अनुच्छेद 370 को हटाने से हिंसा और अस्थिरता बढ़ेगी : पूर्व वार्ताकार राधा कुमार

08 अगस्त 2019
रवि कनौजिया/एक्सप्रेस फोटो
रवि कनौजिया/एक्सप्रेस फोटो

5 अगस्त को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में घोषणा की कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को प्रभावहीन कर रही है. शाह ने सदन में इससे संबंधित दो बिल पेश किए- जम्मू -कश्मीर आरक्षण (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2019 तथा जम्मू -कश्मीर पुनर्गठन विधेयक. साथ ही शाह ने उसी तारीख को जारी राष्ट्रपति के आदेश का भी हवाला दिया जिसने भारतीय संविधान के सभी प्रावधानों को राज्य पर लागू कर दिया.

आजादी मिलने के बाद जम्मू और कश्मीर के भारत में विलय को अनुच्छेद 370 ने औपचारिक स्वरूप दिया था. इसके तहत, रक्षा और विदेश नीति के मामलों के अतिरिक्त, सभी मामलों में केन्द्र सरकार को जम्मू और कश्मीर सरकार से सहमति लेनी जरूरी है.

फिर भी, जैसा कि राज्य दिसंबर 2018 से राष्ट्रपति शासन के अधीन है, केंद्र ने इस आवश्यकता को दरकिनार कर दिया - राष्ट्रपति के आदेश ने राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के बदले में स्वीकृति देने की अनुमति दी. पुनर्गठन विधेयक के माध्यम से, सरकार ने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- लद्दाख तथा जम्मू और कश्मीर में विभाजित किया. केंद्र ने राज्य सरकार की अनुपस्थिति में कार्य किया और एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से अपने निर्णयों की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल खड़े कर दिए. इस कदम के राजनीतिक निहितार्थ पर कारवां ​की एडिटोरियल फेलो महक महाजन ने शिक्षाविद और कश्मीर के लिए पूर्व वार्ताकार राधा कुमारसे बातचीत की.

महक महाजनः अनुच्छेद 370 को अप्रभावी बनाने के भारतीय जनता पार्टी की सरकार के निर्णय पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

राधा कुमारः जिस तरह से यह किया गया है, उसे देखते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र का काला दिन कहा जाएगा. यह बड़ा संवैधानिक फेरबदल है जिसे सरकार ने चोरी-छिपे किया है. जम्मू-कश्मीर के साथ भारतीय संघ के जो संबंध हैं उससे संबंधित प्रक्रिया और कार्यविधि को आपने राष्ट्रपति के एक आदेश से बदल दिया. इसके बाद आप जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल 2019 अचानक संसद में लेकर आते हैं, बहस करते हैं और पारित करा लेते हैं. यह ऐसा मामला है जिस पर कई दिनों तक बहस की जानी चाहिए थी. कुछ घंटों की बहस काफी नहीं है. अब हमें बताया जा रहा है कि राज्य की विधान सभा के बराबर राज्यपाल को माना जा सकता है. विधान सभा जनता द्वारा चुनी जाती है फिर यह राज्यपाल के बराबर कैसे हो सकती है? लेकिन राष्ट्रपति का आदेश ऐसा कह रहा है. यहां संविधान की मूल्य मान्यताओं का उल्लंघन हुआ है और वह भी षडयंत्र कर.

महक महाजन कारवां की एडिटोरियल फेलो हैं.

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