आदिवासी छात्रों, वकीलों, कार्यकर्ताओं को निशाना बनाती तेलंगाना पुलिस

10 जनवरी 2021
इस साल जुलाई के बाद से ही तेलंगाना पुलिस आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ रही आवाजों को खामोश करने की कोशिश में आदिवासी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, वकीलों और छात्रों को परेशान कर रही है. इन व्यक्तियों में शामिल हैं (बाएं से दाएं, ऊपर से नीचे) कनका वेंकटेश, माडवी रमेश, सिडाम जंगुदेव, गंता सत्यम, चंदा महेश्वर राव, सुमन डब्बकटाला, वेडमा बोज्जू, कोसिंगा वेंकटेश, विवेकानंद सिडाम, सोयम चिन्नय्या, आत्राम सुगुना और आत्राम बुजंगाराव, और रमानाला लक्ष्मैया.
इलस्ट्रेशन/सुकृती एना स्टेनले
इस साल जुलाई के बाद से ही तेलंगाना पुलिस आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ रही आवाजों को खामोश करने की कोशिश में आदिवासी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, वकीलों और छात्रों को परेशान कर रही है. इन व्यक्तियों में शामिल हैं (बाएं से दाएं, ऊपर से नीचे) कनका वेंकटेश, माडवी रमेश, सिडाम जंगुदेव, गंता सत्यम, चंदा महेश्वर राव, सुमन डब्बकटाला, वेडमा बोज्जू, कोसिंगा वेंकटेश, विवेकानंद सिडाम, सोयम चिन्नय्या, आत्राम सुगुना और आत्राम बुजंगाराव, और रमानाला लक्ष्मैया.
इलस्ट्रेशन/सुकृती एना स्टेनले

इस साल जुलाई से तेलंगाना पुलिस राज्य के आदिलाबाद और कोमाराम भीम आसिफाबाद जैसे उत्तरी जिलों में आदिवासियों पर लगातार अत्याचार कर रही है. 29 अगस्त को आदिलाबाद में पुलिस अधीक्षक विष्णु वारियर ने “माओवाद से सहानुभूति रखने” वालों की एक सूची जारी की. सूची में कई आदिवासी छात्र और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के नाम हैं. आदिवासी अधिकारों के लिए विभिन्न आंदोलन में सक्रिय स्कूल शिक्षक मदवी रमेश ने कहा, “पुलिस बेवजह आदिवासी छात्रों को फंसा रही है. मेरे जैसे लोग जिनकी सरकारी नौकरी है, वे तो फिर भी किसी तरह झेल लेंगे लेकिन छात्र क्या करेंगे?”

कोमाराम भीम आसिफाबाद को 2016 में विस्तृत असिफाबाद जिले से अलग कर बनाया गया था. हाल के महीनों में दो उत्तरी जिलों में छात्रों और कार्यकर्ताओं पर पुलिस की ज्यादतियां बढ़ गई हैं और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत उन पर मामले दर्ज किए जा रहे हैं. वास्तव में ऐसा इन दो जिलों तक ही सीमित नहीं है. राज्य के दो पूर्वी जिलों मुलुगु और भद्रादि कोठागुडेम में भी स्थानीय आदिवासियों के खिलाफ पुलिस की दुश्मनी बढ़ी है. इसके साथ ही पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति और समाचार रिपोर्टों के मुताबिक पिछले दो महीनों में पुलिस के साथ "आमने-सामने की गोलाबारी " की कई घटनाओं में दस से अधिक लोगों मौत हुई है लेकिन इन मुठभेड़ों में तेलंगाना पुलिस का एक भी जवान घायल नहीं हुआ है. ऐसा लगता है कि आदिलाबाद में आदिवासी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, वकीलों और छात्रों के उत्पीड़न और धमकी के मामले, तेलंगाना सरकार द्वारा आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाली आवाजों को खामोश करने की कोशिश का हिस्सा हैं.

जुलाई में तेलंगाना पुलिस ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में तलाशी अभियान तेज करने के बाद उत्पीड़न शुरू किया. 17 जुलाई को तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक एम महेंदर रेड्डी ने कोमाराम भीम आसिफाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पांच सदस्य “शांति और खुशहाली के लिए पहचाने जाने वाले आदिवासी गांवों में तनाव फैला रहे हैं." रेड्डी ने दावा किया कि समूह का नेतृत्व मेलरेपु अडेलु ने किया था, जिन्हें  आमतौर पर भास्कर के रूप में जाना जाता है, जो माओवादियों की तेलंगाना राज्य समिति के सदस्य हैं. तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिलाबाद में पांच सदस्यीय माओवादी टीम की मौजूदगी के चलते पुलिस ने "अभियान चलाकर 25 विशेष दस्तों सहित 60 पुलिस टीमों को तैनात किया ताकि जंगलों में सघन तलाशी अभियान चलाया जा सके."

रेड्डी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दो दिन बाद की जब भास्कर के नेतृत्व में माओवादियों के एक समूह ने कोमाराम भीम आसिफाबाद जिले के थोककुगुड़ा गांव में पुलिस के साथ "मुठभेड़" की. आदिलाबाद के अधीक्षक वारियर ने मीडिया को बताया कि माओवादियों ने "पुलिस दल पर गोलियां चलाईं और जवाबी गोलाबारी के बाद वे भाग निकले." कथित रूप से भाग निकलने के बाद, पुलिस ने माओवादियों को खाना और रहने की व्यवस्था करने और उन्हें भागने में मदद करने के लिए भारतीय दंड संहिता, शस्त्र अधिनियम और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत ठोककुगुड़ा के मूल निवासी कोवा वसंत राव को गिरफ्तार किया.

16 जुलाई को डेक्कन क्रॉनिकल के पत्रकार पिल्लमरी श्रीनिवास ने बताया कि थोककुगुड़ा के ग्रामीणों ने मुठभेड़ होने के दावे का खंडन किया और तर्क दिया कि "पुलिस की इस कहानी का मकसद आदिवासियों और गांववालों के बीच आतंक पैदा करना है." श्रीनिवास ने बताया कि ग्रामीणों के अनुसार, " पुलिस वालों ने 14 जुलाई की रात हमें डराने के लिए हवा में गोलीबारी की" राव की पत्नी कोवा सत्तूबाई ने श्रीनिवास से कहा कि उसी रात, एक पुलिस पार्टी ने खाना पकाने के लिए उनके बर्तन ले लिए और "परिवार को बचा-खुचा खाना खाने को दे दिया." देर रात उन्होंने कहा, एक अन्य पुलिस पार्टी ने दौरा किया और उनके दरवाजे पर दस्तक दी. सत्तूबाई ने कहा कि देर रात होने के कारण दरवाजा खोलने में देरी हो गई, जिससे पुलिस ने यह मान लिया कि उन्होंने माओवादियों को भागने में मदद की है. उन्होंने कहा कि पुलिस राव के साथ घर से बर्तन भी ले गई और अब "खाना बनाने के लिए बर्तन नहीं है."

आकाश पोयाम कारवां के कॉपी एडिटर हैं.

Keywords: Telangana police excesses Adivasi rights Adivasis persecution Maoism Maoist
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