जोगी के मोर्चे से बीजेपी और कांग्रेस को बराबर नुकसान

अजीत जोगी के नेतृत्व वाली जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ 2018 के विधानसभा चुनावों मे बीजेपी और कांग्रेस दोनों के ही वोट काटती दिख रही है.
सोनू मेहता/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस
अजीत जोगी के नेतृत्व वाली जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ 2018 के विधानसभा चुनावों मे बीजेपी और कांग्रेस दोनों के ही वोट काटती दिख रही है.
सोनू मेहता/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद से ही, प्रदेश में हुए सभी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच का मुकाबला कभी एकतरफा नहीं रहा. लेकिन 2018 के इस विधानसभा चुनाव में (18 सीटों में पहले चरण का चुनाव 12 नवंबर को सम्पन्न हो चुका है. बाकी की 72 सीटों में कल मतदान होगा.) एक तीसरा मोर्चा भी चुनावी मैदान में है. स्वयं को अनुसूचित जनजाति कंवर का बताने वाले अजीत जोगी साल 2000 और 2003 के बीच प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे. दो साल पूर्व जोगी ने कांग्रेस को अलविदा कहा और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) नाम से नई पार्टी बना ली. इस साल अक्टूबर में जेसीसी ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन बना लिया जिसमें बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) भी शामिल हो गई. यह गठबंधन प्रदेश की सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है. 55 सीटों पर जेसीसी और 35 पर बसपा ने उम्मीदवार उतारे हैं और जेसीसी ने अपने हिस्से से 2 सीटें सीपीआई को देने का वादा किया है.

उम्मीद की जा रही है कि यह गठबंधन बीजेपी और कांग्रेस के वोटों को प्रभावित करेगा. प्रदेश में पिछले 15 सालों से मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार है लेकिन इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर 2 प्रतिशत से अधिक कभी नहीं रहा. 2013 के विधानसभा चुनाव में वोटों का यह अंतर घट कर 0.75 प्रतिशत पर आ गया था. इसके अलावा एक और बात है कि प्रत्येक सीट में उम्मीदवारों के बीच जीत का अंतर अच्छा खासा रहा है. यानी जीतने वाले उम्मीदवार ने प्रतिद्वंद्वी को बड़े अंतर से हराया है. साथ ही सिटिंग विधायक अक्सर हार गए. पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी के 26 विधायक चुनाव हार गए थे. पार्टियों के बीच वोटों का अंतर कम रहने के बावजूद सत्ता विरोधी लहर से पार पाना छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दलों के लिए मुख्य चुनौती है.

जून 2018 में छत्तीसगढ़ की हिंदी वेबसाइट सीजीवॉल डॉट कॉम और गैर सरकारी संगठन फोर्थ डायमेंशन डिजिटल स्टूडियो ने ‘छत्तीसगढ़ का मूड’ नाम से चुनाव सर्वेक्षण कराया था. यह सर्वेक्षण मेरे नेतृत्व में हुआ था. बीजेपी के वर्तमान कार्यकाल में उसकी नीतिगत विफलता के कारण इन चुनावों को कांग्रेस के पक्ष में जाता देखा जा रहा है. प्रदेश के कई निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी मजबूत है और सत्ता विरोधी लहर का उसे लाभ मिलता दिख रहा है. अक्टूबर के मध्य में जब जेसीसी-बसपा-सीपीआई गठबंध की घोषणा हुई तो राजनीतिक विशलेषकों ने अपने पूर्वानुमानों में संशोधन करते हुए कयास लगाया कि यह गठबंधन कांग्रेस के वोटों पर सेंधमारी करेगा. लेकिन राज्य में समुदायों की स्थिति और सीटों के बंटवारे के अध्ययन से लगता है कि यह गठबंधन बीजेपी के लिए भी उतना ही बड़ा खतरा है जितना कांग्रेस के लिए है.

केन्द्र में बीजेपी की सरकार के प्रदर्शन के कारण प्रदेश में बीजेपी कमजोर पड़ी है और उपरोक्त गठबंधन प्रदेश में उसके गणित को बिगाड़ सकता है. 2003 और 2013 के बीच जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, उस वक्त राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्राम रोजगार गारंटी कानून जैसी योजनाओं को सफलता के साथ लागू कर अच्छा प्रर्दशन किया था. 2014 में केन्द्र में बीजेपी की सरकार के बनने के बाद इन योजनाओं के आवंटन को कम कर दिया गया. उसके बाद माल एवं सेवा कर (जीएसटी) और नोटबंदी के कारण भाजपा का कोर वोट बैंक (मध्यमवर्ग व व्यापारी) पार्टी से नाराज हो गया.

बीजेपी ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को भी निराश करने की गलती की, जो राज्य की आबादी का क्रमशः 12 और 32 प्रतिशत हैं. अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार रोकथाम कानून को कमजोर बनाने का बीजेपी का प्रयास और अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ बढ़ते अत्याचार के प्रति उसकी उदासीनता के कारण दलित और आदिवासियों के बीच उसका समर्थन कम हुआ है.

सुदीप श्रीवास्तव पूर्व पत्रकार हैं और हाल में वकालत करते हैं. चुनावों का मनोविज्ञान पुस्तक के ​ले​खक हैं.

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