क्या केरल की वाम मोर्चा सरकार लोगों का स्वास्थ्य डेटा कनाडा की कंपनी के साथ साझा कर रही है?

कारवां को मिले ईमेल से पता चलता है कि कनाडा स्थित जनसंख्या स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान केरल सरकार द्वारा किए गए व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण में एक केंद्रीय खिलाड़ी था. इस गठजोड़ में शामिल प्रमुख व्यक्तियों में राजीव सदानंदन (बाएं), स्वास्थ्य विभाग में पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव और पीएचआरआई के कार्यकारी निदेशक सलीम यूसुफ (दाएं) शामिल थे. इलसट्रेशन : सुकृति अनाह स्टेनली
28 October, 2020

केरल में चल रहा राज्य सरकार का स्वास्थ्य सर्वे असल में कनाडा की कंपनी पापुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट (पीएचआरआई) द्वारा संचालित और तैयार किया गया है. इस बात का खुलासा स्वास्थ्य अधिकारियों और इस प्रोजेक्ट में शामिल शोधकर्ताओं के आपसी ईमेलों और पत्रों से हुआ है. हैरानी की बात यह है कि जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार ने ऐसे ही एक प्रोजेक्ट के लिए पीएचआरआई से साझेदारी का प्रस्ताव किया था तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीएम ने इसका जबरदस्त विरोध किया था और इस प्रोजेक्ट को बंद करना पड़ा था. जब मीडिया में ये खबरें आईं कि उसी से मिलते-जुलते प्रोजेक्ट को वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार ने दोबारा चालू किया है तो राज्य सरकार ने दावा किया कि वह पीएचआरआई के साथ किसी तरह का डेटा शेयर नहीं कर रही है. लेकिन कारवां के पास उपलब्ध ईमेलों और पत्रों से लगता है कि सरकार झूठ बोल रही है.

ये ईमेल केरल सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों, पीएचआरआई और प्रोजेक्ट में शामिल अन्य मेडिकल संस्थाओं के हैं. इन्हें भेजने वालों में राजीव सदानंद जैसे शीर्ष स्वास्थ्य नौकरशाह हैं, जिन्होंने एलडीएफ और यूडीएफ सरकारों में काम किया है. इसी तरह पीएचआरआई के प्रमुख और कनाडा की मैकमास्टर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सलीम युसूफ, तिरुवनंतपुरम के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर के विजयकुमार और अच्युता मेनन सेंटर फॉर हेल्थ साइंस स्टडीज संक्षेप में अच्युता मेनन सेंटर के एमिरेट्स प्रोफेसर केआर थनकप्पन के ईमेल भी हैं. ये पत्र और ईमेल कारवां को एक विसलब्लोअर ने उपलब्ध कराए हैं. इनसे पता चलात है कि पीएचआरआई को डेटा उपलब्ध कराने, परियोजना से संबंधित मीडिया और राजनीतिक सवालों को संबोधित करने की तैयारी किस तरह की गई और परियोजना में जबरदस्त वित्तीय निवेश किया गया है.

इसके अलावा जो सबसे बड़ी बात सामने आई है वह यह कि पिनाराई विजयन कि एलडीए सरकार ने यूडीएफ सरकार के 2013 के केरला हेल्थ ऑब्जर्वेटरी एंड बेसलाइन सर्वे (खोब्स) की रिब्रांडिंग कर फिर लॉन्च करने से ज्यादा कुछ नहीं किया है. दिसंबर 2018 में सत्ता में आने के दो साल बाद एलडीएफ सरकार ने घोषणा की थी कि वह केरला इंफॉर्मेशन ऑफ प्रेसिडेंट आरोग्यम नेटवर्क (किरण) सर्वे शुरू कर रही है. लेकिन नई सरकार गठन के चंद हफ्तों में ही विजयकुमार ने पूर्व सरकार की परियोजना को दोबारा शुरू करने के संबंध में परामर्श जारी कर दिया. विजयकुमार हेल्थ एक्शन बाय पीपल (हेप) नाम की गैर लाभकारी संस्था के सचिव हैं. यह संस्था दोनों सर्वेक्षणों में शामिल थी और इसी ने परियोजना को दोबारा शुरू करने की सिफारिश की थी.

यूडीएफ सरकार में सदानंद उस वक्त स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव थे जब खोब्स परियोजना चल रही थी. उन्हें 2013 में, परियोजना बंद हो जाने के बाद, केंद्र सरकार में डिप्यूट कर दिया गया था. इसके बाद मई 2016 में वह स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव बनकर राज्य सरकार में लौट आए और 3 जून को विजयकुमार ने पीएचआरआई के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर सुमति रंगराजन को लिखा, “श्री राजीव सदानंद ने चार्ज ले लिया है. मैदान खाली है. फिर क्या हम आगे बढ़ने की तैयारी करें?

Health Survey Resumption (June 2016) by Tanvi Mishra on Scribd

10 मिनट के अंदर ही रंगराजन ने जवाब दिया, "यह तो अच्छा समाचार है, वीके. मैं डॉ. यूसुफ से बात करके जल्दी आपसे संपर्क करता हूं." दूसरे दिन यूसुफ ने दोनों को लिखा, "हमें उसी अध्ययन के लिए नया नाम चाहिए (पुराने अध्ययन के विरोधी अभी भी हैं). हमें मंत्री को अपने पाले में करना होगा और नए मुख्यमंत्री को भी और उसके बाद, शुरू करने से पहले, प्रेस को अपनी तरफ करने के लिए एक नई संचार रणनीति विकसित करनी होगी." उन्होंने आगे लिखा, "तो बात यह है कि मैं परियोजना को आगे बढ़ाने को तैयार हूं. हमें संभावित राजनीतिक और लॉजिस्टिक समस्याओं के बारे में सोचना चाहिए और जब हमारे पास अच्छी रणनीति हो, इसे शुरू कर देना चाहिए."

सभी तरह के संकेत बताते हैं कि नए मुख्यमंत्री विजयन और उनकी सरकार यूसुफ के साथ खड़ी थी और इस परियोजना को कार्यान्वित करने को तैयार थी. उन बातों को भी वह करने को तैयार थी जिसे बाद में उसने साफ तौर पर अस्वीकार किया था. अक्टूबर 2016 में किरण को शुरू करने के लिए लॉजिस्टिक से संबंधित एक ईमेल में यूसुफ ने परियोजना को शुरू करने की पूर्व शर्त डेटा को शेयर करना बताया था. उन्होंने लिखा, "अगर सरकार सहमत होती है और पीएचआरआई को प्रत्येक दिन का डेटा, असल में तो दिन में कई बार डेटा मिलता रहे तो हम काम को पूरा करने के लिए कोई भी तरीका अपनाने को तैयार हैं, यहां तक कि वह तरीका भी जो हमने पायलट के लिए अपनाया था."

KIRAN Data Collection Emails (Oct 2016) by Tanvi Mishra on Scribd

दिसंबर 2018 में केरल सरकार ने औपचारिक रूप से किरण हेल्थ सर्वे की शुरुआत की. राज्य सरकार के अनुसार इस सर्वे का लक्ष्य गैर संक्रामक रोगों की उपस्थिति और खतरे का पता लगाना है. सरकार ने सर्वे की घोषणा वाले आदेश में कहा है कि इसमें भोजन, कसरत, रहन-सहन का तौर तरीका, शराब और धूम्रपान की आदतें, रोगों और उपचार के तरीके से संबंधित तथ्य इकट्ठे किए जाएंगे. इस आदेश में आगे लिखा है, “यह सर्वे राज्य सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के गैर संक्रामक रोग संभाग द्वारा किया जाएगा. यह सर्वे प्रश्नों पर आधारित होगा. इसका लक्ष्य स्वास्थ्य स्टाफ के जरिए राज्य के 14 जिलों के 10 लाख लोगों तक पहुंचना है."

सरकार के आदेश में कहा गया है कि यह सर्वे अच्युता मेनन सेंटर, राज्य स्वास्थ्य व्यवस्था संसाधन केंद्र (यह स्वास्थ्य विभाग की तकनीकी सहयोग शाखा है) और राज्य के केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस- ई-हेल्थ केरला- के साथ मिल कर किया जाएगा. अच्युता मेनन सेंटर श्री चितिराथिरुनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी की शोध शाखा है. उस आदेश में लिखा है कि अच्युता मैनन सेंटर और श्री चितिराथिरुनल संस्थान डेटा संकलित करने वालों को प्रशिक्षित करेंगे. संकलनकर्ताओं में जिला मेडिकल अधिकारी होंगे और ई-हेल्थ टीम सर्वे के लिए टेबलेट उपलब्ध कराएगी.

सरकारी आदेश में पीएचआरआई और मैकमास्टर विश्वविद्यालय की संलिप्तता के बारे में नहीं बताया गया था. पीएचआरआई शोध संस्था कनाडा की सरकारी यूनिवर्सिटी मैकमास्टर विश्वविद्यालय द्वारा प्रायोजित है और उसे अस्पतालों का नेटवर्क हैमिल्टन हेल्थ साइंसेज, जो औषधियों पर शोध और क्लीनिकल ट्रायल करता है, भी धन उपलब्ध कराता है. पीएचआरआई के प्रमुख युसूफ हैं, जो केरल में जन्मे कनाडाई नागरिक हैं. युसूफ हैमिल्टन हेल्थ साइंसेज के शोध विभाग के उपाध्यक्ष हैं और मैकमास्टर विश्वविद्यालय में अध्यापन करते हैं.

उस सरकारी आदेश में जिस दूसरी संस्था के नाम का उल्लेख नहीं था, लेकिन जिसने सर्वे की रूपरेखा तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी वह थी हेप. यह संस्था तिरुवनंतपुरम के चिकित्सकों का एनजीओ है. अच्युता मेनन सेंटर के प्रोफेसर वी रमणकुट्टी हेप के अध्यक्ष हैं और विजयकुमार इसके सचिव हैं. हेप 2003 से ही मैकमास्टर विश्वविद्यालय के साथ कार्डियोवैस्कुलर रोगों के कारणों को पहचानने के लिए अंतरराष्ट्रीय महामारी शोध अध्ययन और सेकेंडरी प्रीवेंटिव मेडिसन (द्वितीयक निवारक औषधि) के इस्तेमाल के शोध से जुड़ी है. इस अध्ययन के प्रमुख जांचकर्ता युसूफ हैं. इस अध्ययन का नाम पर्सपेक्टिव अर्बन रूरल एपिडेमियोलॉजिकल स्टडी है. भारत में इसके प्रमुख जांचकर्ताओं में विजयकुमार और रमणकुट्टी भी हैं. इस अध्ययन से पता चला है कि एस्प्रिन जैसी निवारक और कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर कम करने वाली दवाइयां भारत जैसे कम आय वाले देशों में जरूरत से कम उपलब्ध हैं. अध्ययन ने सिफारिश की है कि “बुनियादी, सस्ती और प्रभावकारी औषधियों के दीर्घकालीन इस्तेमाल में सुधार लाया जाना चाहिए.”

दोनों स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में सीएचएफआई, हेप और अच्युता मेनन सेंटर आगे थे. कारवां के पास मौजूद ईमेल और दस्तावेज दिखाते हैं कि खोब्स के लॉन्च से पहले और 2017 तक उसके सामने आने वाले अवरोधों के लिए अच्छी खासी तैयारियां की गईं थीं. इन पत्रों से केरल की एलडीएफ सरकार की इस योजना को कार्यान्वित करने की इच्छा का पता चलता है जिसका विपक्ष में रहते उसने विरोध किया था. व्यक्तियों और संगठनों के बीच हुए संवाद से पता चलता है कि दोनों सर्वेक्षणों में व्यावहारिक रूप से कोई अंतर नहीं था.

Khobs Mou (July 2013) by Tanvi Mishra

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14 दिसंबर 2011 को राज्य सरकार पीएचआरआई और हेप ने “केरला इनीशिएटिव” की पहली बैठक की थी. बैठक के मिनट्स में इसमें शामिल पक्षों की भूमिकाओं का स्पष्ट उल्लेख है. बैठक में यूसुफ ने प्रस्ताव दिया था कि हेप का काम स्वास्थ्य विभाग और पीएचआरआई/मैकमास्टर के बीच समन्वय बनाने का होना चाहिए. मिनट्स में आगे लिखा है कि हेप और पीएचआरआई डेटा संकलन, उनके चयन और विश्लेषण के लिए फॉर्मेट तैयार करेंगी. लगता है कि पीएचआरआई के प्रोजेक्ट मैनेजर रंगराजन को प्रोग्राम में मदद के लिए प्वाइंट्समैंन या संपर्क सूत्र नियुक्त किया गया था. बैठक का समापन इस निर्णय के साथ हुआ कि सदानंदन, हेप की ओर से विजयकुमार या रमणकुट्टी और पीएचआरआई की ओर से रंगराजन या यूसुफ प्रत्येक महीने आपस में फोन पर मीटिंग करेंगे.

Minutes of First Meeting (D... by Tanvi Mishra

मई 2013 में केरल सरकार ने खोब्स का पायलट अध्ययन किया. उस साल अगस्त तक पायलट अध्ययन पूरा कर लिया गया और यूसुफ, विजयकुमार, मैकमास्टर के पूर्व छात्र मनु राज, जिन्होंने पीएचआरआई में क्लीनिकल महामारीविद के बतौर काम किया था और केरल सरकार के गैर संक्रामक रोग नियंत्रण कार्यक्रम के नोडल अधिकारी विपिन गोपाल ने काम की प्रगति पर चर्चा करने के लिए बैठक की. उस बैठक के बाद विजयकुमार ने सदानंदन को लिखा कि डेटा में “मिसमैच है और समीक्षा की आवश्यकता है.” उन्होंने लिखा, “इन जांचों को केवल सांख्यिकीविदों, डेटा मैनेजर, महामारीविद और प्रोग्रामर की टीम कर सकती है. फिलहाल उनके सर्वर में पायलट डेटा का एक्सेस नहीं है. इन मामलों के लिए हमें पीएचआरआई की टीम को पायलट डेटा का एक्सिस देना होगा ताकि गलतियों को ठीक किया जा सके.” उसी दिन 15 अगस्त को सदानंदन ने पीएचआरआई को संकलित डेटा का एक्सिस दे दिया.

इस प्रोजेक्ट से संबंधित अवरोधों में डेटा का एक्सेस आसान अवरोध था. दूसरा अवरोध इससे ज्यादा जटिल था और वह था एक अंतरराष्ट्रीय साझेदार के साथ सहकार्य करने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी हासिल करना. भारतीय आयुर्विज्ञान शोध परिषद द्वारा जारी प्रोटोकॉल के अनुसार विदेशी सहायता-सहकार्य वाले किसी भी शोध प्रोजेक्ट को स्वास्थ्य मंत्रालय की स्क्रीनिंग समिति की मंजूरी लेनी होती है. इस समिति के सदस्यों में स्वास्थ्य मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रतिनिधि होते हैं. सभी विदेशी सहकार्य वाले प्रस्तावों को परिषद के अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संभाग के समक्ष जमा कराना जरूरी होता है जो स्वास्थ्य मंत्रालय की स्क्रीनिंग समिति के सचिवालय की तरह है.

KHOBS Data Sharing Emails (Aug 2013) by Tanvi Mishra on Scribd

अक्टूबर 2013 में यूसुफ ने विजयकुमार और राज को लिखा कि वह स्वास्थ्य मंत्रालय की स्क्रीनिंग समिति को भेजे जाने वाले आवेदन को तैयार कर रहे हैं. उन्होंने लिखा, “यह जरूरी है कि ऐसे किसी भी सवाल का जवाब तैयार रखा जाए जो स्क्रीनिंग समिति से क्लीयरेंस के वक्त उठ सकता है. उन्होंने कहा कि कनाडा को डेटा का एक्सेस क्यों दिया जाए?, जैसे सवाल प्रमुख होंगे. उस पत्र में उन्होंने वे सुझाव दिए जो जवाब में दिए जा सकते थे. उन्होंने कहा कि कनाडा को किसी भी मरीज की पहचान नहीं बताई जाएगी क्योंकि सारी जानकारी गुमनाम होंगी. और यह भी कहा जा सकता है कि पीएचआरआई पिछले दो सालों से सरकार के साथ काम कर रही है और वह योजना में 500000 डॉलर का निवेश कर चुकी है. यूसुफ ने यह भी दावा किया कि पीएचआरआई दुनिया के उन चंद संगठनों में से एक है जो डेटा का विश्लेषण करने में सक्षम हैं.

लेकिन क्लीयरेंस फिर भी नहीं मिला. उस साल दिसंबर में वीएस अच्युतानंदन, जो सीपीआईएम की ओर से विपक्ष के नेता थे, इस नीति के विरोध में उतर आए. अच्युतानंदन ने यूडीएफ सरकार पर कनाडा और पीएचआरआई को केरल की जनता से जुड़े तथ्य सौंपने का आरोप लगाया. इसके कुछ ही दिनों बाद केरल सरकार को यह परियोजना ठंडे बस्ते में डालनी पड़ी. जून 2014 में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री वीएस शिवाकुमार ने विधानसभा को बताया था कि खोब्ज को रद्द कर दिया गया है क्योंकि इसे केंद्र सरकार की मंजूरी नहीं मिली.

अब साफ है कि एलडीएफ परियोजना का विरोध करने में ईमानदार नहीं थी. नई सरकार के सत्ता में आने के कुछ ही हफ्तों में युसूफ, विजयकुमार और सदानंदन इस विवादास्पद प्रोजेक्ट को दोबारा चालू करने के बारे में बातचीत करने लगे. ईमेल से खुलासा होता है कि इस परियोजना में वही पार्टियां शामिल थीं और इसकी प्रक्रिया में भी वही पुरानी थी. जून 2016 में रंगराजन ने विजयकुमार और गोपाल को यूसुफ के अनुरोध पर सप्ताहिक फोन कॉल की पेशकश की. नवंबर 2016 के एक ईमेल में गोपाल ने रंगराजन को लिखा है, “ई-हेल्थ सितंबर के पहले सप्ताह तक हमारे लिए आवश्यक टेबलेट उपलब्ध करा देगा.” इन टेबलेट का संबंध नए सर्वे में इस्तेमाल किए जाने से है.

HMSC Letter (Oct 2013) by Tanvi Mishra

दिसंबर 2016 की शुरुआत में मीडिया को परियोजना के प्रस्तावित रिलॉन्च की भनक लग गई. उस महीने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने खबर की कि परियोजना को रिवाइव किया जा रहा है जबकि जब एलडीएफ विपक्ष में थी तब इसने विधानसभा के भीतर और बाहर इस सर्वे का विरोध किया था और यूडीएफ पर कनाडा सरकार के साथ मिलीभगत करने का आरोप लगाया था. गोपाल ने अखबार को बताया कि "पीएचआरआई हाई वॉल्यूम डेटा का विश्लेषण करने के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करने के कार्य में ही शामिल है. यह सॉफ्टवेयर हमारे देश या राज्य के पास उपलब्ध नहीं है." उन्होंने यह भी कहा कि पीएचआरआई के साथ नए समझौते की जरूरत नहीं थी क्योंकि यूडीएफ सरकार और पीएचआरआई के बीच 2012 में हुआ समझौता चल रहा है.

13 दिसंबर को सुबह 9:56 यूसुफ को वेरोनिका मैग्यार, जो मैकमास्टर विश्वविद्यालय के मीडिया रिलेशंस संयोजक हैं, ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस की वह खबर ईमेल की. 2 घंटे बाद यूसुफ ने यह मेल सदानंदन और विजयकुमार को फॉरवर्ड की. उन्होंने मेल में लिखा, “आपको इसकी जानकारी मिल चुकी होगी. ऐसा लगता है कि कुछ उपद्रवी अभी भी सक्रिय हैं. मुझे समझ में नहीं आ रहा कि स्रोत कौन है. मुझे उम्मीद है कि सरकार इस कार्यक्रम को समर्थन करती करेगी क्योंकि जाहिर तौर पर यह राज्य के लिए अच्छा है.”

चार दिन बाद यूसुफ ने सदानंदन को प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन से संबंधित चिंता जाहिर करते हुए लिखा, “मुझे उम्मीद है कि किसी प्रकार का गंभीर अवरोध सामने नहीं आएगा और आप, स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री मिलकर किसी भी संभावित कांटे को निकाल देंगे.” इसके जवाब में सदानंदन ने लिखा, “पार्टी के अंदर कुछ आपत्तियां जताई गईं थीं. पार्टी का फैसला अंतिम होता है क्योंकि कम्युनिस्टों के लिए मंत्री और मुख्यमंत्री से ऊपर पार्टी होती है. अनिष्ट भी हो सकता है. यह मेरी पहुंच से बाहर की बात है. हम लोग प्रक्रिया को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयासरत हैं.”

KIRAN Media Report Emails (December 2016) by Tanvi Mishra on Scribd

इसके कुछ ही महीनों में परियोजना के सामने सतर्कता समिति द्वारा सर्वे की पूछताछ वाला दूसरा विरोध खड़ा हो गया. 25 मार्च 2017 को रमणकुट्टी ने विजयकुमार को लिखा कि विजिलेंस विभाग हेप के पीएचआरआई, पीयूआरई और खोब्स के साथ संबंधों की पड़ताल कर रहा है. विजिलेंस और भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो के 2016 और 2017 में प्रमुख रहे पूर्व डीजीपी जैकब थॉमस ने मुझसे पुष्टि की कि विभाग सूचना और दस्तावेजों के आधार पर खोब्स में संलिप्त पार्टियों की जांच कर रहा था. उन्होंने बताया कि जांच को रोक दिया गया. लेकिन जब मैंने पूछा कि जांच को क्यों और किसने रोका तो थामस ने जवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा कि वह अब सिविल सेवा में नहीं हैं और इसलिए इस मामले पर बातचीत करना नहीं चाहते.

इस बीच लगता है कि किरण को लॉन्च करने का काम बिना रुकावट आगे बढ़ता रहा. 15 मई 2017 को रंगराजन ने यूसुफ, विजयकुमार, रमणकुट्टी और अन्य को स्वास्थ्य अध्ययन की रिब्रांडिंग को अंतिम रूप देने के बारे में लिखा. ईमेल में लिखा है कि “अन्य अटैचमेंट्स के साथ मेल में फाइनल किरण प्रोटोकॉल और पीएचआरआई/एचएचएस के लिए एथिक्स मंजूरी अटैच्ड हैं.” रंगराजन ने उस ईमेल में यह भी जोड़ा, "मैंने अपनी एथिकल समिति के पास खोब्स का नाम बदलकर किरण रखने का संशोधित प्रस्वात दर्ज करा दिया है. जैसे ही मुझे स्वीकृति मिल जाएगी मैं उसे भेज दूंगा."

अंततः सरकार ने सभी अवरोधों को पार कर लिया और खोब्स को किरण के नाम से दिसंबर 2018 में रीलॉन्च कर दिया. लगता है कि मीडिया के सवालों से बचने के लिए एलडीएफ सरकार ने इस परियोजना में पीएचआरआई की संलिप्तता को कम करने की कोशिश की. आधिकारिक रूप से सरकार ने अपनी स्थिति वही बताई जो गोपाल ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताई थी. उदाहरण के लिए, मई 2019 में विपक्ष ने राज्य विधानसभा में इस परियोजना में पीएचआरआई की संलिप्तता पर सवाल खड़े किए.

स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा ने विधानसभा में जवाब दिया कि राज्य सरकार ने सर्वे कराने के लिए सॉफ्टवेयर बनाने में पीएचआरआई से मदद ली है. उन्होंने कहा कि अच्युता मेनन सेंटर ने डेटा का विश्लेषण करने के लिए पीएचआरआई से तकनीकी सहयोग मांगा है और स्वास्थ्य मंत्रालय की स्क्रीनिंग समिति के समक्ष सहकार्य की मंजूरी के लिए किया गया अनुरोध अभी लंबित है. उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा संकलित डेटा राज्य डेटा केंद्र में सुरक्षित है और कनाडा की कंपनी से इसे साझा करने का आरोप बेबुनियाद है. लेकिन ईमेलों से संकेत मिलता है कि केरल सरकार और कनाडा के चिकित्सीय शोध संस्थान के बीच हुई समझदारी का मुख्य बिंदु डेटा शेयरिंग ही था और लगता है कि राज्य ने इसकी मंजूरी दे भी दी थी.

किरण से संबंधित आरटीआई आवेदन के जवाब में स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी पीएचआरआई और मैकमास्टर की संलिप्तता से इनकार किया है. वह आरटीआई को राज्य मानव अधिकार संरक्षण केंद्र डाली थी. अप्रैल 2020 में आए जवाब में स्वास्थ्य सेवाओं के सचिवालय ने कहा है कि किरण से संबंधित सरकारी आदेश के अनुसार, कोई भी विदेशी संस्था इस परियोजना से नहीं जुड़ी है. आरटीआई का जवाब कहता है, “बिग डेटा विश्लेषण के लिए अच्युता मेनन सेंटर द्वारा दर्ज किए गए प्रस्ताव में पापुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टिट्यूट का उल्लेख था लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के सचिवालय और पापुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट के बीच कोई पत्राचार नहीं हुआ है.

स्वास्थ्य सचिवालय का यह जवाब पीएचआरआई से तकनीकी सहयोग के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय की स्क्रीनिंग समिति के अनुरोध से संबंधित शैलजा के बयान से अलग है. स्क्रीनिंग समिति की वेबसाइट में प्रकाशित सूची में विदेशी सहकार्य के लिए मंजूर परियोजनाओं में किरण और खोब्ज के नाम नहीं हैं. सूची देखने से पता चलता है कि समिति ने अच्युता मेनन सेंटर का पीएचआरआई के साथ सहकार्य को स्वीकृति नहीं दी है. इससे यह माना जा सकता है कि डेटा संकलन में और विश्लेषण में पीएचआरआई की संलिप्तता अवैध है.

पीएचआरआई ने अपनी वेबसाइट में किरण प्रोजेक्ट के साथ उसके संबंध की जानकारी दी है. वेबसाइट में उसने किरण को अपनी शोध परियोजनाओं में से एक बताया है. परियोजनाओं के स्टेटस कि आगे “ऑन गोइंग” या जारी लिखा है और इसके अध्ययन की कालावधी 2013 से 2018 के बीच की बताई गई है. वेब पेज में बताया गया है कि युसूफ और पीएचआरआई के जांचकर्ता फिलिप जोसेफ परियोजना के प्रमुख जांचकर्ता हैं और रंगराजन प्रोग्राम मैनेजर हैं. लगता है कि समाचार पत्र डेक्कन क्रॉनिकल और टीवी में अप्रैल 2019 में आईं खबरों के बाद पीएचआरआई ने यह पेज वेबसाइट से हटा लिया है. डेक्कन क्रॉनिकल ने खबर की थी कि पीएचआरआई ने अपनी वेबसाइट में बताया है कि अच्युता मेनन सेंटर उनकी ओर से यह सर्वे कर रही है. अच्युता मेनन सेंटर के अध्यक्ष रमणकुट्टी ने क्रॉनिकल को से कहा था कि पीएचआरआई इस सर्वेक्षण के साथ शुरू से ही जुड़ी है लेकिन एजेंसी के साथ डेटा शेयर करने के संबंध में फिलहाल कोई निर्णय नहीं लिया गया है.

उपरोक्त दावे के बावजूद ईमेल से पता चलता है कि यह दावा गलत है. 2016 के ईमेलों में पीएचआरआई के प्रतिनिधियों ने किरण के कार्यान्वयन पर चर्चा की थी. उन चर्चाओं में फील्ड स्टाफ की भर्ती, सर्वे को करने, सर्वर की स्थापना और डेटा की शेयरिंग के बारे में चर्चा है. एक ईमेल में यूसुफ ने विजयकुमार को लिखा है, "यदि सरकार सहमत होती है और पीएचआरआई को प्रत्येक दिन का डेटा, असल में तो दिन में कई बार डेटा मिलता रहे तो हम काम को पूरा करने के लिए कोई भी तरीका अपनाने को तैयार हैं, यहां तक कि वह तरीका भी जो हमने पायलट के लिए अपनाया था." यूसुफ से स्टाफ की संख्या, सर्वे की समय सारणी, डेटा संकलन और विश्लेषण की आवृत्ति पर भी परामर्श किया गया था.

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इस प्रोजेक्ट को मेडिकल डेटा के पीछे के व्यावसायिक हितों के संदर्भ में समझना जरूरी है. मेडिकल डेटा की माइनिंग खरबों डॉलर का कारोबार है. प्रौद्योगिकी बाजार पर शोध करने वाली कंपनी बीआईएस रिसर्च ने 2017 में अनुमान लगाया था कि स्वास्थ्य के बिग डेटा का बाजार मूल्य 14 अरब डॉलर है और साल 2025 तक यह बढ़कर 68.75 खरब डालर हो जाएगा. एडम टेन्नर हार्वर्ड के इंस्टीट्यूट फॉर क्वानटेटिव सोशल साइंस के खोजी पत्रकार और राइटर इन रेसिडेंस हैं. उन्होंने आवर बॉडी, आवर डाटा : हाउ कंपनी मेक बिलियन सेलिंग अवर मेडिकल रिकॉर्ड नाम की किताब लिखी है. टेन्नर के अनुसार, आमतौर पर कंपनियां दावा करती हैं कि डेटा माइनिंग का काम मेडिकल शोध और स्वास्थ उपचार के लिए लाभदायक होता है लेकिन हकीकत यह है कि ये कंपनियां लाभ के लिए इनका विश्लेषण या बिक्री करती हैं. उन्होंने लिखा है कि पूल्ड मेडिकल डेटा की बड़ी मांग है और उद्योग जगत फार्मास्यूटिकल उद्योग में निवेश करने के लिए ऐसे विश्लेषणों की कीमत चुकाने को तैयार रहता है. साथ ही वह अपने दवों के पक्ष में किए जाने वाले लिए विज्ञापनों में इनका इस्तेमाल करता है.

पीएचआरआई एक निजी विदेशी संस्था है जो क्लिनिकल ट्रायल और दवाओं पर शोध के लिए फार्मास्यूटिकल कंपनियों से साथ काम करती है. उसकी वेबसाइट में लिखा है कि वह संस्था छह महाद्वीपों के 102 देशों में 15 लाख लोगों के बीच 100 ज्यादा अध्ययन में सक्रिय है. मेडिकल डेटा के व्यवसायिक लाभ से समझा जा सकता है कि उसने खोब्स और किरण से बहुत पैसा कमाया है. अक्टूबर 2013 के एक पत्र में, जो यूसुफ ने विजयकुमार और राज को स्क्रीनिंग समिति के लिए तैयारी के लिए लिखा था, कहा गया है कि पीएचआरआई ने पहले ही खोब्स पर तीन करोड़ से ज्यादा खर्च किए हैं. यूसुफ ने लिखा है पीएचआरआई ने पांच लाख डॉलर से ज्यादा का निवेश इस प्रोजेक्ट में किया है और उसे लगता है कि इस परियोजना में अगले 5 साल तक 250000 से 300000 डॉलर प्रति वर्ष खर्च आएगा. यह स्पष्ट नहीं है कि पीएचआरआई स्वास्थ्य सर्वे के डेटा का इस्तेमाल किस तरह करता है यानी कि क्या वह इसे किसी को बेचता है. यूसुफ पीएचआरआई और मैकमास्टर विश्वविद्यालय ने मेरे भेजे सवालों के जवाब नहीं दिए. उनका जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

13 सितंबर 2013 को हेप ने पीएचआरआई के समक्ष सितंबर से दिसंबर तक के खर्चों के लिए 600000 रुपए का बिल जमा किया था. इन खर्चों में स्टाफ की तनख्वाह, सर्वे प्रश्नों की प्रिंटिंग और न रक्त नमूनों के सैंपल संकलित करने का खर्च शामिल हैं. इस बिल पर हेप की ओर से विजयकुमार के हस्ताक्षर हैं. 10 अक्टूबर 2013 के एक बिल में हेप ने केरला हेल्थ सर्विलांस स्टडी के लिए 7800 डॉलर या 570000 रुपए का बिल जमा किया है. लगता है कि राज्य विधानसभा में खर्च के बारे में जानकारी देखते वक्त केरल सरकार ने इन खर्चों को नहीं दिखाया. जून 2014 में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री वीएस शिवाकुमार ने विधानसभा को बताया था कि सरकार ने इस परियोजना में 465000 रुपए खर्च किए हैं.

KHOBS Invoices (2013) by Tanvi Mishra

इन ईमेलों से प्रकाश में आया एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि खोब्स प्रोजेक्ट को केवल ऑब्जर्वेशनल सर्वेक्षण के रूप में तैयार नहीं किया गया था बल्कि इसे इंटरवेंशन प्रोजेक्ट के रूप में स्वीकार किया गया था. इंटरवेंशन में दवाई मरीजों को देकर उसके असर का अध्ययन किया जाता है. असल में इंटरवेंशन स्वास्थ्य अधिकारियों और पीएचआरआई एवं हेप के सदस्यों के बीच हुई दिसंबर 2011 की पहली बैठक से ही एजेंडे मे था. बैठक के वक्ता का उल्लेख किए बिना ही मिनट्स में लिखा है, “मुझे लगता है कि यह अच्छा होगा कि इंटरवेंशन की लीड केरल सरकार से मिले और हाइपरटेंशन और डायबिटीज के लिए सबसे अच्छी तरीके से संबंधित सूचनाएं हेप और मैकमास्टर जोड़ सकते हैं.” फिर यह तय किया गया कि पायलट में इंटरवेंशन के लिए पॉलीपिल पर विचार किया गया है. पॉलीपिल एक टेबलेट या कैप्सूल होती है जिसमें एक ही गोली के अंदर कई दवाइयां होती हैं. 2018 से नरेन्द्र मोदी सरकार ने इस दवा पर नियंत्रण कसा था और जनवरी, 2019 जनवरी तक 400 से अधिक ऐसी दवाइयों पर रोक लगाई जा चुकी है.

यूसुफ कैडिला फार्मास्यूटिकल से पॉलीकैप निशुल्क हासिल करने के लिए संपर्क कर चुके थे. पॉलीकैप कैडिला द्वारा निर्मित कार्डियोवैस्कुलर रोग की दवा है. मीटिंग में उन्होंने कहा कि फार्मास्यूटिकल कंपनी ने 500 से 1000 लोगों के लिए तीन से छह महीनों तक की निशुल्क दवाइयों की सप्लाई का वादा किया है बशर्ते हम कुछ प्रमुख और साधारण डेटा व्यवस्थित रूप से संकलित कर विश्लेषण और प्रकाशित करें. यूसुफ ने आगे लिखा है इससे केरला के प्रोजेक्ट को और कैडिला को भी फायदा होगा. मिनट्स में लिखा है कि सदानंदन इस प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग करने वाले अन्य संभावित परोपकारियों को खोज रहे हैं. कारवां के पास उपलब्ध दस्तावेजों से यह स्पष्ट नहीं होता है कि कैडिला के साथ कि वह सहमति किरण परियोजना में जारी रही कि नहीं.

कैडिला अहमदाबाद की फार्मास्यूटिकल कंपनी है जिसके मालिक राजीव मोदी हैं. इसके संस्थापक इंद्रावदन मोदी उन व्यवसायियों में से एक हैं जिन्होंने साल 2002 में गुजरात की सांप्रदायिक हिंसा को लेकर चारों तरफ से आलोचना झेल रहे नरेन्द्र मोदी का समर्थन किया था. 2003 में कैडिला कंपनी रिसर्जेंट ग्रुप ऑफ गुजरात जैसे बिजनेश समूहों में शामिल हुई जिसमें अडानी समूह भी शामिल था. इसने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के सदस्यों द्वारा मोदी की आलोचना करने पर सीआईआई से हट जाने की धमकी दे डाली थी.

पॉलीकैप एस्प्रिन, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाइयों सहित पांच दवाइयों का कॉम्बिनेशन है जिसका इस्तेमाल हार्टअटैक या हृदयाघात से बचाव के लिए किया जाता है. यह दवा 2009 अप्रैल में बाजार में आई थी.

पीएचआरआई की वेबसाइट के अनुसार, संस्था ने पॉलीकैप का ट्रायल किया है और उस ट्रायल का नाम था “द इंडियन पॉलीकैप स्टडी” यानी टिप्स 1, 2 और 3. ये तीन ट्रायल कंपनी ने 2007 से लेकर 2009, 2010-2011 और 2012 से 2020 में 20 देशों में किए हैं. वेबसाइट में यह भी बताया गया है कि टिप्स एक और तीन को पीएचआरआई ने स्वयं प्रायोजित किया था और टिप्स दो कैडिला ने प्रायोजित किया था. यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन ने अपनी ग्लोबल ट्रायल रजिस्ट्री में टिप्स अध्ययन को विस्तार से प्रकाशित किया है जिसमें बेंगलुरु के सेंट जॉन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट को प्रमुख प्रायोजक और पीएचआरआई और कैडिला को अतिरिक्त प्रायोजक और साझेदार बताया है.

उस रजिस्ट्री में केरल के चार निजी संस्थानों के नाम हैं, जो उन 54 संस्थाओं में से हैं जिन्होंने टिप्स ट्रायल में हिस्सा लिया था. इनमें से एक संस्थान कोझिक्कोड़े की बेबी मेमोरियल अस्पताल है जो 2010 के कैडिला प्रायोजित टिप्स के अध्ययन में भी शामिल रही है. इस अध्ययन को क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया ने प्रकाशित किया है. टिप्स के अध्ययन में पॉलीकैप के साथ पोटैशियम सप्लीमेंट्स के इस्तेमाल का परीक्षण किया गया था. अच्युता मेनन सेंटर की अभिभावक संस्था श्री चित्र तिरुनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज का भी नाम हिस्सा लेने वालों में शामिल है. सीटीआरआई की वेबसाइट श्री चित्रा इंस्टिट्यूट के किसी भी एथिक्स समिति के बारे में नहीं बताती लेकिन यह बताती है कि बेबी मेमोरियल अस्पताल की एथिक्स समिति ने ट्रायल की मंजूरी नहीं दी. यह अस्पताल उन पांच अस्पतालों में से एक है जिसके अप्रूवल स्टेटस के सामने लिखा है “जमा/अंडर रिव्यू”. जबकि 20 अन्य हिस्सा लेने वाले संस्थानों की एथिक्स समितियों ने ट्रायल को मंजूरी दी थी.

यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस ट्रायल में भाग लेने वाली सभी संस्थाओं ने अपने-अपने एथिक्स समितियों से मंजूरी ली थी या नहीं. बेबी मेमोरियल अस्पताल ने मेरे उस ईमेल का जवाब नहीं दिया जिसमें मैंने उनसे पूछा था कि क्या अस्पताल ने पॉलीकैप ट्रायल में हिस्सा लिया था और यदि हां तो क्या उसकी एथिक्स समिति ने इसकी मंजूरी दी थी? श्री चित्रा इंस्टिट्यूट में कार्डियोलॉजी के प्रोफेसर हरिकृष्णन ने इस बात से इनकार किया कि अस्पताल ने कभी पॉलीकैप ट्रायल में भाग लिया था. इसके अलावा मैंने श्री चित्रा इंस्टीट्यूट, अच्युता मेनन सेंटर और हेप को हेल्थ सर्वे के बारे में ईमेल भेजे थे लेकिन मुझे किसी ने जवाब नहीं दिया.

पीएचआरआई की वेबसाइट में टिप्स एक, दो और तीन के मुख्य सदस्य के रूप में यूसुफ के नाम का उल्लेख है. यूएस लाइब्रेरी की ग्लोबल रजिस्ट्री में यूसुफ को अध्ययन का निरीक्षक और प्रमुख बताया गया है. तो स्पष्ट है कि यूसुफ खोब्स के इंटरवेंशन चरण में उन दवाई की सिफारिश कर रहे थे जिन पर वह खुद एक्सपेरिमेंट कर रहे थे.

2012 में कनाडा सरकार की फंडिंग एजेंसी नेटवर्क ऑफ सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस ने पीएचआरआई के नेतृत्व वाले शोध समूह कनाडा-इंडिया रिसर्च इनोवेशन हेल्थ नेटवर्क का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. पीएचआरआई के लेटर ऑफ इंटेंट या आशयपत्र में लिखा है कि हेल्थ नेटवर्क के स्वास्थ्य शोधकर्ता कैडिला फार्मास्यूटिकल्स के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. उस आशयपत्र में लिखा है, “केरल सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय हेल्थ नेटवर्क का नया साझेदार है और हम पूरे केरल राज्य में हेल्थ ऑब्जर्वेटरी विकसित करने जा रहे हैं.” पत्र में पीएचआरआई ने बताया था कि वह पॉलीपिल को आरंभिक स्वास्थ्य देखभाल में शामिल कराएगी. लेकिन इसे ठुकराते हुए नेटवर्क ऑफ सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस ने पांच कमजोरियां गिनाई. उनमें से एक थी कि पॉलीपिल और डायग्नोस्टिक संबंधी कार्यक्रम के बीच संबंध दिखाई नहीं देता.”

सदानंदन ने वैश्विक मंचों से पॉलीपिल का प्रचार किया है. उन्होंने राज्य के स्वास्थ्य विभाग के मुख्य सचिव की हैसियत से इन मंचों को इसके प्रचार के लिए इस्तेमाल किया है. सितंबर 2012 में सदानंदन ने “कॉन्बिनेशन पॉलिफार्मेसी फॉर कार्डियोवैस्कुलर डिजीज” विषय पर कनाडा में आयोजित वैश्विक शिखर सम्मेलन में भाग लिया. शिखर सम्मेलन का आयोजन पीएचआरआई ने किया था. दो महीने बाद उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक विशेषज्ञों की समिति को कार्डियोवैस्कुलर रोगों से बचाव के लिए पॉलीपिल थैरेपी को शामिल करने की सिफारिश की. सदानंदन ने लिखा कि वह पॉलीपिल की सिफारिश इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह सापेक्षिक रूप से सस्ती, उपलब्ध और प्रभावकारी है. उस समिति ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी और थैरेपी डब्ल्यूएचओ की ताजा सूची में शामिल नहीं है.

मई 2019 में राज्य सरकार ने केरल के स्वास्थ्य क्षेत्र के बारे में एक बुकलेट प्रकाशित की थी. गोपाल और विजयकुमार ने उस बुकलेट में लिखा है कि सभी जिलों की प्रतिनिधि आबादी का हेल्थ सर्वे करने का विचार सदानंदन का था. “2013 में राजीव सदानंदन ने सभी जिलों की प्रतिनिधि आबादी की व्यवस्थित निगरानी के लिए हेल्प ऑब्जर्वेटरी विकसित करने पर जोर दिया था और अंततः मैकमास्टर विश्वविद्यालय के डॉ सलीम यूसुफ की तकनीकी सहायता के जरिए एक ऑब्जर्वेटरी के रूप में महामारी अध्ययन की रूपरेखा तैयार की गई. इसमें केरल के विशेषज्ञ भी शामिल थे.”

गोपाल और विजयकुमार ने आगे लिखा है कि हालांकि “पायलट अध्ययन सफल था लेकिन रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं किया गया क्योंकि दुर्भाग्यपूर्ण विवादों के चलते प्रोजेक्ट को बीच में ही छोड़ देना पड़ा. अतिरिक्त मुख्य सचिव ने इससे आगे बढ़ाने का जिम्मा अपने ऊपर लिया और 2018-19 में इसकी पेशकश की.” सदानंदन 2019 में रिटायर हो गए और फिलहाल वह कोविड-19 महामारी की रोकथाम के काम के लिए मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं. यूसुफ ने उस बुकलेट में लिखा है कि सदानंदन और उन्होंने संयुक्त रुप से यह विचार बनाया था कि केरल में स्वास्थ्य उपचार में सुधार के लिए राज्य भर में प्रतिनिधि सर्वे कराया जाए.

मुख्यमंत्री कार्यालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और सदानंदन को भेजे ईमेलों का जवाब मुझे नहीं मिला. उनका जवाब मिलते ही इस स्टोरी को अपडेट कर दिया जाएगा.