बंगाल में संघ के "ग्राउंडवर्क" की फसल काटने को तैयार बीजेपी

30 अप्रैल 2021
2017 में पश्चिम बंगाल में जिलों-जिलों में रावनवमी की झांकियां निकाली गईं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं का कहना है कि इसकी तैयारी उन्होंने सालों तक की थी.
समीर जाना / हिंदुस्तान टाइम्स
2017 में पश्चिम बंगाल में जिलों-जिलों में रावनवमी की झांकियां निकाली गईं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं का कहना है कि इसकी तैयारी उन्होंने सालों तक की थी.
समीर जाना / हिंदुस्तान टाइम्स

अप्रैल 2017 में पश्चिम बंगाल में कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था. जिलों-जिलों में भगवा गमछा पहने लोग घूमते दिख रहे थे और साथ ही जय श्रीराम का नारा लगाते हुए तलवारें और त्रिशूल हवा में लहरा रहे थे. आसनसोल और बीरभूम की सड़कों में हजारों ऐसे लोग घूम रहे थे. भगवे झंडे गाड़ियों, घरों और दुकानों में लगे हुए थे. कोलकाता में हिंदू देवताओं की झांकियां एक से दूसरे स्थानों पर घुमाई जा रही थीं. यह राज्य दुर्गा पूजा के लिए प्रसिद्ध है लेकिन रामनवमी का ऐसा हर्षोल्लास अप्रत्याशित था.

राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने मुझसे कहा कि यह अप्रत्याशित नहीं था बल्कि इसके लिए संघ ने सालों तक जमीनी स्तर पर काम किया है और इस साल के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को इस जमीनी काम का लाभ मिलेगा.

2018 में भी रामनवमी के अवसर पर ऐसी ही धूमधाम दिखाई दी और आसनसोल और रानीगंज जैसे स्थानों में सांप्रदायिक हिंसा हुई. जल्द ही जय श्रीराम तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ बीजेपी का युद्धघोष बन गया. जारी विधानसभा चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण बड़े स्तर पर मतदाताओं को प्रभावित कर रहा है और ऐसा लगता है कि वर्तमान टीएमसी सरकार के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ही मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी है. एक दशक पहले हुए 2011 के विधानसभा चुनावों में भगवा पार्टी को राज्य में केवल 4 फीसदी मत प्राप्त हुए थे. 2016 के विधानसभा चुनावों में उसे सिर्फ तीन सीटों में जीत हासिल हुई थी लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 40 प्रतिशत मत हासिल किया जो एक हैरान करने वाला आंकड़ा है.

2021 के विधानसभा चुनाव के अंतिम नतीजे चाहे जो भी हों लेकिन इस बात से किसे इनकार होगा कि राज्य में बीजेपी की लहर है. तृणमूल कांग्रेस और बनर्जी अपनी सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं. भगवा पार्टी दावा कर रही है कि राज्य में बीजेपी की सुनामी आएगी और कई राजनीतिक विश्लेषकों को विश्वास है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और गृहमंत्री अमित शाह की चुनावी रणनीति राज्य में पार्टी के उत्थान के मुख्य कारक हैं. लेकिन पर्दे के पीछे संघ की कई सालों की मेहनत है. वरिष्ठ संघ पदाधिकारी और उसके जमीनी कार्यकर्ताओं ने मुझे बताया कि संघ ने व्यापक स्तर पर जन परिचालन किया है और लोगों की भर्ती की है. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि कैसे संघ ने हिंदू राष्ट्रवाद के मुद्दे पर केंद्रित अभियान चलाए हैं और संगठन का सफलता के साथ विस्तार किया है. आरएसएस के नेताओं ने मुझसे कहा कि संघ परिवार ने 2016 में ही “मिशन बंगाल” लक्ष्य बना लिया था. मार्च 2017 में संघ ने औपचारिक रूप से एक प्रस्ताव पारित किया था. आरएसएस के नेता शिबाजी मंडल ने मुझसे कहा, “संघ जब निश्चय कर लेता है तो उस लक्ष्य को पाने के लिए पूरी ताकत लगा देता है. संघ ने बंगाल पर 2017 में प्रस्ताव पारित किया था. तभी से बंगाल को सुधारने का काम चालू हुआ है.”

43 साल के मंडल स्कूल में पढ़ाते हैं और यहां संघ की मध्य बंगाल इकाई के बौद्धिक प्रमुख हैं. अभी हाल तक संघ ने अपने कामकाज की सहजता के लिए बंगाल को दो प्रांतों में बांट कर रखा था : दक्षिण बंगाल और उत्तर बंगाल. जब संघ का विस्तार बीरभूम जिले के आसपास के जिलों में हुआ तो उसने केंद्रीय बंगाल प्रांत बना लिया. केंद्रीय बंगाल का क्षेत्राधिकार पांच विभागों में बटा है, जो हैं- बीरभूम, वर्धमान, बांकुरा, हुगली और नाडिया. इन इलाकों में फैक्ट्रियों और हिंदी भाषी जन समुदाय की बड़ी उपस्थिति के चलते आसनसोल, रानीगंज, दुर्गापुर और बीरभूम में संघ का विस्तार आसान हुआ है. इस साल अप्रैल में मैंने संघ के बीरभूम मुख्यालय में मंडल से मुलाकात की.

अमित भारद्वाज पूर्व में तहलका, न्यूजलॉन्ड्री डॉट कॉम और तिरंगा टीवी से जुड़े थे.

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