों में बजट में प्रस्तुत किए गए आंकड़े, सरकार द्वारा जारी किए गए अन्य आर्थिक आंकड़ों की तरह, जितना बताते हैं उससे ज्यादा छिपाते हैं. जिसने इस दस्तावेज की पवित्रता को गिराकर मीडिया प्रबंधन की कवायद तक पहुंचा दिया है.

पिछले तीन सालों से राजकोषीय घाटे के बारे में सरकारी अनुमानों पर गंभीर संदेह उठाए गए हैं. जब सरकार की आय उसके खर्च से कम हो जाती है तो इसे राजकोषीय घाटा कहते हैं. अधिकांश आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तुत की गई राजकोषीय घाटे की गणना को कम करके आंका गया है. सरकार के किसी भी स्पष्टीकरण के अभाव में "वास्तविक" राजकोषीय घाटे के बारे में कई अनुमान मीडिया में प्रसारित हुए हैं. पिछले साल नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने खुद सरकार के आंकड़ों पर सवाल उठाए थे. ऐसा लगता है कि सरकार अपनी प्राप्तियों और व्यय दोनों के बारे में आंकड़ों की बाजीगरी कर रही है. खर्च को कम दिखाने के लिए यह "बजट से इतर" उधार ले रही है जिसे सरकार बजट दस्तावेज में नहीं दर्शाती है. उदाहरण के लिए, सरकार ने खाद्य सब्सिडी का वित्तीय बोझ तब्दील करते हुए बजट से इतर जाकर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को राष्ट्रीय लघु बचत कोष से उधार लेने के लिए मजबूर किया. नतीजतन, एफसीआई पर अब एक ऐसे ऋण का बोझ है जिसे चुकाना बहुत मुश्किल है. पिछली सरकारें भी आंकड़ों के हेरफेर के लिए ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करती रही हैं लेकिन वर्तमान सरकार ने इस हेराफेरी को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है.

शक्तियों के बंटवारे को देखते हुए कार्यपालिका को बजट पर विधायिका का अनुमोदन प्राप्त करना होता है. हालांकि, ऐसा लगता है कि सरकार इन संस्थागत सुरक्षा उपायों को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है. यह जुलाई 2017 में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू करने के साथ यह शुरू हुआ जिसने अप्रत्यक्ष करों को बजट से बाहर कर दिया. तब से अप्रत्यक्ष करों का निर्णय वित्त मंत्री की अध्यक्षता में बनी जीएसटी परिषद नामक एक निकाय द्वारा किया जाता है जिसे संसद की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है. जीएसटी दरों को अब राजनीतिक लाभ के लिए बार-बार संशोधित किया जाता है. उदाहरण के लिए गुजरात विधानसभा चुनावों से ठीक पहले एक लोकप्रिय गुजराती स्नैक, खाखरा पर जीएसटी को 12 प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत कर दिया गया था. चूंकि जीएसटी के जरिए हुई प्राप्तियां सरकार के कुल कर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा होती हैं इसलिए बार-बार कर की दरों में किए गए संशोधन बजट में पेश किए गए अनुमानों को संदिग्ध बनाते हैं.

जबकि प्रत्यक्ष कर अभी भी बजट का हिस्सा है. फिर भी पिछले साल, सरकार ने यह जाहिर कर दिया कि वह अपनी सुविधा के अनुसार इनसे छेड़छाड़ कर सकती है. सितंबर में एक संवाददाता सम्मेलन में वित्त मंत्री ने संसद को दरकिनार करते हुए अध्यादेश के जरिए कॉर्पोरेट करों में एक बड़ी कमी की घोषणा की. सरकार ने संसद में दिसंबर में इस अध्यादेश को मंजूरी दे दी. इस कार्रवाई का 2019-20 के बजट पर गंभीर प्रभाव पड़ा. कॉरपोरेट सेक्टर के लिए टैक्स में की गई इस कटौती से सरकार को लगभग 1,45,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. कटौती की घोषणा होने के बाद भी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए जिन्हें संसद के समक्ष बजट के हिस्से के रूप में पेश किया जाना चाहिए था लेकिन अध्यादेश या कभी-कभी सिर्फ अधिसूचना जारी करके फैसले ले लिए गए. उदाहरण के लिए, इक्विटी शेयरों और इक्विटी-उन्मुख म्यूचुअल फंडों की इकाइयों की बिक्री से होने वाले पूंजीगत लाभ कर पर एक अतिरिक्त अधिभार जुलाई 2019 के बजट में संसद द्वारा अनुमोदित किया गया था इसे बाद में सरकार ने वापस ले लिया. भले ही कर व्यवस्था में इस तरह के बदलाव अनसुने न हों लेकिन जिस नियमितता के साथ यह हो रहा है वह अभूतपूर्व है.

हिमांशु जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.

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