बीजेपी का अर्ध-कुंभ फ्लॉप, भारी प्रचार के बाद भी नहीं मिला राजनीतिक लाभ

08 फ़रवरी 2019
अर्ध-कुंभ मेले के दौरान साधु किराए पर देने के लिए टेंट लगाते हैं. लेकिन इस बार उन्होंने टेंटों पर जो पैसे लगाए, उसे भी वसूल नहीं पाए.
राजेश कुमार सिंह/एपी
अर्ध-कुंभ मेले के दौरान साधु किराए पर देने के लिए टेंट लगाते हैं. लेकिन इस बार उन्होंने टेंटों पर जो पैसे लगाए, उसे भी वसूल नहीं पाए.
राजेश कुमार सिंह/एपी

12 दिसंबर 2017 को उत्तर प्रदेश यानी यूपी के सीएम आदित्यनाथ ने अर्ध-कुंभ मेले को लेकर घोषणा की कि इसका नाम बदलकर कुंभ रखा जाएगा. कुंभ अभी प्रयागराज में चल रहा है. कुंभ मेला एक सामूहिक हिंदू तीर्थयात्रा है. ये हर 12 साल पर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, उत्तराखंड के हरिद्वार, महाराष्ट्र के नासिक और मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित किया जाता है. वहीं, अर्ध-कुंभ हर छह साल पर आयोजित किया जाता है. ऐसे में इन चारों जगहों पर दो के अनुपात में ये अर्ध-कुंभ होते हैं. प्रयागराज में पिछला कुंभ 2013 में हुआ था और अगला 2025 में होना है.

दिसंबर 2017 में अदित्यनाथ की घोषणा से विवाद पैदा हो गया. उत्तर प्रदेश में कई राजनीतिक पार्टियों और धार्मिक नेताओं ने इसका विरोध किया. लेकिन मुख्यमंत्री अडे रहे और नए नाम को ‘प्रयागराज मेला अथॉरिटी बिल’ के जरिए पेश किया. इसे विधानसभा ने पिछले साल 22 दिसंबर को पास कर दिया.

यूपी सरकार द्वारा 2019 में हो रहे अर्ध-कुंभ का नाम बदलने के पीछे यह प्रयास था कि आम तौर पर साधारण तरीके से मनाए जाने वाले इस पर्व को बड़े समारोह में तब्दील कर दे. यह आने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर किया गया. इसमें केंद्र और राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकारों के अलावा संघ परिवार ने मिलकर कुंभ की प्रतीकात्मकता के इर्द-गिर्द खूब माहौल तैयार किया. इसमें बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, संस्कार भारती और वनवासी कल्याण आश्रम ने मेले के इलाके में हिंदुत्व का संदेश फैलाने के लिए अपने कैंप भी लगाए हैं.

इन प्रयासों के बावजूद सरकार अभी चल रहे अर्धकुंभ की प्रकृति को नहीं बदल पाई. प्रयागराज के पास लगे टेंटों में भक्तों की कमी से साफ है कि नाम बदलना और मीडिया के सहारे आडंबर खड़ा करना तो आसान है लेकिन लोगों की इस बारे में जो असल सोच है उसे बदलना काफी मुश्किल है.

जूना अखाड़ा उग्रवादी साधुओं का एक धड़ा है. यतीन्द्रानंद गिरी इसके महामंडलेश्वर यानि गुरुओं द्वारा बनाए गए एक उच्च श्रेणी के साधू हैं. उन्होंने मुझसे कहा, “बीजेपी हिंदुओं के पारंपरिक ज्ञान को कम करके आंकती है. गांव के परिवेश से आने वाले आम हिंदू भक्त के लिए तीर्थयात्रा के मामले में तिथि बेहद पवित्र चीज है.” तिथि का सार यहां हिंदू पंचांग में शुभ तिथियों से है. उन्होंने कहा, “वो ऐसी किसी भी जानकारी को खारिज या अनदेखा कर देते हैं जो उनके (हिंदू) कैलेंडर की समझ के साथ नहीं जाती. उन्हें पता है कि कुंभ हर 12 साल पर होता है और उनका पिछला कुंभ प्रयागराज में महज छह साल पहले हुआ था. उन्हें ये भी पता है कि ये मेला अर्ध-कुंभ है. इसी वजह से आपको कुंभ जैसा जोश नजर नहीं आएगा.”

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